नई दिल्ली | मार्च 2026
ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच भड़की युद्ध की लपटों ने न केवल खाड़ी क्षेत्र को झुलसाया है, बल्कि भारत की ‘विश्वगुरु’ वाली विदेश नीति की कलई भी खोल दी है। विपक्षी दलों और अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का एक बड़ा धड़ा अब खुलकर कह रहा है कि भारत की विदेश नीति न केवल दिशाहीन हो चुकी है, बल्कि वह अमेरिकी दबाव के आगे पूरी तरह नतमस्तक है।
- स्वायत्तता का विसर्जन: वॉशिंगटन का ‘रबर स्टैंप’ बना भारत?
भारत की विदेश नीति की नींव ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) पर टिकी थी, लेकिन आलोचकों का तर्क है कि मौजूदा सरकार ने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया है। ईरान जैसे पुराने और भरोसेमंद दोस्त से दूरी बनाकर भारत ने यह संदेश दिया है कि उसकी नीतियां अब दिल्ली से नहीं, बल्कि वॉशिंगटन से तय हो रही हैं। विशेषज्ञों का सवाल है— “क्या भारत अब इतना कमजोर हो गया है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों के लिए अमेरिका की आंखों में आंखें डालकर बात नहीं कर सकता?” - चाबहार का ‘सफेद हाथी’ और ऊर्जा सुरक्षा की विफलता
भारत ने चीन के ‘बेल्ट एंड रोड’ प्रोजेक्ट को चुनौती देने के लिए ईरान के चाबहार पोर्ट में करोड़ों डॉलर झोंक दिए। आज युद्ध की स्थिति में वह निवेश मिट्टी में मिलता दिख रहा है।
रणनीतिक हार: जब भारत को वहां अपनी मौजूदगी मजबूत करनी थी, तब वह पीछे हट गया, जिससे चीन को पैर पसारने का सुनहरा मौका मिल गया।
महंगाई का बोझ: विपक्ष का सीधा आरोप है कि सरकार ने अमेरिकी प्रतिबंधों के डर से ईरान से सस्ता कच्चा तेल खरीदना बंद किया। इसका सीधा परिणाम आज आम जनता भुगत रही है, जो 100 रुपये से कहीं अधिक महंगे पेट्रोल और डीजल के बोझ तले दब चुकी है। - ‘इज़राइल-केंद्रित’ दृष्टि और सिमटता प्रभाव
भारत की सदियों पुरानी ‘संतुलन की नीति’ अब पूरी तरह डगमगा गई है। आलोचकों का कहना है कि सरकार की नीति अब केवल इज़राइल-केंद्रित होकर रह गई है, जिससे पूरा अरब जगत और ईरान भारत से छिटक गए हैं। जिस खाड़ी क्षेत्र में भारत का दबदबा था, वहां आज भारत एक मूकदर्शक बनकर रह गया है। यह केवल कूटनीतिक विफलता नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक ब्लंडर (Blunder) है। - लाखों भारतीयों की सुरक्षा: राम भरोसे छोड़ दिए गए कामगार?
इराक और ईरान में आज लाखों भारतीय कामगार मौत के साये में जी रहे हैं। विपक्षी नेताओं का कहना है कि सरकार के पास युद्धग्रस्त क्षेत्रों से अपने नागरिकों को निकालने के लिए कोई ठोस ‘कंटिंजेंसी प्लान’ नहीं है। यूक्रेन और सूडान संकट से सबक लेने के बजाय, सरकार एक बार फिर केवल ‘ट्विटर’ और ‘वीडियो संदेशों’ के भरोसे बैठी है, जबकि जमीनी हकीकत भयावह है। - चीन-पाकिस्तान की ‘जुगलबंदी’ और भारत की चुप्पी
सबसे शर्मनाक स्थिति यह है कि जिस संकट में भारत को मध्यस्थ होना चाहिए था, वहां चीन और पाकिस्तान बाजी मार ले गए हैं। चीन ने ईरान के साथ अपनी साझेदारी और मजबूत कर ली है, जिससे भारत के चारों ओर एक ‘कूटनीतिक घेराबंदी’ (Diplomatic Encirclement) तैयार हो गई है। जानकारों का कड़ा प्रहार है— “जब पड़ोसी मुल्क शांति की बात कर रहे हैं और संबंध मजबूत कर रहे हैं, तब दिल्ली की चुप्पी उसकी विफलता की सबसे बड़ी गूंज है।”
निष्कर्ष: ईरान-अमेरिका युद्ध ने भारत की विदेश नीति के खोखलेपन को उजागर कर दिया है। यदि समय रहते ‘सिद्धांतों’ से ज्यादा ‘परिणामों’ पर ध्यान नहीं दिया गया, तो भारत आने वाले दशकों में मध्य-पूर्व की राजनीति से पूरी तरह बाहर हो जाएगा।
संसद की गूंज: विपक्ष के 5 सबसे ‘घातक’ सवाल
जब संसद में विदेश मंत्रालय ने ईरान-यूएस युद्ध पर अपनी रिपोर्ट पेश की, तो विपक्षी दलों ने आंकड़ों और इतिहास का हवाला देते हुए सरकार को इन बिंदुओं पर घेरा:
- “लाल आंखें” केवल चुनावी रैलियों के लिए?
