सीएए,  एनआरसी और उनका पाखंड!

Approved by Srinivas on Sat, 12/21/2019 - 20:37

:: श्रीनिवास ::

जब सिर्फ मुसलिमों को ही घुसपैठिया के रूप में चिह्नित किया जाना है, तो गैर मुसलिमों को एनआरसी की प्रक्रिया में झोंकने की जरूरत क्या है. सिर्फ मुसलमानों में से ही घुसपैठियों की पहचान करनी है, तो सरकार घोषणा कर दे कि सिर्फ मुसलिमों को ही एनआरसी की परीक्षा पास करनी है. यह आसान भी होगा. खर्च और समय भी कम लगेगा.

बहुतेरे 'समझदार', खांटी संघियों के अलावा भी, कह रहे हैं कि सीएए और एनआरसी में अंतर है. कि एनआरसी से मतभेद हो सकता है, सीएए में क्या गड़बड़ी है? कि सीएए से किसी भारतीय मुसलिम को कोई नुकसान नहीं होगा. यह तो सिर्फ शरणार्थियों को नागरिकता देने के लिए है. लेकिन वे सीएए और एनआरसी के बीच का स्पष्ट रिश्ता देख नहीं पा रहे या जानबूझ कर अनजान बन रहे हैं! गृहमंत्री अमित शाह ने साफ साफ कह दिया है कि पहले सीएए आयेगा, जिसके तहत शरणार्थियों को नागरिकता दी जायेगी, उसके बाद एनआरसी आयेगा, जिससे 'घुसपैठियों' की पहचान की जायेगी. चूंकि सीएए के तहत 'घुसपैठिया' सिर्फ मुसलमान ही हो सकता है, तो जो लोग  एनआरसी में अपने नागरिक होने का प्रमाण नहीं दे सकेंगे, उन सबों को 'घुसपैठिया' करार दिया जायेगा. उनमें से जो गैर मुसलिम होंगे, उन सब को तो  शरणार्थी मान कर नागरिकता मिल सकती है, बचेंगे सिर्फ मुसलमान.

फिर भी वे कहते हैं, सीएए किसी भारतीय मुसलिम के खिलाफ नहीं है!
बेशक असम में एनआरसी की प्रक्रिया में लोगों को भारी परेशानी झेलनी पड़ी. और अंत मे जो सूची जारी हुई, उसमें लाखों भारतीय के नाम नहीं थे. उनमें लाखों हिंदू भी हैं. हजारों को डिटेंशन सेंटर में कैदी की तरह डाल दिया. वह सब बेहद अपमानजनक था.  इस तनाव में अनेक लोगों के खुदकुशी करने की खबर भी आयी. इसलिए यह आशंका अकारण नहीं है कि जब पूरे देश में इसे लागू किया जायेगा, तो आम आदमी नाहक परेशान होगा. उनमें अधिकतर गरीब और वंचित तबकों के लोग होंगे. इस तरह यह गरीब विरोधी प्रक्रिया भी है और साबित होगी.
फिर भी देश के बहुतेरे हिंदुओं, खास कर मोदी मुरीदों को भरोसा है कि उनको कुछ नहीं होगा. यह विश्वास एक सहज तर्क से भी सही लगता है. आखिर जब सीएए के बाद या साथ एनआरसी लागू होगा, तो गैर मुसलिमों के पास कोई जरूरी दस्तावेज न भी हुआ तो क्या होगा? उन्हें किसी सूरत में घुसपैठिया या अवैध नागरिक तो नहीं ही माना जायेगा.  मुश्किलें तो सिर्फ मुसलिम झेलेंगे.
ऐसे में यह नहीं समझ में आ रहा कि जब सिर्फ मुसलिमों को ही घुसपैठिया के रूप में चिह्नित किया जाना है, तो गैर मुसलिमों को एनआरसी की प्रक्रिया में झोंकने की जरूरत क्या है. सिर्फ मुसलमानों में से ही घुसपैठियों की पहचान करनी है, तो सरकार घोषणा कर दे कि सिर्फ मुसलिमों को ही एनआरसी की परीक्षा पास करनी है. यह आसान भी होगा. खर्च और समय भी कम लगेगा.
लेकिन नहीं. ये परम 'राष्ट्रवादी' प्रकट में अपने डीएनए में निहित मुसलिम विद्वेष के सच को स्वीकार नहीं करेंगे. 'सबका साथ...' का नारा लगाते रहेंगे. दूसरी ओर बहुसंख्यकवाद के अपने संकीर्ण एजेंडे को लागू करने का हर संभव प्रयास जारी रखेंगे.

About the Author

Srinivas

मूल रूप से समाजकर्मी, फिर पत्रकार रहे श्रीनिवास जी की सम-सामयिक मुद्दों में विशेष रुचि रही है। पत्रकारिता में आने से पहले वह 74' के बिहार (संयुक्त) आंदोलन और जेपी द्वारा गठित छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी में सक्रिय थे। पत्रकारिता के आरंभ से अंत तक रांची से प्रकाशित 'प्रभात खबर' की संपादकीय टीम में रहे। 1989 में हरिवंश जी संपादक बने तो संपादकीय पन्ने की जिम्मेवारी इन्हें मिली। सेवानिवृत्ति के बाद लेखन के साथ ही सामाजिक आयोजनों व गतिविधियों में शामिल रहते हैं।

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