संविधान संशोधन बिल गिरने पर मोदी सरकार का ‘रोना’, परिसीमन के खेल पर घिरी सरकार

मोदी सरकार द्वारा लाया गया संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में पारित नहीं हो सका, जो हाल के वर्षों में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और विधायी घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है। इस विधेयक के पक्ष में लगभग 298 वोट पड़े, जबकि इसके विरोध में करीब 230 सांसदों ने मतदान किया। हालांकि साधारण बहुमत सरकार के पक्ष में था, लेकिन संविधान संशोधन के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत (लगभग 352 वोट) न मिलने के कारण यह विधेयक गिर गया।

इस विधेयक में लोकसभा की सीटों को 543 से बढ़ाकर लगभग 850 करने और महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने का प्रस्ताव था। साथ ही, इसे जनगणना के बाद होने वाली परिसीमन प्रक्रिया (delimitation) से जोड़ा गया था। यहीं से विवाद की शुरुआत हुई। विपक्षी दलों का आरोप था कि सरकार ने महिला आरक्षण जैसे व्यापक समर्थन वाले मुद्दे को परिसीमन जैसे संवेदनशील और विवादित विषय के साथ जोड़कर पेश किया, जिससे इसके पीछे राजनीतिक मंशा पर सवाल खड़े हुए।

वर्तमान में लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व लगभग 14 प्रतिशत है, जबकि राज्यसभा में यह करीब 17 प्रतिशत और राज्य विधानसभाओं में लगभग 10 प्रतिशत के आसपास है। ऐसे में महिला आरक्षण का मुद्दा लंबे समय से चर्चा में रहा है, लेकिन इसे लागू करने की प्रक्रिया और शर्तों को लेकर लगातार मतभेद बने हुए हैं।

इस विधेयक का एक बड़ा विरोध दक्षिण भारतीय राज्यों की ओर से सामने आया। उनका तर्क है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों के पुनर्वितरण से उन राज्यों का प्रभाव कम हो सकता है, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है। इस तरह यह मुद्दा केवल प्रतिनिधित्व का नहीं, बल्कि संघीय संतुलन का भी बन गया है। उत्तर और दक्षिण भारत के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर यह तनाव इस विधेयक की असफलता का एक प्रमुख कारण रहा।

संविधान संशोधन की प्रक्रिया स्वभावतः कठिन होती है। अनुच्छेद 368 के तहत ऐसे किसी भी संशोधन के लिए सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई समर्थन आवश्यक होता है। यही कारण है कि साधारण बहुमत होने के बावजूद सरकार इस विधेयक को पारित नहीं करा सकी। यह घटना इस बात को भी रेखांकित करती है कि संवैधानिक बदलाव के लिए व्यापक राजनीतिक सहमति अनिवार्य होती है।

राजनीतिक स्तर पर भी इस मुद्दे ने अलग-अलग नैरेटिव को जन्म दिया। सरकार ने इसे महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ विपक्ष का रुख बताया, जबकि विपक्ष ने इसे संघीय ढांचे को कमजोर करने और राजनीतिक संतुलन बदलने की कोशिश करार दिया। इस तरह एक संवैधानिक बहस राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में बदल गई।

अगर ऐतिहासिक दृष्टि से देखें, तो भारत में इससे पहले भी ऐसे उदाहरण मिलते हैं जब महत्वपूर्ण विधेयक सहमति के अभाव में पारित नहीं हो सके। महिला आरक्षण विधेयक का ही उदाहरण लें, जिसे पहली बार 1996 में पेश किया गया था। यह कई वर्षों तक संसद में लंबित रहा और अंततः 2010 में राज्यसभा से पारित होने के बावजूद लोकसभा में पास नहीं हो सका, जिसके कारण वह निष्प्रभावी हो गया। यह स्थिति वर्तमान परिदृश्य से काफी मिलती-जुलती है, जहां सिद्धांततः समर्थन होने के बावजूद राजनीतिक सहमति नहीं बन पाई।

इसके विपरीत, 2019 में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को 10 प्रतिशत आरक्षण देने वाला संविधान संशोधन विधेयक भारी बहुमत से पारित हुआ था। यह दिखाता है कि जब राजनीतिक सहमति मजबूत होती है, तो संविधान संशोधन अपेक्षाकृत आसानी से पारित हो सकते हैं।

समग्र रूप से देखा जाए तो इस विधेयक का गिरना केवल एक विधायी असफलता नहीं है, बल्कि यह भारत की बदलती राजनीतिक संरचना, क्षेत्रीय दलों की बढ़ती भूमिका और संघीय ढांचे के भीतर संतुलन की जटिलताओं को भी उजागर करता है। यह घटना यह स्पष्ट करती है कि संविधान में बदलाव केवल संख्या बल के आधार पर नहीं, बल्कि व्यापक संवाद और सहमति के आधार पर ही संभव है।