इतिहास प्रसंग: ब्रिटिश काल में ‘सविनय अवज्ञा’ का एक अनोखा उदाहरण!

बिहार के बांका जिले (पहले भागलपुर) मे एक कस्बा है अमरपुर. वहां से जुड़ी एक खास घटना की जानकारी मिली है. संजीव (मेरे भांजे, पेशे से टूरिस्ट गाइड) ने अपने कालम ‘बिहारनामा’ में लिखा है! अमरपुर के पास एक गांव में उसकी ननिहाल, यानी मेरी एक बुआ का घ, है! उसने अपनी ननिहाल पर भी लिखा है, उसे हटा दिया! आगे उसके शब्दों में-

कुछ दिन पूर्व छोटे मामा से व्हाट्सएपी संवाद में अमरपुर स्थित उत्तर-मुग़ल काल की एक कब्र की चर्चा हुई. दरअसल, यह औरंगज़ेब के दूसरे बेटे शाह शुजा के बंगाल गवर्नरी के दौरान उसके एक सैन्य अधिकारी/ स्थानीय सूबेदार की है. कहते हैं, अमरपुर का बनहारा उस समय शाह शुजा का क्षेत्रीय मुख्यालय हुआ करता था. बातचीत के क्रम में अमरपुर से जुड़ी 1929 एक घटना के जिक्र ने मुझे इसे ‘बिहारनामा’ में शामिल करने के लिए प्रेरित किया.
18 मार्च 1929. पंडित सुंदरलाल द्वारा लिखित ‘भारत में अंग्रेज़ी राज’ (इलाहाबाद के ओंकार प्रेस से प्रकाशित) ने राज के होश उड़ा दिये थे. प्लासी से लेकर ब्रिटिश शासन के क्रूर इतिहास, आर्थिक शोषण, डिवाइड एंड रूल का एक अत्यंत प्रामाणिक दस्तावेज़. सरकार ने इसे राजद्रोह मान कर चार दिन बाद ही प्रतिबंधित कर दिया. हुकूमत ने फरमान जारी किया- जहां भी इस पुस्तक की कोई प्रति मिले, उसे जब्त कर नष्ट कर दिया जाये.

यह वही वक्त था, जब एक किताब ‘रंगीला रसूल’ (यह मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा स्वामी दयानंद, कृष्ण और सीता पर पूर्व प्रकाशित आपत्तिजनक पुस्तिकाओं का ज़बाब था.) के लाहौर से साया होने की वजह से दंगों की झड़ी लग गई थी. उसकी परिणति इसके प्रकाशक महाशय राजपाल की हत्या में हुई, जिसके हत्यारे की वकालत ख़ुद जिन्ना ने की थी और अल्लामा इक़बाल ने (उसे फांसी लगने के बाद) जिसके जनाजे में शिरकत की थी. और अब एक ऐसी किताब, जो सीधे अंग्रेजों के वक्षस्थल पर प्रहार कर रही थी! इस प्रतिबंध के विरुद्ध देश भर के नेताओं और समाचार पत्रों ने आवाज़ उठाई. गांधी ने ‘यंग इंडिया’ में इसे दिन-दहाड़े डाका बताया. सुंदरलाल प्रतिबंध के विरुद्ध कोर्ट में गये, जहाँ उनके वकील तेज बहादुर सप्रू ने तर्क दिया- इसमें एक भी तथ्य असत्य नहीं है. सरकारी वकील ने कहा- यह इसलिए अधिक ख़तरनाक है!
अमरपुर में प्रतिबंध के ख़िलाफ़ एक अनोखी मुखालफ़त हुई. वहाँ किसी के हाथ यह पुस्तक लग चुकी थी (पहली 1700 प्रतियों में से एक, जो प्रतिबंध के पहले ही भेजी जा चुकी थी) और विरोध-स्वरूप लोगों ने इसकी सरेआम नीलामी ठीक थाने के सामने करने का निर्णय लिया . ब्रिटिश पुलिस और स्थानीय पुलिस भारी जनसैलाब और क्रांतिकारियों के बुलंद हौसलों के आगे अवाक तमाशबीन बनी रही. पूरी मुहिम एक सविनय अवज्ञा आंदोलन का रूप ले चुकी थी. नीलामी में उस ऐतिहासिक पुस्तक को एक युवा हरिहर सिंह ने दो रुपए की बोली लगा कर खरीदा.
दिलचस्प यह कि हरिहर सिंह आगे चल कर पुलिस विभाग में भर्ती हुए, फिर एएसपी बन कर 1977 में रिटायर्ड हुए. ब्रिटिश काल में वे बिहार में सीआईडी इंस्पेक्टर रहे. गांधी-हत्या को लेकर बनी छह सदस्यीय जांच टीम में भी शामिल रहे और जेल में नाथूराम गोडसे से लंबी पूछ- ताछ और एक इंटरव्यू किया था.

