गर्व से कहो हम पाखंडी हैं!

Approved by Srinivas on Thu, 06/25/2020 - 11:22

:: श्रीनिवास ::

सच तो यह है कि हम (भारतीय) नस्लवादी हैं, रंगभेदी मानसिकता से ग्रस्त हैं, साम्प्रदायिक हैं, विधर्मियों और अपने आलोचकों के प्रति असहिष्णु हैं. हम आसानी से धर्मान्धता में बह जाते हैं. हमारा समाज बुनियादी रूप से स्त्री विरोधी है. भाषा और क्षेत्र के आधार पर अहं का टकराव तो है ही. और जब मैं ‘हम’ कहता हूँ, तो यह सिर्फ धार्मिक बहुसंख्यकों, यानी हिंदुओं के लिए नहीं कहता. गैर हिंदू समाज भी कमोबेश ऐसी ही नकारात्मक मानसिकता और धार्मिक संकीर्णता से भी ग्रस्त है.

चीन सीमा पर हुई हिंसा के कारण भारतीय मीडिया से अमेरिका और पश्चिमी देशों में जारी रंगभेद और नस्लभेद विरोधी आंदोलन अचानक नेपथ्य में चला गया है. इसलिए इसी विषय पर एक लेख मैंने बीच में ही रोक दिया. लेकिन दो दिन पहले सोशल मीडिया पर वायरल एक मैसेज देख कर माथा ठनका, जिसमें अमेरिकी अश्वेतों को जम कर लताड़ा गया था. यह कह कर कि जिस देश ने इनको बसाया, बनाया, सम्मान दिया. ये उसी को तबाह करने पर तुल गये हैं! उस पोस्ट के कुछ अंश देखें :
'अमेरिका के दंगों की सच्चाई-
जिन्हें तरस के आधार पर नागरिकता दी उन्होंने ही अमरीका को जलाया. ये कृतघ्न लोग सम्मान मिलते ही अपना एजेंडा लागू करने लगते हैं...'
आगे इसमें यह बताने का प्रयास किया गया है कि इस हिंसा के पीछे भी मूल रूप से मुसलमान हैं. हालांकि ऐसे तत्वों के लिए खुद से भिन्न और असहमत हर कोई घृणा का पात्र है.

इसके पहले दिल्ली के वि(कु) ख्यात कपिल मिश्रा का वह बयान देख ही चुका था, जिसमें उसने अमेरिकी श्वेतों का आह्वान किया था कि वहां अशांति फैला रहे अश्वेत उपद्रवियों को सबक सिखाएं, प्रकारांतर से ‘गोली मारो ..लों को.’ यहाँ आप ‘सा’ की जगह ‘का’ कर दीजिये. ऐसे में लगा कि इस मुद्दे पर विमर्श होना चाहिए...

हम जानते हैं कि अमेरिका में एक गोरे पुलिसकर्मी की क्रूरता के कारण हुई एक ब्लैक (काले) व्यक्ति की मौत के बाद शुरू हुआ आंदोलन अब अनेक देशों में फैल चुका है. भारत में भी इसके प्रति सहानुभूति और समर्थन के स्वर मुखर हो रहे हैं. लेकिन भारत में सोशल मीडिया पर हो रही चर्चा पर गौर करें तो एक बात साफ़ समझ में आ जाती है कि यहाँ की सत्ताधारी जमात और उसके समर्थक उस आंदोलन के विरोध में हैं; और भारत का विपक्ष उसके पक्ष में. हालांकि इसके राजनीतिक कारण भी हैं.

वैसे तो भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का याराना जगजाहिर है. अमेरिका में ‘हाउडी मोदी’ का आयोजन होता है, जो भारत के लिए ‘चुनावी रैली’ जैसा ही होता है; और अहमदाबाद में ‘नमस्ते ट्रंप’ का. यह दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों के बीच ही एक अंदरूनी सहमति की ही नहीं, दोनों देशों के सत्ताधारी समूहों में चारित्रिक समानता का भी परिचायक है.

भारत के मोदी मुरीद जिस तरह उस आंदोलन की (उसमें हुई हिंसा की आड़ में) निंदा कर रहे ह़ै, इतना मुखर विरोध तो अमेरिकी श्वेत समाज भी नहीं कर रहा है, बल्कि अमेरिका तथा पश्चिमी देशों के बहुसंख्यक (श्वेत) समुदाय का एक बड़ा हिस्सा आंदोलन के साथ खड़ा और उसमें शामिल भी दिख रहा है. यह उनकी पश्चाताप की भावना या भलमनसाहत का नतीजा हो; या फिर अश्वेतों के आक्रोश को शांत करने की रणनीति का, लेकिन वे विरोध करते दिख नहीं रहे हैं. अमेरिका में भी खुद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके कुछ कट्टर अनुगामी और रंगभेदी मानसिकता के शिकार लोगों के अलावा कोई अश्वेतों के खिलाफ नहीं बोल रहा. मगर भारत (ख़ास कर हिंदी पट्टी) के बहुसंख्यक समाज का मुखर तबका क्या संदेश दे रहा है और क्यों?

