झारखंड की कोयला राजधानी कहे जाने वाले धनबाद और आसपास के झरिया-कतरास कोयला बेल्ट में जमीन धंसने (Land Subsidence), दरारें पड़ने और विषैली गैसों के रिसाव की घटनाएं भयावह रूप ले चुकी हैं। आए दिन घर जमींदोज हो रहे हैं, सड़कें टूट रही हैं और निर्दोष लोग काल के गाल में समा रहे हैं। ऊर्जा उत्पादन का मुख्य केंद्र होने के बावजूद धनबाद का यह पूरा अंचल आज एक ‘अदृश्य टाइम बम’ के मुहाने पर खड़ा है।
1. घटनाएं क्यों बढ़ रही हैं? (वैज्ञानिक एवं भू-गर्भीय कारण)
- एक सदी पुरानी भूमिगत आग: झरिया के कोयला क्षेत्रों के नीचे 100 से अधिक वर्षों से भूमिगत आग (Underground Coal Fire) धधक रही है। जब भूमिगत कोयला जलकर राख बनता है, तो जमीन के भीतर बड़े-बड़े खोखले स्थान (Voids) बन जाते हैं।
- ऑक्सीजन का चक्र: आग जलने से जमीन में दरारें आती हैं, जिनसे बाहर की ऑक्सीजन अंदर जाती है और आग को और भड़काती है। इससे ऊपरी सतह की भार सहने की क्षमता समाप्त हो जाती है और जमीन अचानक धंस जाती है।
- मानसून और जलभराव: बारिश के मौसम में पानी इन दरारों और पुरानी खदानों में घुसकर मिट्टी का कटाव करता है, जिससे भू-धसान (Sinkhole) की दर दोगुनी हो जाती है।
2. अनियोजित कोयला खनन और अवैध उत्खनन का नेटवर्क
- बोर्ड एंड पिलर तकनीक का दुष्परिणाम: आजादी से पूर्व और उसके बाद दशकों तक भूमिगत खनन में कोयले के बड़े-बड़े पिलर छोड़ दिए जाते थे। बाद में इन्हें बिना वैज्ञानिक बालू भरान (Sand Stowing) के खाली छोड़ दिया गया, जो अब ढह रहे हैं।
- अवैध खनन की दीमक: वैध खनन के समानांतर चल रहा अवैध कोयला उत्खनन इस संकट को और गंभीर बना रहा है। अवैध कारोबारी बंद या असुरक्षित खदानों में अनियोजित सुरंगें बनाकर कोयला निकालते हैं, जिससे पूरी संरचना धराशायी हो जाती है।
3. वैश्विक ऊर्जा दबाव और ओपनकास्ट माइंस का संकट
- अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा मांग: वैश्विक स्तर पर और भारत की तेजी से बढ़ती बिजली आवश्यकताओं (लगभग 70-74% कोयला आधारित ऊर्जा) को पूरा करने के लिए खनन का तीव्र दबाव है।
- भारी ब्लास्टिंग का असर: उत्पादन के लक्ष्य पूरे करने के लिए की जाने वाली हेवी ब्लास्टिंग से आसपास के रिहायशी इलाकों की जमीन हिल जाती है, जिससे कमजोर हिस्से तुरंत धंस जाते हैं।
4. खनन कंपनियों और सरकारों की लापरवाही
- खनन कंपनियों (BCCL/CIL) की नाकामी: माइनिंग रूल्स के तहत बंद हो चुकी खदानों को साइंटिफिक क्लोजर (Scientific Closure) के तहत सील और पुनर्जीवित करना अनिवार्य है, लेकिन कागजों पर हुए काम के कारण ये खदानें जानलेवा बनी हुई हैं।
- पुनर्वास योजना (Jharia Rehabilitation Plan) में ढिलाई: झरिया मास्टर प्लान के तहत प्रभावित आबादी को सुरक्षित स्थानों पर बसाने की गति बेहद धीमी और लालफीताशाही की शिकार है।
- प्रशासनिक शिथिलता: अवैध खनन पर स्थायी नकेल कसने में स्थानीय पुलिस, जिला प्रशासन और खनन कंपनियों के सुरक्षा बल (CISF) के बीच समन्वय की कमी साफ झलकती है।
धनबाद में भू-धसान केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि इंसानी अनदेखी और अनियंत्रित दोहन का नतीजा है। यदि वैज्ञानिक तरीके से बालू भरान, बंद खदानों की निगरानी, अवैध खनन पर कठोर प्रहार और प्रभावित परिवारों का त्वरित पुनर्वास नहीं किया गया, तो देश को रोशन करने वाला यह कोयलांचल खुद इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएगा।

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