मुस्लिम 'पंडितजी' को लेकर बीएचयु में आंदोलन..

:: न्‍यूज मेल डेस्‍क ::

वाराणसी: काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में संस्कृत के प्रफेसर के मुस्लिम धर्म को देख छात्रों द्वारा प्रदर्शन किया जा रहा है। तकरीबन पिछले 12 दिनों से पढ़ाई-लिखाई ठप है। संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के साहित्य विभाग में मुस्लिम प्रफेसर फिरोज खान की नियुक्त की गई है। यूनिवर्सिटी के वीसी का कहना है कि प्रफेसर की नियुक्ति बीएचयू ऐक्ट और सेंट्रल यूजीसी गाइडलाइंस के तहत हुई है लेकिन छात्र कुछ भी सुनने को तैयार नहीं हैं। अब आइए बात करते हैं कुछ ऐसे लोगों की जो मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखते हैं लेकिन संस्कृत और हिंदी के विद्वान होने की वजह से उनके नाम से पहले 'पंडित' जुड़ चुका है।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) में हिंदी संकाय के अध्यक्ष प्रफेसर मोहम्मद शरीफ से भी एनबीटी ऑनलाइन ने बात की। वह कहते हैं, 'बीएचयू में जो यह नियुक्ति हुई है। वहां डिपार्टमेंट का संविधान है, शायद उसे कुलपति ने नहीं पढ़ा था। धर्म संकाय के विभाग में लिखा है कि जो कर्मकांड हैं, उसे दूसरे धर्म के लोग नहीं पढ़ाएंगे। ऐसे में यह नियुक्ति गलत है। बाकी यह बात मैंने भी सुनी है, इसकी मैं पुष्टि नहीं कर सकता। रही बात संस्कृत की तो मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में जब पढ़ रहा था तो मेरी रुचि सिविल सर्विसेज में थी। यह स्कोरिंग सब्जेक्ट होता है। मैंने बहुत जल्द यूनिवर्सिटी में नियुक्ति हासिल कर ली, फिर मैं इधर चला आया। हमारे कई मित्र थे, जिन्होंने 100 में से 95 अंक हासिल किए हैं।'

'देववाणी है संस्कृत'
आजमगढ़ स्थित शिबली नैशनल कॉलेज में संस्कृत की हेड ऑफ डिपार्टमेंट डॉक्टर शाहीन जाफरी प्रफेसर मोहम्मद शरीफ की पत्नी हैं। वह कहती हैं, 'यह देववाणी है। मैं खुद को बहुत सौभाग्यशाली मानती हूं कि मैं संस्कृत पढ़ और पढ़ा रही हूं। यह इतना महान कलेवर है कि इससे सबकुछ हासिल किया जा सकता है। हमने अभी तो कुछ अध्ययन ही नहीं किया है। विश्व पटल पर तो सिर्फ योग ही उभरकर आया है। बाकी तो कुछ सामने आया ही नहीं है। मैं तो चाहती हूं कि बचपन से जो हमारा सिलबेस है, उसमें नीतिपरक, शिक्षाप्रद कथाओं को रखा जाए जैसे कि हितोपदेश है, पंचतंत्र है। इससे हमारी आने वाली पीढ़ियों को बहुत फायदा होगा।'

संस्कृत से गहरा नाता
पंडित गुलाम दस्तगीर बिराजदार, नाम सुनकर शायद आप हैरान हुए हों। हालांकि, वर्ली स्थित उनके घर का एक-एक कोना आपको हैरत में डाल सकता है। उनके छोटे से कमरे में कुरान और मुस्लिम मजहबी किताबों के साथ रामायण भी है, महाभारत को भी सहेज कर रखा गया है। इस कमरे में वेद, पुराण और उपनिषदों से भरी आलमारियां हैं। पंडित गुलाम दस्तगीर बिराजदार सोलापुर के रहने वाले हैं। तकरीबन 5 वर्ष पहले उन्होंने एक साक्षात्कार में बताया था, 'मैं अपने गांव में खेतिहर मजदूर के रूप में दिन भर खेतों में खटता था। फिर रात्रिशाला में पढ़ने जाते वक्त पास की संस्कृतशाला के बाहर घंटों बैठा रहता। वहां पर मैं संस्कृत के मंत्र और श्लोक सुना करता। मेरी लगन को देख ब्राह्मण शिक्षक ने आखिरकार मुझे कक्षा में बैठने की अनुमति दी।'

पंडित गुलाम की संस्कृत सेवाओं के जरिए उन्हें वर्षों तक महाराष्ट्र राज्य संस्कृत संगठन का मानद राजदूत रखा गया। फिर महाराष्ट्र सरकार ने देवभाषा की देख-रेख करने वाली अपनी संस्कृत स्थायी समिति का सदस्य बनाया और काशी के विश्व संस्कृत प्रतिष्ठान ने उन्हें अपना महासचिव नियुक्त किया।

कश्मीर यूनिवर्सिटी में प्रफेसर हैं डॉ. मेराज
अब बात करते हैं डॉ. मेराज अहमद खान की। डॉ. मेराज को एक वक्त सिविल सर्विसेज का चस्का लगा था। उन्होंने कॉलेज और विश्वविद्यालय में संस्कृत की पढ़ाई की। फिर उन्होंने पटना विश्वविद्यालय में बीए और एमए दोनों में ही टॉप किया। पुलिस इन्स्पेक्टर का यह बेटा आज कश्मीर विश्वविद्यालय में असोसिएट प्रफेसर है।

'मॉडर्न संस्कृत का धर्म से लेना-देना नहीं'
डॉ. मेराज कहते हैं, 'आज जो हम विश्वविद्यालयों में पढ़ाते हैं, वह मॉडर्न संस्कृत है, जिसका धर्म से कोई भी नाता नहीं है।' संस्कृत भाषा का मुस्लिम जानकार होने के नाते उन्हें कभी भी समाज में तिरस्कार का सामना नहीं करना पड़ा, इसका जिक्र करते हुए वह यह भी कहते हैं, 'अगर वे ऐसा करते तो मुझे कभी गोल्ड मेडल नहीं दिया जाता।'

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