राहुल गांधी का मूढ़ा पटकना

Approved by Srinivas on Tue, 07/30/2019 - 23:29

:: श्रीनिवास ::

हो सकता है, कांग्रेस जल्द ही नेतृत्व की समस्या का हल खोज ले. संभव है, जल्द ही गांधी/नेहरू परिवार से बाहर का कोई नेता कांग्रेस का अध्यक्ष बन जाये. और हो सकता है, यह पार्टी के हित में साबित हो. हालांकि यह इतना आसान नहीं होगा. यदि यह दांव उल्टा पड़ा, क्योंकि यह आशंका निराधार नहीं है कि देश भर के कांग्रेसी आसानी से नये नेतृत्व को स्वीकार कर लेंगे. तब पार्टी बिखर भी सकती है; और इसका श्रेय राहुल गांधी को भी जायेगा.

संसदीय चुनाव में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद राहुल गांधी का कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद से इस्तीफा देना अप्रत्याशित नहीं था. पार्टी की विफलता के लिए अध्यक्ष अपनी नैतिक जवाबदेही स्वीकार कर पद छोड़ने की पेशकश करे, यह स्वाभाविक है. फिर अपने इस्तीफे पर अड़ कर उन्होंने अपनी दृढ़ता का परिचय दिया; बताया कि इस्तीफा कोई दिखावे के लिए नहीं दिया था, जैसा कि उनके विरोधी मजाक उड़ाते हुए कह रहे थे. मगर सवाल है कि जब पार्टी एकदम पस्तहाल हो, अपने सबसे बुरे दौर म़े हो, तब उनके इस्तीफे से पार्टी को मजबूती मिलेगी; या कि वह और रसातल को चली जायेगी? क्या राहुल गांधी ने इस सवाल पर विचार किया?

कांग्रेस का क्या होगा, कायदे से कांग्रेस से इतर किसी व्यक्ति की चिंता या चर्चा का विषय नहीं होना चाहिए. लेकिन चूंकि कांग्रेस अब भी विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी है; और देश भर में वही भाजपा को चुनौती देने की स्थिति में है, इसलिए आज जिस तरह से 'विपक्ष विहीन' भारत बनता नजर आ रहा है,  विपक्षी दल के नाते अपना दायित्व निभाने के बजाय कांग्रेस का यूं मरनासन्न नजर आना कोई सहज या स्वागतयोग्य परिघटना तो नहीं ही है. फिलहाल तो ऐसा लगता है, मानो राहुल गांधी ने मूढ़ा पटक दिया है. 'मूढ़ा पटकना' एक देहाती शब्दावली/मुहावरा है. जब गाड़ी या हल में जुता कोई बैल आगे चलने से एकदम इनकार कर देता है, कंधे पर लदा जुआ पटक देता है, उस हालत में कहा जाता है-बैल ने मूढ़ा पटक दिया. यह बैल के मूड पर निर्भर करता है. उसे इससे क्या मतलब कि मूढ़ा पटकने से उस पर निर्भर किसान या यात्रियों का क्या होगा. राहुल गांधी का रवैया भी कुछ वैसा ही है.

हो सकता है, कांग्रेस जल्द ही नेतृत्व की समस्या का हल खोज ले. संभव है, जल्द ही गांधी/नेहरू परिवार से बाहर का कोई नेता कांग्रेस का अध्यक्ष बन जाये. और हो सकता है, यह पार्टी के हित में साबित हो. हालांकि यह इतना आसान नहीं होगा. यदि यह दांव उल्टा पड़ा, क्योंकि यह आशंका निराधार नहीं है कि देश भर के कांग्रेसी आसानी से नये नेतृत्व को स्वीकार कर लेंगे. तब पार्टी बिखर भी सकती है; और इसका श्रेय राहुल गांधी को भी जायेगा.

