किसानों के साथ हूं, भारत बंद के साथ नहीं

Approved by Srinivas on Mon, 12/07/2020 - 23:06

:: श्रीनिवास ::

फिर इससे हासिल भी क्या होता है? एकदम अप्रत्याशित या पूरे देश के मानस को छूने वाला कोई कारण या मुद्दा न हो, तो मुझे नहीं लगता कि बंद बुलाने वालों और उनके कट्टर समर्थकों के अलावा बंद को आम आदमी का समर्थन मिलता है. उल्टे यह भी संदिग्ध है कि संबद्घ मांगों से सहमत सभी लोग खुले मन से बंद का समर्थन करते होंगे.

किसी भी समूह, समुदाय या संगठन को अपनी मांगों के समर्थन या सरकार के किसी फैसले के विरोध में शांतिपूर्ण प्रदर्शन सहित अन्य आंदोलनात्मक कार्यक्रम करने का अधिकार है. यह संवैधानिक भी है. मगर समाज के अन्य लोगों के स्वतंत्र विचरण के अधिकार को बाधित करने का नहीं. पता नहीं इस बारे में संविधान क्या कहता है, मगर 'बंद' का आयोजन निश्चय ही दूसरों को परेशान करने का कारण बनता है. इसकी तुलना जुलूस से नहीं की जा सकती. तब भी परेशानी होती है, पर थोड़े वक्त के लिए.

सरकार का कोई फैसला आपको या हमको कितना भी गलत लगता हो, दूसरों को वह सही भी लग सकता है. ऐसी मांगों पर अनिश्चित काल तक किसी शहर, राज्य या देश के सामान्य जन जीवन को ठप कर देना मुझे सही नहीं लगता.

फिर इससे हासिल भी क्या होता है? एकदम अप्रत्याशित या पूरे देश के मानस को छूने वाला कोई कारण या मुद्दा न हो, तो मुझे नहीं लगता कि बंद बुलाने वालों और उनके कट्टर समर्थकों के अलावा बंद को आम आदमी का समर्थन मिलता है. उल्टे यह भी संदिग्ध है कि संबद्घ मांगों से सहमत सभी लोग खुले मन से बंद का समर्थन करते होंगे.

बंद की 'सफलता' से यह भी साबित नहीं होता कि बंद को संबद्घ शहर, राज्य या देश की अधिसंख्य जनता का समर्थन हासिल है. सभी जानते हैं कि अमूमन बंद 'सफल' कैसे होता है. खुद बंद के आयोजकों के मन में जनता के समर्थन को लेकर संदेह रहता है. तभी तो दूसरों से घरों में बंद रहने की अपील करने वाले खुद झुण्ड में बाहर निकल पड़ते हैं. बहुदा लाठी डंडों से लैस होकर. जो दुकानें खुली हों, जिन वाहन चालकों ने उनके फरमान की अनसुनी कर बाहर निकलने की जुर्रत की हो, उनसे बंद को सफल बनाने की ‘अपील’ करने के लिए.

बंद आयोजक नेताओं की तमाम भलमनसाहत और अपील के बावजूद बंद के उसाही समर्थक बेकाबू होते ही हैं. राहगीरों, दुकानदारों, वाहन.चालकों को परेशान करते ही हैं. कई बार तोड़फोड़ और आगजनी भी. इस तरह बंद ‘शांतिपूर्ण भी नहीं ही रह पाता. नतीजतन प्रशासन/सरकार को बल प्रयोग का, दमन का बहाना मिल जाता है.

जन समर्थन से बंद की सफलता का अनूठा उदाहरण असम आन्दोलन के दौरान दिखा था. जहाँ तक (मीडिया रपटों के आधार पर) मुझे याद है, तब ‘आसू’ के आह्वान पर सचमुच स्वतःस्फूर्त बंद होता था. सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद लोग घरों से नहीं निकलते थे; और जब पुलिस कर्फ्यू लगाती थी, तब आन्दोलन समर्थक हजारों की तादाद में बाहर निकल पड़ते थे. कर्फ्यू की धज्जी उड़ जाती थी.

हां, मैं खुद आन्दोलन (1974-75) के दौरान और उसके बाद भी अनेक ‘बंद’ के समर्थन में रहा हूं. बंद कराने के लिए झुण्ड में भी निकला हूं. लेकिन क्या इसी कारण यह एहसास होने के बाद भी कि ऐसे जबरिया बंद का कोई औचित्य नहीं रह गया है, उसका समर्थन करते रहना चाहिए? धीरे धीरे अपने अनुभवों और अनेक बंद में शामिल, कइयों का समर्थक और तमाशबीन रहने के बाद इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि शांतिमय प्रतिरोध के औजार के रूप में अब ‘बंद’ का कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं बचा है. और राजनीति-कर्मियों को इस पर चिंतन करना चाहिए. कुछ मित्र/ बंद समर्थक सवाल कर सकते हैं कि जब सरकार संवेदनहीन और जनविरोधी हो जाए, अंत किसी प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शन का उस पर कोई असर न पड़ता हो तो आखिर क्या किया जाए? मेरा जवाब है कि सरकार और प्रशाहन के शीर्ष नेतृत्व और अधिकारियों के कार्यालयों पर धरना दें. लाठी खाने और जेल जाने की तैयारी के साथ. जहाँ आगे बढ़ने से रोक दिया जाये, वहां गिरफ्तारी होने तक बैठ जाएँ. विरोध और नाराजगी सरकार से है, तो उसे सीधे सरकार के समक्ष व्यक्त होना चाहिए.

About the Author

Srinivas

मूल रूप से समाजकर्मी, फिर पत्रकार रहे श्रीनिवास जी की सम-सामयिक मुद्दों में विशेष रुचि रही है। पत्रकारिता में आने से पहले वह 74' के बिहार (संयुक्त) आंदोलन और जेपी द्वारा गठित छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी में सक्रिय थे। पत्रकारिता के आरंभ से अंत तक रांची से प्रकाशित 'प्रभात खबर' की संपादकीय टीम में रहे। 1989 में हरिवंश जी संपादक बने तो संपादकीय पन्ने की जिम्मेवारी इन्हें मिली। सेवानिवृत्ति के बाद लेखन के साथ ही सामाजिक आयोजनों व गतिविधियों में शामिल रहते हैं।

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