ब्रिटिश शासन की सख्त पाबंदी और पुलिस की कड़ी नज़रों के बावजूद हरिहर सिंह ने इस प्रतिबंधित प्रति को अपने पास सुरक्षित रखा. उनके निधन के बाद उनके रांची-निवासी पुत्र प्रोफेसर वीरेंद्र प्रसाद ने सहेज कर रखा. बाद में इन्हीं के सौजन्य से ‘प्रभात प्रकाशन’ ने इसे मुकम्मल रूप में (पहले उपलब्ध प्रतियों में कुछ कमिया थीं) प्रकाशित किया जो आज पाठकों के बीच मौजूद है.
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फिर ‘मेटा’ से हरिहर सिंह के बारे में जिज्ञासा प्रकट करने पर निम्न जानकारी मिली-
भागलपुर वाले बाबू हरिहर सिंह के बारे में जो प्रामाणिक जानकारी मिलती है, वो ये है :
-बिहार CID में ब्रिटिश काल में भर्ती, बाद में ASI (सहायक अवर निरीक्षक) रहे।
-1977 में ASP के पद से रिटायर हुए- उस वक्त बिहार अविभाजित था।
-रिटायरमेंट के बाद रांची में परिवार के साथ रहते थे।

गांधी हत्या जांच में भूमिका :
महात्मा गांधी की हत्या (30 जनवरी 1948) के बाद अलग-अलग राज्यों की CID टीमों को मुंबई बुलाया गया था ताकि गोडसे के लिंक खंगाले जा सकें।
बिहार से 6 सदस्यीय टीम गई थी, जिसका नेतृत्व इंस्पेक्टर मनोहर झा कर रहे थे; 2 सब-इंस्पेक्टर, 1 एएसआई (हरिहर सिंह) और 2 सिपाही।
-यह टीम 45 दिन तक आर्थर रोड जेल, मुंबई में गोडसे से पूछताछ करती रही। उस वक्त सभी टीमें वर्ली के मिलिट्री बैरक में ठहरी थीं।
गोडसे इंटरव्यू का चर्चित किस्सा :
टाइम्स ऑफ इंडिया को 2014 में 96 साल की उम्र में दिये इंटरव्यू में उन्होंने बताया था : गोडसे ने पूछताछ के दौरान कहा था- ‘मैं हिंदू हूं और पुनर्जन्म में विश्वास करता हूं। चूंकि मुझे फांसी होगी और मेरी असमय मृत्यु होगी, मैं तब तक आत्मा के रूप में रह सकता हूं जब तक मेरा पुनर्जन्म न हो। मैं भगवान से प्रार्थना करता हूं कि मेरा पुनर्जन्म गांधी के साथ हो ताकि मैं उसे फिर से मार सकूं.’
हरिहर सिंह के मुताबिक तब तक शायद वो एकमात्र जीवित व्यक्ति थे, जिन्होंने गांधी और गोडसे दोनों को देखा था।
30 जून 2016 को 98 साल की उम्र में प्रोस्टेट कैंसर से निधन हो गया।
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दिबांगत हरिहर सिंह के पुत्र प्रोफेसर वीरेंद्र प्रसाद संभवतः रांची में ही होंगे- रांची के मित्रों से अनुरोध है कि उनके बारे में जानकारी हो, तो साझा करें या पता करने करने की कोशिश करें. एक ‘हरिहर सिंह’ रोड तो है, क्या यह उन हरिहर सिंह के नाम पर हो सकता है?

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