रांची/चाईबासा: झारखंड का पश्चिम सिंहभूम जिला देश के सबसे अमीर लौह अयस्क (Iron Ore) उत्पादक क्षेत्रों में से एक है। देश के स्टील उद्योग की रीढ़ माने जाने वाले इस क्षेत्र से रोजाना करोड़ों रुपये का खनिज निकाला जाता है। लेकिन इस अकूत खनिज संपदा के बीच रहने वाले स्थानीय आदिवासी आज अपनी जमीन, पर्यावरण और वजूद को बचाने के लिए सड़कों पर हैं। सेल (SAIL) जैसी बड़ी खनन कंपनियों, केंद्र की नीतियों और स्थानीय प्रशासन के खिलाफ आदिवासियों का यह असंतोष अब एक बड़े जनांदोलन का रूप ले चुका है।
वादों की जमीन पर बेरोजगारी का दंश
आंदोलनकारी आदिवासियों का आरोप है कि खनन परियोजनाओं के लिए जब उनकी पुश्तैनी जमीन ली गई, तब उनसे बड़े-बड़े वादे किए गए थे। इनमें स्थायी रोजगार, उच्च स्तरीय शिक्षा, आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं और बुनियादी विकास शामिल थे। लेकिन दशकों बाद भी जमीनी हकीकत नहीं बदली। स्थानीय युवाओं को खनन कार्यों में स्थायी नौकरी देने के बजाय बाहरी ठेकेदारों को तवज्जो दी जा रही है, जिससे क्षेत्र में बेरोजगारी और हताशा बढ़ गई है।
पर्यावरण का विनाश और विस्थापन की मार
अंधाधुंध और अनियंत्रित माइनिंग के कारण इस खूबसूरत पहाड़ी क्षेत्र का पर्यावरण पूरी तरह तबाह हो चुका है।
• कृषि संकट: माइनिंग से निकलने वाले मलबे और लाल पानी ने पारंपरिक खेती की जमीनों को बंजर बना दिया है।
• जल स्रोत खत्म: प्राकृतिक जल स्रोत और नदियां प्रदूषित हो चुकी हैं, जिससे पीने के पानी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
• पहचान का खतरा: आदिवासियों के लिए जल, जंगल और जमीन सिर्फ आजीविका का साधन नहीं, बल्कि उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान हैं। पुनर्वास नीति (R&R Policy) के लचर क्रियान्वयन के कारण विस्थापित हुए आदिवासी अपने ही गृहक्षेत्र में शरणार्थी बनने को मजबूर हैं।
MMDR बिल 2026: जिसने आग में घी का काम किया
इस जमीनी आक्रोश को हवा देने का काम केंद्र सरकार के नए खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2026 (MMDR Bill) ने किया है। इस कानून के खिलाफ अब राजनीतिक मोर्चा भी खुल गया है। सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने इसे आदिवासियों के अधिकारों पर सीधा हमला करार दिया है। इसी के विरोध में 19 सितंबर 2026 को पश्चिमी सिंहभूम सहित पूरे झारखंड के सभी प्रखंड मुख्यालयों पर झामुमो ने एक दिवसीय महाधरना और व्यापक आंदोलन की घोषणा की है, जिसमें लाखों आदिवासियों के जुटने की संभावना है।
राजनीतिक पक्ष: “झारखंड के अधिकारों पर डकैती बर्दाश्त नहीं” — जोबा माझी
झारखंड मुक्ति मोर्चा की वरिष्ठ नेता और सिंहभूम की सांसद जोबा माझी ने केंद्र सरकार के इस कानून पर कड़ा रुख अपनाया है। कार्यकर्ताओं को एकजुट करते हुए उन्होंने कहा:
“केंद्र सरकार का नया MMDR संशोधन बिल सीधे तौर पर झारखंड के खनिज संसाधनों और आदिवासियों के अधिकारों पर डकैती है। यह कानून राज्य सरकारों की वित्तीय स्वायत्तता को कुचलता है। पश्चिम सिंहभूम के लोग वर्षों से अपनी जमीन देकर देश को स्टील दे रहे हैं, लेकिन बदले में उन्हें केवल प्रदूषण और विस्थापन मिला है। हम 19 सितंबर को इस ‘काले कानून’ के खिलाफ सड़क से लेकर सदन तक अपनी आवाज बुलंद करेंगे।”
प्रशासनिक और कॉर्पोरेट पक्ष: “विकास और सुरक्षा के बीच संतुलन”
दूसरी ओर, ज़िला प्रशासन और स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) के अधिकारियों का तर्क अलग है।
• प्रशासन का पक्ष: स्थानीय प्रशासन का कहना है कि वनों और आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए कानून के तहत हर संभव कदम उठाए जा रहे हैं। उनका दावा है कि कुछ असामाजिक तत्व और सोशल मीडिया पर फैली अफवाहें आदिवासियों को भड़का रही हैं, जबकि पारंपरिक मानकी-मुंडा स्वशासन प्रणाली को प्रशासन हमेशा उचित सम्मान देता आया है।
• SAIL की दलील: सार्वजनिक उपक्रम ‘सेल’ (SAIL) के सूत्रों के अनुसार, कंपनी अपनी कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (CSR) के तहत स्थानीय गांवों में पेयजल, स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाओं का विस्तार कर रही है। कंपनी का कहना है कि खनन कार्य पूरी तरह कानूनी पर्यावरण मंजूरियों के बाद ही किए जा रहे हैं और स्थानीय लोगों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार से जोड़ा जा रहा है।
लौह अयस्क के इस गढ़ में उपजा यह विवाद साफ संकेत देता है कि जब तक विकास के मॉडल में स्थानीय आदिवासियों की वास्तविक हिस्सेदारी और पर्यावरण सुरक्षा को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक यह असंतोष शांत होना मुश्किल है।

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