विपक्ष ने सदन में गरजते हुए पूछा कि चीन और पाकिस्तान जब ईरान के साथ मिलकर नई ‘धुरी’ (Axis) बना रहे हैं, तब प्रधानमंत्री की “लाल आंखें” और “56 इंच का सीना” कहां गायब है? क्या सरकार ने चीन को मध्य-पूर्व का नया चौधरी बनने के लिए खुला मैदान दे दिया है? - सस्ता तेल क्यों नहीं? जनता का पैसा या अमेरिका का डर?
संसद के पटल पर विपक्ष ने कड़ा सवाल रखा— “जब रूस से तेल खरीदने पर पाबंदी नहीं थी, तो ईरान से सस्ता तेल खरीदने की हिम्मत क्यों नहीं दिखाई गई? क्या भारत की जनता की जेब से ज्यादा कीमती वॉशिंगटन की नाराजगी है?” 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा रहे तेल ने सरकार की ‘ऊर्जा कूटनीति’ की बखिया उधेड़ दी है। - चाबहार: अरबों का निवेश या ‘मृत परियोजना’?
विपक्ष ने सरकार से जवाब मांगा कि चाबहार पोर्ट पर खर्च किए गए हजारों करोड़ रुपये का हिसाब क्या है? यदि युद्ध के समय हम इस पोर्ट का उपयोग अपने नागरिकों को निकालने या व्यापार के लिए नहीं कर सकते, तो क्या यह प्रोजेक्ट केवल फोटो खिंचवाने के लिए था? - इजरायल के साथ ‘अंधा मोह’ और अरबों से दूरी:
सदन में यह आरोप लगाया गया कि सरकार की ‘वन-साइडेड’ इजरायल समर्थक नीति ने भारत को अरब जगत में अलग-थलग कर दिया है। विपक्ष ने पूछा— “क्या सरकार ने यह सोच लिया है कि हमें उन 80 लाख भारतीयों की परवाह नहीं है जो खाड़ी देशों में काम करते हैं और देश की अर्थव्यवस्था को विदेशी मुद्रा (Remittances) भेजते हैं?” - रेस्क्यू ऑपरेशन का ‘ब्लूप्रिंट’ कहाँ है?
इराक और ईरान के युद्ध क्षेत्रों में फंसे लाखों भारतीयों के माता-पिता की चिंता का हवाला देते हुए विपक्ष ने पूछा— “क्या सरकार फिर से तब जागेगी जब लोग हवाई अड्डों पर फंसे होंगे? सूडान और यूक्रेन की तरह ‘लास्ट मिनट’ प्लानिंग के बजाय कोई ठोस ‘निकासी प्रोटोकॉल’ क्यों नहीं है?”
निष्कर्ष: दिल्ली के पास जवाब नहीं!
इन सवालों पर सरकार की ओर से दिया गया ‘परिस्थितियों का अध्ययन कर रहे हैं’ वाला जवाब विपक्ष को शांत नहीं कर पाया है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा गर्म है कि “मोदी 3.0” की विदेश नीति अपने सबसे बड़े ‘डिप्लोमैटिक टेस्ट’ में फेल होती दिख रही है।
ओपिनियन: क्या ‘वॉशिंगटन’ के मोह में दिल्ली ने गंवा दिया अपना ‘ईरान’? एक कूटनीतिक विफलता का पोस्टमार्टम
आज जब ईरान-यूएस और इज़राइल के बीच का संघर्ष एक पूर्ण युद्ध में तब्दील हो चुका है, तब भारतीय विदेश नीति के गलियारों में एक असहज सन्नाटा पसरा है। यह सन्नाटा किसी ‘रणनीतिक धैर्य’ का हिस्सा नहीं, बल्कि उस विफलता की गूंज है जिसे ‘विश्वगुरु’ का चश्मा पहनकर अनदेखा किया जा रहा है। सवाल तीखा है: क्या हमने अपने राष्ट्रीय हितों को अमेरिकी तुष्टीकरण की वेदी पर चढ़ा दिया है?
