बंगाल विधानसभा के नतीजे आ गये हैं. नयी सरकार बन गयी है. ठीक चुनावों से पहले हुए विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में लाखों मतदाताओं को बिना सुनवाई का समय दिए उनके मताधिकार से वंचित कर दिये जाने, ईवीएम से छेड़छाड़ और केंद्रीय संस्थाओं के दुरुपयोग के आरोपों के बीच हुए इन चुनावों का विश्लेषण लंबे समय तक होता रहेगा. भाजपा लंबे समय से बंगाल में सुनियोजित ढंग से धार्मिक ध्रुवीकरण की जमीन तैयार कर रही थी और उसके लिए यह ‘जीत’ बहुत मायने रखती थी/है.
मगर तृणमूल काँग्रेस की ‘हार’ के बाद से न सिर्फ ममता बनर्जी बल्कि महुआ मोइत्रा, शायोनी घोष, और सागरिका घोष को जिस तरह से फिजिकली/वर्बली निशाना बनाया गया, उससे हमारे कथित भद्र समाज का, और खासकर राजनीति का स्त्रीद्वेष उघड़ कर सामने आ गया.
सामान्यतया एक पुरुष राजनीतिज्ञ की चुनावी हार के बाद हार के राजनैतिक कारणों का विश्लेषण होता है, चुनाव की चर्चा होती है; किसी महिला राजनीतिज्ञ की चुनावी हार के बाद उसका मजाक उड़ाया जाता है, उसका चीरहरण और चरित्रहनन किया जाता है.
तृणमूल में और भी नेता हैं, मगर आपको यही चार बर्दाश्त नहीं, कभी नहीं थीं. क्योंकि मूल रूप से आपको स्वतंत्र-खुद्दार महिलाएं, शक्तिशाली महिलाएं, शासन कर सकने वाली महिलाएं, सोचने वाली, लड़ने वाली महिलाएं बर्दाश्त नहीं. और उन्हें इस तरह अपमानित करने, और सार्वजनिक रूप से अपमानित होते देखने में एक ‘संतोष’ मिलता है, जो आपके अंदर निहित गहरे स्त्रीद्वेष का परिचायक और प्रमाण है.
बंगाल विधानसभा के नतीजे आ गये हैं. नयी सरकार बन गयी है. ठीक चुनावों से पहले हुए विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में लाखों मतदाताओं को बिना सुनवाई का समय दिए उनके मताधिकार से वंचित कर दिये जाने, ईवीएम से छेड़छाड़ और केंद्रीय संस्थाओं के दुरुपयोग के आरोपों के बीच हुए इन चुनावों का विश्लेषण लंबे…
स्वाति
और इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि ममता जैसी कद्दावर और स्वनिर्मित महिला राजनीतिज्ञ भारत की राजनीति में कम ही है; या शायद कोई नहीं. एक मायावती उभरीं, लेकिन किन्हीं कारणों से चूक गयीं!
विद्यार्थी जीवन से सड़कों पर लड़ने भिड़ने वाली इस महिला को मूलतः स्त्री विरोधी दक्षिणपंथ कभी स्वीकार नहीं कर सकता, उसके लिए राजनीति औरतों की चीज ही नहीं, और है भी तो अलंकार भर. अकेली और अविवाहित महिलाओं के प्रति भी एक दुराग्रह है समाज में. ऐसे में ममता का पुरुषों के क्षेत्र में सबसे अधिक अनुपात में महिला सांसदों को संसद में भेज कर पुरुषों को चुनौती देना, पूरे समाज को और दक्षिणपंथी जमात को कभी पच नहीं सकता.
आप ममता बनर्जी का राजनीतिक रूप से जितना चाहें विरोध कर सकते हैं, उनके शासन की आलोचना कर सकते हैं, उनकी विफलताएं गिना सकते हैं, उनकी विचारधारा को खारिज कर सकते हैं. कुछ लोग ‘ममता ने उसको छुरा घोंपा’, ‘उसके साथ गठबंधन किया’ वगैरा वगैरा याद कर रहे हैं. मगर अब यही राजनीति तो स्थापित है, किसने नहीं किये हैं बेमेल, सिद्धांतहीन गठबंधन. और इस सबके बावजूद उनकी इस दुस्साहसिक राजनैतिक यात्रा को तो स्वीकार करना ही पड़ेगा.
ममता बनर्जी में भी जो भी कमियां हों, मगर इन तथ्यों पर गौर करें- वह पूर्व सांसद का पेंशन नहीं लेती हैं- 2009 से. मुख्यमंत्री का वेतन नहीं लेती थीं. सरकारी वाहन से नहीं चलती थीं. उनकी 80 से अधिक पुस्तकें छप चुकी हैं, उनकी राययल्टी अपने लिए पर्याप्त मानती हैं. मुख्यमंत्री बनने के बाद भी अपने पुस्तैनी खपरैल मकान में ही रहती रहीं.
यदि यह सच है तो भारत में है कोई और कोई ऐसा नेता?
चुनाव नतीजे आ जाने के बाद भी ममता बनर्जी का मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा न देना भी कुछ ‘संभ्रांत’ लोगों को बहुत अशोभन लग रहा था, बहुत हंसी भी आ रही थी सबको. मगर इस देश में अब लोकतांत्रिक प्रक्रिया में प्रतिरोध का क्या तरीका बचा है? इस्तीफा कोई मामला नहीं था, वो वैसे भी मुख्यमंत्री नहीं रहीं थीं, उनकी सुरक्षा हटाई जा चुकी थी, उनके साथ कथित तौर पर धक्का मुक्की हो चुकी थी, जेठमलानी कह चुके थे- ‘किक हर आउट’, न भी किक करें तो उनका टर्म पूरा हो रहा था, बस यही हुआ कि हाथ नहीं मिलाया. मगर हाथ मिलना क्या है!! जिस चुनाव की वैधता पर ही संदेह हो, हार जीत अलग बात है, मगर हाथ मिला कर इस्तीफा देना उसे वैधता प्रदान करना नहीं हुआ?
रही बात शोभन-अशोभन की तो जिस देश में प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और मुख्यमंत्रियों की भाषा और विचार शोभनीय नहीं रह गया, वहां और क्या शोभन बचेगा. पहले कहा जाता था कि छुटभैये गाली गलौज करते हैं, मगर अब तो गली गलौज एकदम मुख्यधारा है. आप हिमंता, शुभेंदु, और योगी आदित्यनाथ की टुच्ची भाषा सुन लीजिए.
विपक्ष मुक्त भारत बनाने की राह पर चल रही जमात के लिए ममता सिर्फ एक रोड़ा नहीं थी, उसका स्त्री होकर चुनती देना अलग से और अधिक अखर रहा था!
साभार: संभवा इंजोर

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