नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के शिवसेना विवाद से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए भारतीय चुनाव आयोग (ECI) की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि जब दोनों गुट खुद को असली शिवसेना बता रहे थे, तो आयोग पार्टी के चुनाव चिह्न को फ्रीज कर दोनों पक्षों को नया चिह्न आवंटित कर सकता था, ताकि वे जनता के बीच अपनी ताकत साबित कर पाते।
सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस
यह सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ कर रही है। अदालत महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष द्वारा एकनाथ शिंदे गुट के विधायकों को अयोग्य न ठहराने और चुनाव आयोग द्वारा शिंदे गुट को ‘असली शिवसेना’ मानकर ‘धनुष-तीर’ चिह्न आवंटित करने के फैसले के खिलाफ उद्धव ठाकरे गुट की याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि यदि सभी तय पैमानों पर असमंजस की स्थिति थी, तो चुनाव आयोग के पास प्रतीक चिन्ह फ्रीज करने का विकल्प भी उपलब्ध था।
शिंदे गुट ने आयोग के फैसले का किया बचाव
दूसरी ओर, शिंदे गुट की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने चुनाव आयोग के 17 फरवरी, 2023 के आदेश का बचाव किया।
- संविधान अनुच्छेद-324 का हवाला: कौल ने दलील दी कि अनुच्छेद-324 के तहत चुनाव आयोग को यह तय करने का पूरा अधिकार है कि कौन सा गुट असली पार्टी का प्रतिनिधित्व करता है।
- संगठनात्मक ढांचा: उन्होंने कहा कि ठाकरे गुट जिस संशोधित संविधान का हवाला दे रहा है, वह आयोग के पास पंजीकृत ही नहीं था, जबकि 1999 का पंजीकृत संविधान ही वैध आधार है।
अदालत इस मामले में संगठनात्मक ढांचे, कार्यकर्ताओं की इच्छा और कानूनी प्रावधानों के आधार पर अंतिम सुनवाई जारी रखे हुए है।

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