नई दिल्ली: देश में वामपंथी उग्रवाद (माओवाद) को खत्म करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा तय की गई 31 मार्च 2026 की समय-सीमा अब करीब है। लेकिन संकेत मिल रहे हैं कि यह लक्ष्य भले ही काफी हद तक हासिल हो जाए, फिर भी इसे लेकर कोई बड़ा राजनीतिक उत्सव या घोषणा नहीं की जाएगी।
केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah द्वारा तय की गई इस समय-सीमा का असली उद्देश्य राजनीतिक लाभ लेना नहीं, बल्कि सभी पक्षों—सुरक्षा बलों, प्रशासन, राजनीतिक नेतृत्व, आम जनता और यहां तक कि माओवादी समूहों—को एक साझा लक्ष्य की ओर केंद्रित करना था।
इस रणनीति ने जमीन पर एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव पैदा किया, जिससे अभियान को गति मिली और विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित हुआ।
सूत्रों के अनुसार, सरकार की प्राथमिकता व्यावहारिक सफलता और जमीनी परिणाम रही है, न कि किसी प्रकार का राजनीतिक प्रचार। इसलिए, भले ही माओवाद के खिलाफ अभियान निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है, इसे बड़े राजनीतिक आयोजन के रूप में प्रस्तुत करने की संभावना कम है।
हाल के समय में सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई, माओवादी नेताओं के आत्मसमर्पण और सीमित होते प्रभाव क्षेत्र से यह संकेत मिल रहा है कि दशकों पुराना यह आंदोलन अब अपने अंत के करीब है।
देश में माओवाद के खिलाफ लड़ाई निर्णायक दौर में है, लेकिन सरकार इसे राजनीतिक उपलब्धि के रूप में दिखाने के बजाय एक रणनीतिक और प्रशासनिक सफलता के रूप में देख रही है।

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