गुटनिरपेक्षता का मुखौटा और हकीकत का आईना
दशकों तक भारत ने ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ का दम भरा, लेकिन आज वह स्वायत्तता कहीं दिखाई नहीं देती। जब रूस-यूक्रेन युद्ध में भारत ने अपनी स्वतंत्र राह चुनी थी, तो उम्मीद जगी थी कि भारत एक वैश्विक शक्ति के रूप में उभरेगा। लेकिन ईरान के मामले में भारत का रवैया ‘डरपोक कूटनीति’ (Cowering Diplomacy) जैसा नजर आता है। अमेरिकी प्रतिबंधों के जरा से डराने पर हमने ईरान से सस्ता तेल खरीदना बंद कर दिया, जिसका खामियाजा आज भारत का हर नागरिक पेट्रोल पंप पर भुगत रहा है।
चाबहार: एक दफन होता सपना?
भारत ने चाबहार बंदरगाह को अपनी सबसे बड़ी रणनीतिक जीत बताया था। कहा गया था कि यह चीन के ‘ग्वादर’ का जवाब है। लेकिन आज हकीकत क्या है? युद्ध की आग में झुलसते इस क्षेत्र में चाबहार आज एक ‘सफेद हाथी’ बनकर रह गया है। भारत की सुस्ती का फायदा उठाकर चीन ने ईरान के साथ 400 अरब डॉलर का करार कर लिया। आज तेहरान में भारत की जगह बीजिंग के कूटनीतिज्ञों का दबदबा है। यह केवल निवेश की हार नहीं, बल्कि भारत के ‘पश्चिम एशिया विजन’ की मौत है।
मध्यस्थता की दौड़ में पिछड़ता भारत
एक समय था जब खाड़ी देशों में भारत की आवाज सुनी जाती थी। आज जब ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध छिड़ा है, तो मध्यस्थ की भूमिका में पाकिस्तान और चीन नजर आ रहे हैं। भारत, जो कभी इस क्षेत्र का स्वाभाविक अगुआ था, आज एक ‘मूक दर्शक’ की तरह कोने में खड़ा है। हमारी विदेश नीति का केवल ‘इज़राइल-केंद्रित’ हो जाना एक बड़ी रणनीतिक भूल साबित हुई है, जिसने हमें हमारे पुराने और भरोसेमंद सहयोगियों से काट दिया है।
लाखों भारतीयों की सुरक्षा: क्या हम तैयार हैं?
संसद में विपक्ष का यह सवाल कि “निकासी का प्लान क्या है?”, सरकार को चुभना चाहिए। इराक और ईरान में फंसे लाखों भारतीय कामगार केवल ‘रेमिटेंस’ भेजने वाली मशीनें नहीं हैं। उनकी सुरक्षा के प्रति सरकार की ढिलाई और ‘लास्ट मिनट’ मैनेजमेंट की आदत इस बार भारी पड़ सकती है। क्या हम फिर से किसी त्रासदी का इंतजार कर रहे हैं?
निष्कर्ष: साख बचाने की आखिरी कोशिश
दिल्ली को यह समझना होगा कि विदेश नीति केवल ‘इवेंट मैनेजमेंट’ या विदेशी दौरों पर गले मिलने से नहीं चलती। इसके लिए कठिन फैसले और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए ‘नो’ कहने की ताकत चाहिए। यदि भारत ने तुरंत मध्य-पूर्व में अपनी सक्रियता नहीं बढ़ाई और अपनी स्वतंत्र राह नहीं तलाशी, तो इतिहास इस दौर को “भारतीय कूटनीति के पतन के काल” के रूप में याद रखेगा।
वक्त आ गया है कि हम ‘वॉशिंगटन’ के चश्मे को उतारकर ‘नई दिल्ली’ की आंखों से दुनिया को देखना शुरू करें। वरना, चाबहार की राख और महंगे तेल की आग हमें बहुत कुछ सिखाने वाली है।

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