नई सोच के साथ विश्व आदिवासी दिवस: 9 अगस्त 2021 का अनुपालन

:: सालखन मुर्मू ::

" झारखंड बचेगा तो बृहद झारखंड और भारत के आदिवासी बचेंगे। अतः अब बृहद झारखंड बनाने की सोच से ज्यादा जरूरी है बृहद झारखंड अर्थात बंगाल, बिहार, उड़ीसा, आसाम, छत्तीसगढ़ और झारखंड आदि के आदिवासियों को मिलकर झारखंड को बचाने और समृद्ध करने का संकल्प और कार्य योजना बनाकर मैदान में उतर जाने का। चूँकि झारखंड के अधिकांश आदिवासी नेता और आदिवासी जनता ने शहीदों, पूर्वजों और आंदोलनकारियों का सपना - "अबुआ दिशुम, अबुआ राज" को विगत दो दशकों में लुटने- मिटने के कगार पर खड़ा कर दिया है। सपनों को बचाने की जगह बेचने का काम किया है। चलो विश्व आदिवासी दिवस के दिन प्रेरणा लेकर आगे बढ़ें।"- सालखन मुर्मू।

संयुक्त राष्ट्र ने 9 अगस्त 1982 को प्रथम बार आदिवासी सवाल पर चर्चा किया। फिर 1994 से प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाने का फैसला लिया। तत्पश्चात 13 सितंबर 2007 को विश्व आदिवासी अधिकार घोषणा पत्र 144 राष्ट्रों की सहमति से जारी किया। ताकि विश्व के 90 देशों में रह रहे करीब 37 करोड़ ( विश्व आबादी का 6.2%) आदिवासियों के हासा ( भूमि ), भाषा, जाति, धर्म, ईज्जत, आबादी, रोजगार, चास- वास और आत्म- निर्णय आदि का संरक्षण और संवर्धन संभव हो सके। घोषणा-पत्र का विरोध चार बड़े राष्ट्रों- अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और न्यूजीलैंड ने किया था। जिन्होंने अपने राष्ट्रों में आदिवासियों के साथ पहले घोर अन्याय, अत्याचार किया था। परंतु अंततः उन्हें भी इसका समर्थन करना पड़ा। विश्व आदिवासी अधिकार घोषणा पत्र के अनुपालन के लिए राष्ट्रगण कानूनी रूप से बाध्य नहीं हैं। यह आदिवासियों की एकता, जागरूकता और अन्य जन सहयोग से प्रभावी हो सकता है। 9 अगस्त 2021 का लक्ष्य है- सोशल कॉन्ट्रैक्ट अर्थात आदिवासियों को सर्वत्र शामिल करना Nothing for us without us.

22 मार्च 2021 को संयुक्त राष्ट्र ने 2022 से 2032 को "आदिवासी दशक" के रूप में आदिवासी भाषाओं की संरक्षण और प्रोन्नति के लिए रेखांकित किया है। क्योंकि विश्व की लगभग 7000 भाषाओं में से 40% भाषाएं विलुप्त होने वाली हैं। जिसमें सर्वाधिक खतरे की मुहाने पर आदिवासी भाषाएं खड़ी हैं। चूँकि इनका उपयोग पठन-पाठन, जनसंचार, सरकारी कार्य और रोजगार सृजन में नहीं किए जाते हैं।

विश्व आदिवासी दिवस का अनुपालन दुनिया भर में बढ़ रहा है। दुनिया भर में विलुप्त हो रहे आदिवासियों के लिए एकजुट होकर संकल्प लेने का यह एक अच्छा अवसर है। मगर नाच गान, खेलकूद, आनंद मनाने से ज्यादा अपने भूत, वर्तमान और भविष्य के बारे सोचने और संकल्प लेने का दायित्व गंभीरतापूर्वक लेना अनिवार्य हो जाता है। ताकि आदिवासियों के हासा, भाषा, जाति, धर्म, ईज्जत, आबादी, रोजगार, चास- वास और संवैधानिक - कानूनी अधिकार का संरक्षण और संवर्धन को सफल बनाया जा सके। उपरोक्त मुद्दों को अपना, समाज का, संगठनों का एजेंडा बनाकर चलना होगा। साथ ही एकजुटता और सफलता के लिए आदिवासी समाज के भीतर विद्यमान नशापान, अंधविश्वास (डायन प्रथा), ईर्ष्या द्वेष, राजनीतिक कुपोषण और प्राचीन वंश- परंपरागत आदिवासी स्वशासन व्यवस्था में गुणात्मक जनतांत्रिकरण कर सुधार लाने की त्वरित जरूरत है। आदिवासियों के तमाम सामाजिक-राजनीतिक संगठनों को पहचानने और मजबूर करने की भी जरूरत है- कि क्या वे वाकई आदिवासियों के हासा, भाषा, जाति,धर्म, ईज्जत, आबादी, रोजगार, न्यायपूर्ण पुनर्वास आदि के लिए सजग प्रहरी की तरह कार्यरत हैं या केवल अपने पेट, परिवार और स्वार्थों को आगे बढ़ा रहे हैं?

