Making of HANDIA (the Rice Bear)

अगर आप झारखंड या देश के किसी आदिवासी इलाके में रहते हैं या वहां जा चुके हैं तो हंड़िया से परिचित जरूर होंगे। अमूमन गैरआदिवासी, तथाकथित सभ्य लोग हंड़िया पेय को हेय दृष्टि से देखते हैं। आपने उनसे यह कटाक्ष सुना भी होगा, अरे उ सोमरा.. कहीं हड़िया दारू पीके उलार होगा!.. लेकिन ठहरिये, हंड़िया के बारे में तुरंत कोई धारणा बनाने से पहले उसके दूसरे पहलु जान तो लीजिए! आपको पता है, हंड़िया शब्द अब भारत के किसी पिछड़े, जंगली इलाके तक सीमित नहीं। विश्‍व की प्रतिष्ठित अंग्रेजी डिक्शनरी ऑक्सफोर्ड ने हंड़िया शब्द को अपने कोश में समायोजित कर रखा है। जी हां, ऑक्सफोर्क्ड ऐडवान्स्ड लर्नर्स डिक्शनरी ने हंड़िया शब्द को अपने पांचवें संस्करण में, वर्ष 1996 में ही, शामिल कर लिया था। हंड़िया..ए टाइप ऑफ कन्ट्री लीकर मेड फ्रॉम राइस। हां शायद इसलिए, चावल से बनने वाले हंड़िया को कुछ लोग राइस बीयर भी कहने लगे हैं। वैसे इस तरह के राइस बीयर का प्रचलन कई अन्य देशों महाद्वीपों में भी खूब है। तिब्बत और नेपाल में, चावल की वाइन को रसी कहा जाता है जबकि इसे थाईलैंड में सोंटी कहा जाता है। लाओस में, चावल की वाइन को लाओ-लाओ के रूप में संदर्भित किया जाता है, चीनी इसे चौजु, माजिउ या लाओ-ज़ो कहते हैं। बालिनी इसे ब्रम कहते हैं, कोरियाई इसे गमजू और मक्काली जैसे नामों से जानते हैं। जापान में चावल का वाइन विभिन्न नाम अर्थात अमाकेज, सैके और मिरिन के नाम से जाना जाता है। जाहिर है जब विश्‍व भर में चावल से बने इस पेय का चलन है तो इसके फायदे भी होंगे। इस वीडियो में हम हंड़िया के बारे में विस्तार से जानेंगे। यूं तो झारखंड के अलावा हंड़िया का प्रयोग उड़ीसा, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, प बंगाल, सहित कई प्रदेशों के अधिकांश आदिवासी इलाकों में होता है, लेकिन आज हम बात करेंगे झारखंड में बननेवाले हंड़िया के बारे हैं। जी हां, इसके औषधीय गुणों पर चर्चा से लेकर, आदिवासी संस्कार, परंपरा में रचे बसे हंड़िया को बनाने की विधि भी नजदीक से देखेंगे।


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