संपत्ति मोह विपत्तियों का घर है

:: अच्युत पंकज ::

आनंद और विवेक पूर्ण जीवन जीने के लिए छोटी सी संपत्ति जिसका उपयोग आप कर सके पर्याप्त है। ज्यादातर लोग आगामी पीढ़ी के लिए संपत्ति संरक्षित रखने के लिए अपना जीवन खपा देते हैं।  किंतु अक्सर देखने में आता है कि आगामी पीढ़ी संरक्षित रखी गई संपत्ति को छोड़ अन्यत्र बस जाती है। और बहुत से ऐसे मामले भी होते हैं जब आगामी पीढ़ी उस संपत्ति के लिए आपसी झगड़ों में बर्बाद हो जाती है।

संपत्ति उतनी ही हो जिसका उपयोग कर सकें। जरूरत से ज्यादा संपत्ति टिकती नहीं और प्रायः व्यर्थ के उलझनों में डाल देती है । संपत्ति की चिंता जीवन जीने का मजा खराब कर देती है।

आज तक जरूरत से ज्यादा संपत्ति कोई नहीं रख सका। राजे महाराजे नहीं रख सके तो आम आदमी की बात ही क्या। 
संपत्ति वीरान हो तो अतिक्रमण अवश्यंभावी है।  इसलिए संपत्ति की सुरक्षा और रखरखाव पर नित्य प्रतिदिन ध्यान देना चाहिए।
 
यदि आप समुचित सुरक्षा और रखरखाव नहीं कर सकते तो लुटेरे उस पर कब्जा जमा लेंगे और आप झमेले उलझन और चिंता में पड़ जाएंगे। जीवन का आनंद जाता रहेगा। भगवत भजन कर नहीं पाएंगे।

 कबूतर जैसा कमजोर प्राणी भी वीरान संपत्ति का अतिक्रमण कर जाता है, फिर इंसान जैसे लुटेरे प्राणी का कहना ही क्या।

जीवन खुशहाली से जीने के लिए है। आवश्यकता से अधिक अर्जित संपत्ति पर कब्जा जमाए रखने के जद्दोजहद में जीवन बर्बाद कर देना नादानी है नासमझी है।

यदि निष्पक्ष होकर विचारें तो पाएंगे कि यह धरती और इसके संसाधन इंसानों के हैं ही नहीं।
इंसानों ने जबरन कब्जा जमाया हुआ है। 
यह संपत्ति तो वास्तव में उस परमात्मा की है, जिसने इसे बनाया है और सभी जीवो को बसाया है । 
उस मालिक ने धरती पानी और हवा का कभी बंटवारा नहीं किया । धरती के किसी भूभाग की रजिस्ट्री कभी किसी इंसान के नाम से नहीं की । किन्तु इंसानों ने भगवान के बनाए सार्वजैविक भूमि पर कब्जा जमाया और मालिक बन बैठै । 

ईश्वर ने तो सभी जीवो के उपयोग के लिए इसे बनाया था। जीवन जीने के लिए सभी जीवो की हिस्सेदारी है इसमें। 
इस लिहाज से हमारी भी हिस्सेदारी  है परंतु उतने ही जमीन हवा और पानी की है जिस जमीन हवा और पानी का हम उपयोग कर सकते हैं। 
जरूरत से ज्यादा संपत्ति किसी की भी टिकती नहीं। हालांकि भूमि को स्थाई संपत्ति की उपमा दी गई है परंतु असलियत में कोई भी संपत्ति किसी की भी स्थाई नहीं होती। यदि स्थाई होती तो राजे रजवाड़ों के वंशज महल छोड़ सड़कों पर नहीं नजर आते।

आनंद और विवेक पूर्ण जीवन जीने के लिए छोटी सी संपत्ति जिसका उपयोग आप कर सके पर्याप्त है। ज्यादातर लोग आगामी पीढ़ी के लिए संपत्ति संरक्षित रखने के लिए अपना जीवन खपा देते हैं।  किंतु अक्सर देखने में आता है कि आगामी पीढ़ी संरक्षित रखी गई संपत्ति को छोड़ अन्यत्र बस जाती है। और बहुत से ऐसे मामले भी होते हैं जब आगामी पीढ़ी उस संपत्ति के लिए आपसी झगड़ों में बर्बाद हो जाती है।

हर व्यक्ति का अपना प्रारब्ध, अपना भाग्य है। भाग्य से ज्यादा और समय से पहले आप किसी को कुछ दे ही नहीं सकते और किसी को दे भी दिया जाए तो वह उसे भोग नहीं पाएगा। 

इसलिए बुद्धिमत्ता इसी में है कि  सामर्थ्य से ज्यादा संपत्ति अर्जित न की जाए। और संपत्ति के कारण झगड़ों में पड़ कर सुख शांति न खोइ जाए।

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