पत्रकारों को फ्रंटलाइन वर्कर घोषित किया उड़ीसा सरकार ने, मौत पर 15 लाख मिलेगा

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ओडिशा सरकार ने राज्य के पत्रकारों को फ्रंटलाइन वर्कर घोषित किया है। इस संबंध में एक प्रस्ताव को मंजूरी देते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि पत्रकार निर्बाध रूप से खबरें देकर और लोगों को कोरोना वायरस से संबंधित मुद्दों से अवगत कराकर राज्य की बहुत सेवा कर रहे हैं। मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया, ‘कोविड-19 के खिलाफ हमारी जंग में पत्रकारों का बहुत बड़ा सहयोग हैं।’

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मोदी के दीया जलाओ आह्वान का जलती चिताओं के साथ हो रहा समापन : गोवा कांग्रेस

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पणजी: कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई को चिह्न्ति करने के लिए एक साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दीया जलाओ आह्वान का देश भर में जलती चिताओं के साथ समापन हो रहा है। यह बात गोवा कांग्रेस अध्यक्ष गिरीश चोडनकर ने शनिवार को कही। गिरीश ने एक बयान में कहा, "विभिन्न मीडिया प्लेटफॉर्म पर कोविड की वजह से जान गंवाने वाले सैकड़ों लोगों की चिता जलती हुई परेशान करने वाली तस्वीरें हैं। दूसरी तरफ, दाह संस्कार के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे सैकड़ों शवों को लेकर भी रिपोर्ट सामने आई हैं। यह दुखद स्थिति केवल इसलिए पैदा हुई, क्योंकि भाजपा सरकार ने आम आदमी के कल्याण की परवाह नहीं की।"

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बोधगया आंदोलन की यादें-3

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गया से मुंबई के सफर के दौरान मैं मणिमाला जी द्वारा कही पंक्ति, 'जो जमीन को जोते-बोये, वो जमीन का मालिक होये', याद कर रही थी और अपने गया के अनुभवों को मन में दोहरा रही थी. गया में जब हम लोग धान बो रहे थे और महिलाएं गाना गा रही थी, उस गाने की एक पंक्ति सुन कर मैंने उसका मतलब जानने की कोशिश की. पंक्ति थी - 'हमरे घरवा सुअर के बखोर हो किसनवां.'

बोधगया आंदोलन में महज चंद दिनों के लिए और एक कार्यक्रम में  शामिल होकर मुझे काफी गर्व हुआ. खास तौर पर यह जान कर कि इस ज़मीन के मालिक अब मज़दूर होंगे और फसल भी उनकी ही होगी. 

आईने भी नहीं थे उनके  पास! 

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बोधगया आंदोलन की यादें-2

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वहां से हम पिपरघट्टी के लिए निकले. मुझे ठीक से नहीं, पर इतना याद है कि पहले हम लोग ब्लॉक और वहां से गाँव गये, जहाँ एक और मीटिंग रात में होने वाली थी. मीटिंग में कारू जी भी थे. उनके अलावा मज़दूर किसान समिति के नेता मांझी (पूरा नाम याद नहीं) जी भी वहां मौजूद थे. मुझे उनके पास बैठ कर बातें करने का बहुत मन था, पर मुझे उनकी बोली-भाषा समझ नहीं आ रही थी.

मैं पटना पहुंच गयी. पटना से गया मेरी पहली बिना टिकट वाली यात्रा थी. टीटी आये और टिकट के लिए पूछा, तो हमने बताया- हम संघर्ष वाहिनी से हैं. यह सुन कर उन्होंने सभी कार्यकर्ताओं को बिना टिकट के बैठने की इजाज़त दी. यह मेरे लिए एकदम अलग अनुभव था. मैं मन ही मन खुश हो रही थीं कि हमारे देश में आंदोलनकारियों को कितना सम्मान हासिल है, उन्हें कैसे छोड़ दिया जाता है. इसमें मुझे आंदोलन की मजबूती झलक रही थीं.

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बोधगया आंदोलन की यादें-1

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उन दिनों मैं एमकॉम के पहले वर्ष में थी. चूंकि मैं संघर्ष वाहिनी में नयी थी. मुझे बहुत-सी जानकारी नहीं थी. पर मैं सभी कुछ जानना और सीखना चाहती थी. येरवदा जेल में जाने के कारण मुझे औरंगाबाद के सक्रिय सदस्यों की बैठक में शामिल किया गया.  वहां भी मेरे लिए सभी कुछ नया था. बहुत से लोग बिहार, खास कर बोधगया से भी आये थे. क्योंकि उन दिनों मेरी हिंदी बहुत कमज़ोर थी, तो जो भी चर्चा हो रही थी, वो मेरी समझ से परे थी. इसी कारण रात की मीटिंग में मैं ज़्यादा देर बैठी भी नहीं.