ऐसा लगता है कि राहुल गांधी के सलाहकार किसी काम के नहीं हैं; या वे किसी की सुनते नहीं. वैसे भी वे बाकायदा निर्वाचित अध्यक्ष तो थे/हैं नहीं. यह पद उन्हें विरासत म़े मिला. इसलिए उन पर कोई दबाव हो कैसे सकता था. लेकिन यदि उन्हें लगता है कि नेहरू-गांधी परिवार से बाहर का कोई सख्श पार्टी को बेहतर चला सकता है, तो यह एहसास उन्हें तभी होना चाहिए था, जब वे माता जी के आदेश और  निर्देश पर अध्यक्ष बन बैठे. यदि नेतृत्व के लिए एक परिवार पर आश्रित होना पार्टी की बड़ी कमजोरी है, तो यह स्थिति तो राहुल गांधी के परिवार के कारण ही बनी है; और इसका उन्हें भलीभांति एहसास होना चाहिए. वे चाहते तो जब उन्हें अध्यक्ष नामित किया गया, तभी अड़ जाते कि अध्यक्ष का बाकायदा चुनाव होगा. जो भी हो, आज की सच्चाई यही है कि कांग्रेस जैसी भी है, इस परिवार रूपी गोंद के कारण ही एक है. और यह स्थिति अचानक नहीं बनी है. और न ही वह अचानक पटरी पर आ सकती है. राहुल गांधी दल में वास्तविक लोकतंत्र कायम करना चाहते हैं, तो यह अच्छी बात है. लेकिन यह एक झटके में हो सकेगा, यह संभव नहीं लगता. वे ईमानदारी और गंभीरता से वह प्रक्रिया शूरू करते, यह अधिक व्यावहारिक और सही तरीका होता. हां, यदि उनका राजनीति से मन ऊब गया है; या उन्होंने मान लिया है कि राजनीति उनके वश की बात नहीं है, तो इसे भी खुल कर कहना चाहिए.

कोई शक नहीं कि अध्यक्ष बनने के बाद; और उसके पहले से राहुल गांधी ने पूरे दमखम से प्रयास किया. भाजपा के तमाम दुष्प्रचार के बावजूद 'पप्पू' के इमेज को तोड़ कर एक गंभीर और संयमित नेता की छवि अर्जित की. जीत और हार तो होती रहती है.वैसे भी भाजपा की अप्रत्याशित जीत की वजह कांग्रेस या अन्य दलों के निकम्मेपन के अलावा यह भी रही कि संघ अपने सतत प्रयास से हिंदुओं, खास कर उत्तर भारत के, में उनके हिंदू होने का मिथ्या दंभ भरने में सफल रहा. यह जीत मोदी सरकार की पांच साल  की किसी बड़ी उपलब्धि के बजाय चुनाव के समय उग्र राष्ट्रवाद, जो दरअसल हिंदू राष्ट्रवाद है, के आक्रामक अभियान मिली. इसके लिए भाजपा/मोदी ने पुलवामा और बालाकोट का बखूबी इस्तेमाल किया.
और भाजपा को रोकने में अकेले कांग्रेस नहीं, सभी दल नाकाम रहे. बल्कि कांग्रेस के सांसदों की संख्या में बढ़ोतरी ही हुई. लेकिन इस नाजुक वक्त में सामने रह कर पार्टी को एकजुट रखने का दायित्व निभाने के बजाय इस्तीफा देकर निष्क्रिय हो जाना कोई त्याग नहीं, पलायन है.

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Srinivas

मूल रूप से समाजकर्मी, फिर पत्रकार रहे श्रीनिवास जी की सम-सामयिक मुद्दों में विशेष रुचि रही है। पत्रकारिता में आने से पहले वह 74' के बिहार (संयुक्त) आंदोलन और जेपी द्वारा गठित छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी में सक्रिय थे। पत्रकारिता के आरंभ से अंत तक रांची से प्रकाशित 'प्रभात खबर' की संपादकीय टीम में रहे। 1989 में हरिवंश जी संपादक बने तो संपादकीय पन्ने की जिम्मेवारी इन्हें मिली। सेवानिवृत्ति के बाद लेखन के साथ ही सामाजिक आयोजनों व गतिविधियों में शामिल रहते हैं।

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