'बुदेलखंडी मौड़ा' अब चीन का 'योगगुरु'

भोपाल/ललितपुर: 'करत करत अभ्यास के जड़ मति होत सुजान, रसिरि आवत जात है, सिल पर होत निशान' रहीम ने भले ही यह दोहा दशकों पहले लिखा हो, मगर बुंदेलखंड के 'मौड़ा' (लड़का या छोरा) सोहन सिंह पर एकदम सटीक बैठता है, क्योंकि उन्होंने पढ़ाई तो की है कंप्यूटर की, मगर अभ्यास ने उन्हें चीन में 'योगगुरु' के तौर पर पहचान दिलाई है। 

सोहन सिंह मूलरूप से बुंदेलखंड के ललितपुर जिले के विरधा विकास खंड के बरखेड़ा गांव के रहने वाले है, किसी दौर में उनके लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम आसान नहीं था। उन्होंने कंप्यूटर की पढ़ाई की और इंदौर फिर थाइलैंड में जाकर नौकरी की। उनके जीवन में योग रचा-बसा था और वे नया कुछ करना चाहते थे ।

सोहन सिंह ने आईएएनएस से बात करते हुए कहा कि जब वे सागर के हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय में पढ़ रहे थे तब एक शिक्षक ने योग को लेकर मार्ग दर्शन किया, जो उनके जीवन का आधार बन गया। उसके बाद उनका योग पर ध्यान गया, पढ़ाई करने के बाद उनके लिए कंप्यूटर की कंपनी में नौकरी करना प्राथमिकता था और योगा दूसरे क्रम पर था। वे रात में नौकरी करते और दिन में लागों को योग सिखाने का काम करते थे। वक्त गुजरने के साथ वे चीन पहुंच गए, यहां उन्होंने योग को प्राथमिकता बनाया और कंप्यूटर की नौकरी को द्वितीय। 

सोहन सिंह की स्वयं का चीन में 'सोहन योगा' के नाम से संस्थान है और उसके विभिन्न स्थानों पर नौ क्लब चलते है। वर्तमान में उनका जोर आधुनिक येाग (एडवांस योग) है। योग तीन तरह के होते हैं, उनमें से आष्टांग योग एडवांस योग है। एडवांस योग की खूबी यह है कि वह चित्त और शरीर को आपस में मिला देता है।

अपने जीवन के कठिन दौर को याद करके सोहन सिंह बताते हैं कि पिता रेलवे में नौकरी करते थे, मगर उनका वेतन सूदखोरों के पास चला जाता था, क्योंकि पिता ने परिवार की जरूरतों को पूरा करने जैसे भाई-बहन की शादी आदि के लिए कर्ज लिया था। खेती में कुछ पैदा होता नहीं था, यह इलाका सूखाग्रस्त है, मां सभी का पेट भरने के लिए मजदूरी किया करती थी। 

सिंह कहते हैं कि उनके लिए पहले थाली का पूरा भरना अर्थात सभी के लिए भोजन का इंतजाम करना बड़ी चुनौती थी, यही चुनौती उन्हें इंदौर और फिर थाईलैंड ले गई। इंदौर व थाईलैंड वे कंप्यूटर कंपनी में नौकरी करते मगर योग उनके जीवन का बड़ा हिस्सा रहा। वक्त गुजरने के साथ वे थाईलैंड में एक सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) कंपनी के मालिक बन गए, मगर उनके दिल और दिमाग पर तो योग का बसेरा था। थाईलैंड में वे लगभग ढाई साल रहे। 

कंप्यूटर में डॉक्टरेट करने के लिए सोहन चीन पहुंचे, जहां उन्होंने नौकरी के साथ योग की कक्षाएं लेना शुरू किया, समय के साथ हालात बदलते गए और आज उनकी जिंदगी के लिए योग ही सबकुछ है। 

वे कहते हैं कि योग से इंसान की जिंदगी बदल सकती है, चित्त तो स्थिर होता ही है, व्यक्ति स्वस्थ्य भी रहता है। वे चीन के अलावा भारत में भी आकर लोगों को प्रशिक्षण देते हैं। उनके लिए योग प्राथमिकता है, पैसा कोई मायने नहीं रखता।

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