झारखंड केन्द्र की सरकार से दो तरह की लड़ाईयां लड़ रहा है। एक देश के पैमाने पर लड़ी जा रही लड़ाईयां, जो लोकतंत्र पर हमले के खिलाफ है। जिसे देश का विपक्ष लड़ रहा है। दूसरी लड़ाई, राज्यों के आर्थिक राजनैतिक हमलों के खिलाफ लड़ाई। केन्द्र ने एम एम डी आर संशोधन किया और खनिज एवं खनन से राज्यों का अधिकार छीन लिया। इस तर्क के बिना पर कि इससे खनिज का देश भर में एक दाम होगा। फायदा किसे होगा और नुकसान किसे सहज ही हिसाब लगा सकते हैं।
खनिज के मामले में देश के पब्लिक सेक्टर कंपनियों पर लंबे समय से झारखंड का एक लाख करोड़ से ज्यादा बकाया है। झारखंड उसके वसूली की लड़ाई लड़ रहा है।
झारखंड पर्यावरण को संतुलित रखने के लिए जल जंगल जमीन की लड़ाई लड़ रहा है। अंधाधुंध औद्योगिक विस्तार के खिलाफ है ।
झारखंड की इस लड़ाई में देश कहां है ?
मुझे याद है,
झारखंड राज्य के निर्माण के लिये झारखंड मुक्ति मोर्चा ने आर्थिक नाकेबंदी का आह्वान किया था, जिसे झारखंड के तमाम दलों ने समर्थन दिया था। जबकि चुनावी राजनीति में वे दल झामुमो के विरोधी थे।
झारखंड से जाने वाले तमाम खनिजों को जाने से रोक दिया गया था। देश के कई थर्मल पावर प्लांट बंद होने वाले थे। स्थिति कहीं फिर से वैसी न हो जाये ?
आदिवासियों को संविधान प्रदत्त अधिकारों को बिना सुनिश्चित किये,
पांचवी अनुसूचित को बिना धरातल पर उतारे जनसंख्या में बढ़ोत्तरी के आधार पर केन्द्र सरकार
“डिलिमिटेशन” लागु करने के प्रयास में है।
झारखंड इसका विरोध कर रहा है। खास कर पांचवी अनुसूचित क्षेत्रों से इसके खिलाफ विरोध हो रहा है।
संविधान में पांचवी अनुसूची का कस्टोडियन राज्यपाल को बनाया गया है। राज्यपाल केन्द्र और राष्ट्रपति का प्रतिनिधि होता है। राज्यपाल को बताना चाहिए कि पांचवी अनुसूची क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या बढ़ी कैसे ?
झारखंड नौकरियों के मामले में भ्रष्टाचार के खिलाफ युवाओं का राज्य सरकार के खिलाफ आन्दोलन हुआ।
कुछ को क्षेत्रिय दलों का समर्थन था तो कुछ को सीधे भारतीय जनता पार्टी का समर्थन मिला। बल्कि भारतीय जनता पार्टी ने तो इसे अपना आन्दोलन बना लिया।
इनमें से किसी ने यह नहीं कहा कि झारखंड की नौकरियों पर पहला अधिकार झारखंडियों का है। इसके लिए राज्य सरकार को नहीं घेरा।
ये तो एक बात है। झारखंड के क्षेत्रिय दल हों या भारतीय जनता पार्टी जैसे राष्ट्रीय दल झारखंड के मूल मुद्दों पर चुप हो जाती हैं। एक – आध बयान दिख जाता है। लेकिन मैदान में नहीं दिखते।
भारतीय जनता पार्टी के नेता तो एम एम डी आर जैसे कानून को सही ठहराने के लिए तर्क भी गढ़ने लगते हैं । डिलिमिटेशन पर भी तर्क गढ़ लेंगे। फिलहाल डिलिमिटेशन का विरोध करने वालों का विरोध किया जा रहा है।
भारतीय जनता पार्टी या राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ से तो उम्मीद नहीं दिखती। इनकी देशभक्ति यानि राष्ट्रवाद का मतलब आरक्षण खत्म, सरकारी संस्थानों का प्राइवेटाइजेशन यानि अड़ानी अंबानी जैसे कारपोट्स के धन का इजाफा। इसलिए वे कभी झारखंड या आदिवासियों के मुद्दों पर कुछ सोचेंगे ?
झारखंड की इन लड़ाइयों में देश के दूसरे राज्यों से भी आवाज उठनी चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं होता। देश का विपक्ष भी शायद झारखंड की लड़ाई को राष्ट्रीय मुद्दा नहीं मानता।
संभवतः झारखंड कांग्रेस इसलिए थोड़ा मुखर दिखता है कि राज्य के सरकार में उनकी हिस्सेदारी है। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस भी झारखंड के मुद्दों को उतना महत्व नहीं देती।
इसलिए झारखंड की लड़ाई तो झारखंडियों को ही लड़नी होगी। अलग अलग लड़ो, एक साथ मिलकर लड़ो। झारखंड के मुद्दों पर लड़ो।
जब चुनाव आयेगा लड़ लेना एक दूसरे के खिलाफ!

लेखकर – प्रबल महतो
FB से साभार

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