एक औपचारिक आयोजन का दलीय आयोजन बन जाना!

Approved by Srinivas on Sun, 06/02/2019 - 19:56

:: श्रीनिवास ::

देश के प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल के शपथ ग्रहण समारोह, जिसमें आठ देशों के राष्ट्राध्यक्ष भी शामिल थे, में आप दुनिया को दिखाना चाहते थे कि इसी देश के एक राज्य की सरकार और सत्तारूढ़ दल के लोग हमारे लोगों की हत्या कर रहे हैं! विचारणीय है कि यह संघीय भावना और मान्यता के कितना अनुकूल था.

यह बेहद शर्मनाक और दुखद स्थिति है कि धीरे धीरे प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों के शपथ ग्रहण समारोह संबद्ध राजनीतिक दलों के कार्यक्रमों में तब्दील होते जा रहे हैं. सरकारी खर्च पर होनेवाला ऐसा औपचारिक आयोजन एक दल विशेष के शक्ति प्रदर्शन और हित साधव का माध्यम बन जाये, यह आपत्तिजनक है और चिंता का विषय होना चाहिए. श्री मोदी का शपथ ग्रहण समारोह इसका ताजा उदाहरण है. 

चुनाव में कोई किसी दल से खड़ा हो, हम किसी के समर्थक हों. पर जीतने के बाद वह पूरे क्षेत्र का प्रतिनिधि होता है. मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री किसी दल का हो, वह क्रमशः राज्य और देश का मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री होता है. इसी कारण विपक्षी और चुनाव में पराजित दल के शीर्ष पदाधिकारियों व नेताओं से ऐसे समारोह में शामिल होने की अपेक्षा की जाती है. अमूमन वे शामिल भी होते हैं. नरेंद्र मोदी की दोबारा ताजपोशी के आयोजन में भी कांग्रेस के नेताओं सहित अनेक विरोधी दलों के नेता भी शामिल हुए. लेकिन कैसा था वह समारोह?

महज एक सप्ताह पहले राजद सांसदों के समक्ष नरेंद्र मोदी के भाषण की सबने प्रशंसा की थी. माना गया कि यह श्री मोदी का नया अवतार है, कि वे एक राजनेता (स्टेट्समैन) की तरह बोले. कि इस बार वे सचमुच सबों का (खास कर अल्पसंख्यकों का) विश्वास जीतने का प्रयास करेंगे. लेकिन उस दिन क्या हुआ?

ख़बरों के अनुसार समारोह में चुनाव के दौरान बंगाल के जिन भाजपा कार्यकर्ताओं की कथित रूप से राजनीतिक हिंसा में मौत हो गयी थी, ऐसे 54 परिवारों को अतिथि के तौर पर बुलाया गया. तमाम तिक्तता के बावजूद ममता बनर्जी उस समारोह में शिरकत करनेवाली थीं. लेकिन शायद इसी कारण नहीं आयीं.

देश के प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल के शपथ ग्रहण समारोह, जिसमें आठ देशों के राष्ट्राध्यक्ष भी शामिल थे, में आप दुनिया को दिखाना चाहते थे कि इसी देश के एक राज्य की सरकार और सत्तारूढ़ दल के लोग हमारे लोगों की हत्या कर रहे हैं! विचारणीय है कि यह संघीय भावना और मान्यता के कितना अनुकूल था.

कमाल यह कि पुलवामा के आतंकवादी हमले में शहीद हुए सुरक्षा बलों के जवानों (जिनके नाम पर नोदी ने वोट भी माँगा) के परिवारों को समारोह में आमंत्रित करना उनको जरूरी नहीं लगा! यह अशालीनता, क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थ का प्रदर्शन और एक सरकारी आयोजन का दलीय इस्तेमाल करना नहीं तो और क्या था? और आप उम्मीद करते हैं कि आपके सदाशयता भरे भाषण पर लोग यकीन कर लें?
  
2005 में जब नीतीश कुमार पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले रहे थे, तब शायद पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती राबडी देवी (जहाँ तह मुझे याद है) उस समारोह में शामिल नहीं हुई थीं. मुझे बुरा लगा था. वह असहिष्णुता और राजनीतिक मतभेद के शत्रुता में बदल जाने का घटिया उदहारण लगा था. पता नहीं, इस राजनीतिक अछूतवाद की शुरुआत किसने की. लेकिन जब सत्ता पक्ष का वर्ताव ऐसा हो, तो विपक्ष से हम क्या उम्मीद कर सकते हैं. और यहां तो एक भूतो-न-भविष्यति के रूप में प्रचारित, महान और लोकप्रिय नेता ने जो किया, उससे ऐसे आयोजनों की पवित्रता पर और भी गंभीर आंच आयी है. एक गलत परंपरा स्थापित हो रही है, जिसका श्रेय मोदी-शाह की जोड़ी को ही मिलेगा.

About the Author

Srinivas

मूल रूप से समाजकर्मी, फिर पत्रकार रहे श्रीनिवास जी की सम-सामयिक मुद्दों में विशेष रुचि रही है। पत्रकारिता में आने से पहले वह 74' के बिहार (संयुक्त) आंदोलन और जेपी द्वारा गठित छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी में सक्रिय थे। पत्रकारिता के आरंभ से अंत तक रांची से प्रकाशित 'प्रभात खबर' की संपादकीय टीम में रहे। 1989 में हरिवंश जी संपादक बने तो संपादकीय पन्ने की जिम्मेवारी इन्हें मिली। सेवानिवृत्ति के बाद लेखन के साथ ही सामाजिक आयोजनों व गतिविधियों में शामिल रहते हैं।

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