आजाद भारत के एक अद्भुत और सफल शांतिमय भूमि आंदोलन हुआ था बिहार (अविभाजित) के गया जिले बोधगया के शंकराचार्य मठ की अवैध जमींदारी के खिलाफ. आंदोलन का नेतृत्व किया था जेपी की प्रेरणा से उनके द्वारा गठित छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी ने. वाहिनी के पुराने साथी कार्यकर्ता अभी उस आंदोलन को अपने ढंग से याद कर रहे हैं. ये संस्मरण अपने आप में एक  इतिहास के जीवंत दस्तावेज हैं. हम उनमें कुछ को टुकड़ों में अपने पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे. उसी.आंदोलन से आकर्षित होकर सुदूर मुंबई से वाहिनी की चेतना नाम की एक युवती बोधगया पहुंची थी. शुरुआत हम उनके संस्मरण से कर रहे हैं.

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नहीं रहीं भारत की पहली महिला क्रिकेट कमेन्‍टेटर डॉ चन्‍द्रा नायडू

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भारत की पहली महिला क्रिकेट कमेंटेटर चंद्रा नायडू का निधन हो गया है। वह देश के पहले टेस्ट कप्तान सी के नायडू की बेटी थीं। उन्होंने अपनी पहली कमेन्ट्री राष्ट्रीय चैंपियन बॉम्बे (अब मुंबई) और इंदौर में एमसीसी के बीच 1977 में एक मैच के दौरान की थी। उन्होंने अपने दिवंगत पिता, जो एक प्रतिष्ठित क्रिकेटर थे, पर एक पुस्‍तक भी लिखी थीं जिसका नाम है  'सीके नायडू: ए डॉटर रिमेम्बर्स (CK Nayudu: A Daughter Remembers)'। 88 वर्षीय चन्‍द्रा नायडू लंबे समय से बीमार चल रही थी। वह अविवाहित थीं। 

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महिला वकीलों की मांग, हाईकोर्ट में महिला जजों की संख्‍या बढ़ाई जाए

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महिला वकीलों के एक संगठन ने सुप्रीम कोर्ट जाकर हाईकोर्ट में जजों के तौर पर महिलाओं की उचित भागीदारी की मांग रखी है। एक अंग्रेजी दैनिक के अनुसार महिला वकील संघ ने संवैधानिक अदालतों में महिलाओं की कम उपस्थिति का हवाला दिया। संघ की  वकील स्नेहा कलीता के जरिये दायर याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के बीते 71 सालों के कामकाज में 247 जजों में से सिर्फ आठ महिलाएं थीं। मौजूदा समय में जस्टिस इंदिरा बनर्जी सुप्रीम कोर्ट में अकेली महिला जज हैं। पहली महिला जज फातिमा बीवी थी, जो 1987 में नियुक्त हुई थीं। संघ का कहना है कि हाईकोर्ट जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया में देरी होने के कारण स्‍वीकृत क्षमता

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वायरल हो रही मोदी और मुस्लिम युवक की तस्‍वीर

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कान में कुछ कहते हुए एक मुस्लिम युवक की तस्वीर सोशल मीडिया में खूब वायरल हो रही है। इस तस्वीर को केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने भी सपने ट्विटर अकाउंट से शेयर किया है। जावड़ेकर ने तस्वीर शेयर करते हुए कहा कि बंगाल की जनता ने मन बना लिया है अब विकास के साथ जाना है।

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सुकमा-बीजापुर इलाके का अकेला आदिवासी चेहरा नक्‍सली कमान्‍डर हिड़मा फर्राटे से अंग्रेजी बोलता है!

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मीडिया में आयी चर्चा से पता चलता है कि हिड़मा नक्सलियों का आदिवासी चेहरा है। दंडकारण्य इलाके में हिड़मा को छोड़ बाकी सभी नक्सली लीडर आंध्रप्रदेश या अन्य प्रदेशों के हैं। हिड़मा अकेला ऐसा स्थानीय आदिवासी है जिसे कमांडर रैंक मिला है और सेंट्रल कमेटी का सदस्य भी बनाया गया है। हिड़मा ऐसा नक्सली लीडर है जो सबसे कुख्यात है पर उसके बार में फोर्स को कोई खास जानकारी नहीं है। उसकी कुछ तस्वीरें मीडिया में आती रही हैं। एक तस्‍वीर आप यहां देख सकते हैं। 

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हैश टैग #मोदी_दिवस..

:: न्‍यूज मेल डेस्‍क ::

जी हां, आज एक अप्रैल है। कई सरकारी-गैरसरकारी इवेन्‍ट, कई ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह यह तारीख हल्‍की-फुल्‍की भाषा में हंसी-मजाक परिहास, ठिठोली के लिए जाना जाता है। लेकिन इस बार यह दिन कुछ अलग हटकर चर्चा में है। जमाना सोशल मीडिया का है। जाहिर है ट्व्टिर जैसा माइक्रो-ब्‍लॉगिंग साइट खामोश कैसे रह सकता! ..और एक से बढ़कर एक चुटकियां-चिकौटियां सुबह से ही चल पड़ी थी। लेकिन सबसे ज्‍यादा चर्चा में रहा #मोदी_दिवस!..

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