सच तो यह है कि हम (भारतीय) नस्लवादी हैं, रंगभेदी मानसिकता से ग्रस्त हैं, साम्प्रदायिक हैं, विधर्मियों और अपने आलोचकों के प्रति असहिष्णु हैं. हम आसानी से धर्मान्धता में बह जाते हैं. हमारा समाज बुनियादी रूप से स्त्री विरोधी है. भाषा और क्षेत्र के आधार पर अहं का टकराव तो है ही. और जब मैं ‘हम’ कहता हूँ, तो यह सिर्फ धार्मिक बहुसंख्यकों, यानी हिंदुओं के लिए नहीं कहता. गैर हिंदू समाज भी कमोबेश ऐसी ही नकारात्मक मानसिकता और धार्मिक संकीर्णता से भी ग्रस्त है.

मुसलिम और ईसाई समाज के रहनुमा भले ही इनकार करें, इन समुदायों में भी ‘जाति’ विभाजन और उस आधार पर भेदभाव भी है. बेशक ऐसा इसलिए है कि उनमें से अधिकतर के पूर्वज पहले हिंदू थे और धर्म बदलने से भी वह असर ख़त्म नहीं हुआ है. ईसाई समाजों में भी कौन पहले क्या (ब्राहमण, राजपूत, शूद्र, दलित आदि या मुंडा-उरांव आदि) था, इस आधार पर उनकी सामाजिक हैसियत होती है. आदिवासियों में अलग अलग कबीलों की हैसियत के अलावा सरना और धर्मान्तरित आदिवासियों के बीच तीखा विभाजन है. इस तरह विश्व के मानव समाज में जितने तरह के विभाजन हैं, भारत में वह सब विद्यमान है.

और इन विभाजनों के अलावा एक विलक्षण विभाजन सिर्फ भारत में, वह भी सिर्फ हिंदू समाज में पाया जाता है, वह है- जन्मना जातीय विभाजन. अन्य श्रेणियों की तो पहचान आसानी से हो जाती है. चमड़ी का रंग, कद-काठी, चेहरे की बनावट, भाषा आदि से हम ‘अपने’ और ‘पराये’ की पहचान कर सकते हैं. जैसे पूर्वोत्तर के लोग हमें ‘अपने’ या भारतीय नहीं लगते. उत्तर के लोग दक्षिण वालों को, इसी तरह दक्षिण के लोग उत्तर वालों को आसानी से पहचान सकते हैं. आदिवासी दूर से ही पहचाना जा सकता है. कुछ समुदायों को ‘कपड़ों’ से भी पहचान सकते हैं, जैसा कि एक बार खुद हमारे प्रधानमंत्री ने भी कहा था.

मगर एक ही धर्म को माननेवालों के बीच जन्म के आधार पर जिस ऊंच नीच का जैसा भेदभाव है, वह शायद ही कहीं और होगा. धर्म एक, रंग एक जैसा, भाषा एक, खानपान एक, लेकिन किसका जन्म किस ‘जाति’ में हुआ है, इससे उसकी सामजिक हैसियत तय होती है, जो जीवनपर्यंत बनी रहती है!
ऐसे तमाम समुदायों के बीच परस्पर अविश्वास, संदेह और परायेपन का बोध है. यह हमारे व्यवहार में भी दीखता है. मगर हम कभी यह स्वीकार नहीं करते कि हम अपने ही देशवासियों के बीच ऐसे अवैज्ञानिक और निंदनीय भेदभाव में यकीन करते हैं, उस तरह का व्यवहार करते हैं!

शायद यही कारण है कि अमेरिका में व्याप्त और अब भी जारी रंगभेद हमें ‘स्वाभाविक’ लगता है; और जब वहां उस भेदभाव का शिकार आशेत समुदाय इस अमानवीयता के खिलाफ उठ खड़ा होता है, तो हमें अच्छा नहीं लगता. शायद यह भय भी लगता हो कि सामाजिक/नस्ली भेदभाव के प्रति उभरे आक्रोश की लपट कहीं यहाँ तक न पहुँच जाये. शायद इसी कारण हम यह मानने को तैयार नहीं होते कि हम जातिवादी हैं, कि रंगभेद या नस्लभेद में विश्वास करते हैं!

ऐसे में हमारा आदर्श नारा होना चाहिए : गर्व से कहो, हम पाखंडी हैं.

About the Author

Srinivas

मूल रूप से समाजकर्मी, फिर पत्रकार रहे श्रीनिवास जी की सम-सामयिक मुद्दों में विशेष रुचि रही है। पत्रकारिता में आने से पहले वह 74' के बिहार (संयुक्त) आंदोलन और जेपी द्वारा गठित छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी में सक्रिय थे। पत्रकारिता के आरंभ से अंत तक रांची से प्रकाशित 'प्रभात खबर' की संपादकीय टीम में रहे। 1989 में हरिवंश जी संपादक बने तो संपादकीय पन्ने की जिम्मेवारी इन्हें मिली। सेवानिवृत्ति के बाद लेखन के साथ ही सामाजिक आयोजनों व गतिविधियों में शामिल रहते हैं।

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