आदिवासी सेंगेल अभियान झारखंड, बंगाल, बिहार, आसाम, उड़ीसा आदि प्रांतों में विगत दो दशकों से आदिवासियों के सामाजिक- राजनीतिक सशक्तीकरण के लिए सक्रिय है। 2021 के विश्व आदिवासी दिवस को सेंगेल, झारखंड दिशोम  (झारखंड प्रांत) को समर्पित करना चाहती है। अर्थात आज का झारखंड दो दशकों के बावजूद जिस प्रकार लुटने- मिटने की कगार पर खड़ा है, उसे कैसे बचा कर समृद्ध किया जाए? शहीदों के सपनों को कैसे पुनर्जीवित किया जाए? आज की परिस्थितियों में यदि संविधान प्रदत्त आरक्षण के लाभ से आदिवासियों को वंचित कर दिया जाए तो शिक्षा, रोजगार, चुनाव आदि क्षेत्रों से आदिवासी गायब कर दिए जा सकते हैं। ठीक उसी प्रकार झारखंड प्रांत आदिवासियों के लिए एक आदिवासी आरक्षित प्रदेश की तरह है। झारखंड प्रदेश में आदिवासियों की मजबूती देश और दुनिया के आदिवासियों के अस्तित्व पहचान और हिस्सेदारी के साथ जुड़ा हुआ है। 


अतः सेंगेल का आह्वान है देश के आदिवासी अपनी पूरी ताकत लगाकर झारखंड दिशोम  को लुटने- मिटने से बचाने का संकल्प लें। आदिवासी सेंगेल अभियान "अबुआ दिशुम, अबुआ राज" को सफल बनाने के संकल्प के साथ 9 अगस्त 2021 को भारत के 5 प्रदेशों में निम्न मांगों के साथ धरना प्रदर्शन आदि के मार्फत भारत के राष्ट्रपति को ज्ञापन प्रदान करेगी - 1. 2021 की जनगणना में प्रकृति पूजक आदिवासियों को सरना धर्म कोड प्रदान किया जाय। 2. संताली को हिंदी के साथ झारखंड की प्रथम राजभाषा बनाया जाए और हो, मुंडा, कुड़ुख, खड़िया आदि भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए। 3. झारखंडी डोमिसाइल और अन्य संवैधानिक- कानूनी अधिकारों की रक्षा की जाए। 4. सीएनटी /एसपीटी कानून की रक्षा करते हुए वीर शहीदों सिदो मुर्मू और बिरसा मुंडा के वंशजों के सम्मान, सुरक्षा और समृद्धि के लिए दो ट्रस्टों का गठन किया जाए। 4. विस्थापन- पलायन, ह्यूमन ट्रैफिकिंग पर रोक लगाया जाए। 5. आसाम- अंडमान आदि के झारखंडी आदिवासियों को अविलंब अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा प्रदान किया जाए। 6. शहीद सिदो मुर्मू के वंशज रामेश्वर मुर्मू और रूपा तिर्की के संदिग्ध मौतों की सी बी आई जाँच हो।

Salkhan Murmu

- सालखन मुर्मू, पूर्व सांसद
राष्ट्रीय अध्यक्ष, सेंगेल

Add new comment

This question is for testing whether or not you are a human visitor and to prevent automated spam submissions.

Image CAPTCHA
Enter the characters shown in the image.