जाति ही पूछो साधू की!
विजय तेंदुलकर के इस शीर्षक का चर्चित नाटक समकालीन सामाजिक विद्रूप को थोड़ा व्यंग्यात्मक नजरिये से खोलता है. वह विद्रूप आज भी सभ्य और आधुनिक होने के हमारे दावे की खिल्ली उडाता है. आज भी हिंदू समाज की विलक्षण जातिप्रथा … Read the rest






