नई दिल्ली: भारत की मेजबानी में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से एक बड़ी कूटनीतिक सफलता की खबर आई है। सदस्य देशों ने गहन विचार-विमर्श के बाद ‘नई दिल्ली घोषणापत्र 2026’ को सर्वसम्मति से मंजूरी दे दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को इस ऐतिहासिक फैसले का ऐलान करते हुए बताया कि घोषणापत्र को लेकर किसी भी सदस्य देश ने कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई है।
रातों-रात चली वार्ता और भारत की मध्यस्थता
संयुक्त बयान पर सहमति बनाना आसान नहीं था। शनिवार तड़के सुबह 4 बजे तक चले लंबे और गहन मंथन के बाद सदस्य देश एक साझा मसौदे पर राजी हुए। व्यापार, वैश्विक सुरक्षा और भू-राजनीतिक तनावों को लेकर कई मोर्चों पर मतभेद सामने आए थे, लेकिन भारत ने अपनी कूटनीतिक कुशलता का परिचय देते हुए परस्पर विरोधी रुख रखने वाले देशों के बीच सेतु का काम किया और आम सहमति कायम की।
विभाजित पश्चिम एशिया के बीच एकता का संदेश
इस घोषणापत्र का पारित होना इसलिए भी बेहद अहम माना जा रहा है क्योंकि सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और ईरान जैसे देश एक ही मंच पर मौजूद थे। पश्चिम एशिया में जारी भारी भू-राजनीतिक तनाव और क्षेत्रीय मतभेदों के बावजूद इन देशों को एक साझा दस्तावेज पर सहमत करना भारत की विदेश नीति की परिपक्वता को दर्शाता है।
‘नई दिल्ली घोषणापत्र 2026’ के प्रमुख बिंदु
शांति और कूटनीति पर जोर: घोषणापत्र में दुनिया भर में जारी संघर्षों को रोकने और उनके मूल कारणों को सुलझाने पर बल दिया गया है। अंतर्राष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के लिए बातचीत और कूटनीति को एकमात्र मार्ग बताया गया।
संरक्षणवाद पर प्रहार: ब्रिक्स देशों ने एकतरफा टैरिफ (Shifting Tariffs) और गैर-टैरिफ प्रतिबंधों में हो रही बढ़ोतरी पर गहरी चिंता व्यक्त की। बयान में स्पष्ट किया गया कि ऐसे कदम वैश्विक व्यापार को बाधित करते हैं और विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों के खिलाफ हैं।
बहुपक्षवाद का समर्थन: घोषणापत्र में एक ऐसे समावेशी बहुपक्षीय दृष्टिकोण (Multilateralism) की वकालत की गई है, जो सभी राष्ट्रों की संप्रभुता और उनके अलग-अलग दृष्टिकोणों का सम्मान करता हो।
भारत द्वारा इस जटिल वार्ता को सफलता की मंजिल तक पहुंचाना यह साबित करता है कि वैश्विक मंचों पर उभरते वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज को एकजुट करने में देश की भूमिका निरंतर मजबूत हो रही है।

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