असम के चुनावी रण में इस बार झारखंड की सत्ताधारी पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की एंट्री ने मुकाबले को दिलचस्प और पेचीदा बना दिया है। झारखंड में ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन के साथ मिलकर सरकार चलाने वाली कांग्रेस और झामुमो का असम में अलग-अलग चुनाव लड़ना कई राजनीतिक सवाल खड़े कर रहा है।
अलग चुनाव लड़ने के पीछे की रणनीति
असम में झामुमो और कांग्रेस के बीच तालमेल न बैठने का मुख्य कारण सीटों का बंटवारा और स्थानीय नेतृत्व की महत्वाकांक्षा है।
चाय जनजाति वोट बैंक: असम के ‘चाय बागान’ क्षेत्रों (जैसे ऊपरी असम) में झारखंड से आए आदिवासियों (संथाल, मुंडा, उरांव) की बड़ी आबादी है। झामुमो को लगता है कि वह इन मतदाताओं से सीधे जुड़ सकता है, जबकि कांग्रेस इन्हें अपना पारंपरिक वोट मानती है।
क्षेत्रीय विस्तार: हेमंत सोरेन अपनी पार्टी को केवल झारखंड तक सीमित नहीं रखना चाहते। असम के चाय बागानों में अपनी जड़ें जमाना उनकी ‘नेशनल एम्बिशन’ का हिस्सा है।
सोरेन दंपत्ति का ‘असम मिशन’: हेमंत और कल्पना का प्रभाव
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन का असम में लगातार कैंप करना और जनसभाएं करना यह दर्शाता है कि पार्टी इस चुनाव को लेकर कितनी गंभीर है।
भावनात्मक जुड़ाव: हेमंत सोरेन अपनी रैलियों में ‘झारखंडी जड़ों’ और ‘आदिवासी अस्मिता’ की बात कर रहे हैं। वह सीधे उन मजदूरों से जुड़ रहे हैं जिनके पूर्वज छोटानागपुर से असम गए थे।
कल्पना सोरेन का महिला कार्ड: झारखंड की तरह ही असम में भी कल्पना सोरेन महिला मतदाताओं, विशेषकर चाय बागान की महिला श्रमिकों के बीच काफी लोकप्रिय हो रही हैं। उनकी सादगी और सीधा संवाद कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए चिंता का विषय है।
असर की संभावना: किसे फायदा, किसे नुकसान?
झामुमो की इस भागीदारी का असर दोतरफा हो सकता है:
विपक्ष के वोटों में बिखराव: राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि झामुमो और कांग्रेस के अलग लड़ने से भाजपा विरोधी वोटों में बिखराव होगा। विशेष रूप से उन सीटों पर जहां चाय जनजाति के वोट निर्णायक हैं, वहां भाजपा को ‘फ्री हैंड’ या ‘वॉकाओवर’ मिल सकता है।
भाजपा के लिए ‘रामबाण’: हिमंता बिस्वा सरमा की भाजपा सरकार के लिए विपक्ष की यह फूट किसी वरदान से कम नहीं है। विपक्ष जितना बंटा होगा, भाजपा की हैट्रिक उतनी ही आसान होगी।
निष्कर्ष: झामुमो की एंट्री से असम का चुनाव अब केवल ‘असमिया बनाम बाहरी’ नहीं रहा, बल्कि ‘अस्मिता बनाम अधिकार’ की लड़ाई बन गया है। यदि झामुमो कुछ सीटें जीतने में कामयाब रही, तो वह भविष्य में पूर्वोत्तर की राजनीति का नया ‘पावर प्लेयर’ बनकर उभरेगी।
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