पश्चिम एशिया की जटिल और तेजी से बदलती भू-राजनीति के बीच United States की दो समानांतर कूटनीतिक पहल—Iraq के साथ रणनीतिक संवाद और Iran के साथ प्रत्यक्ष वार्ता—ने क्षेत्र की अनिश्चितता को और गहरा कर दिया है। जहां एक ओर अमेरिका-इराक वार्ता में सतर्क सकारात्मकता दिखाई दी, वहीं पाकिस्तान में हुई अमेरिका-ईरान बातचीत बिना किसी ठोस समझौते के समाप्त हो गई, जिससे तनाव कम होने के बजाय और बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं।
Islamabad में करीब 21 घंटे चली मैराथन वार्ता के बाद अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance ने साफ कहा कि कोई समझौता नहीं हो सका, क्योंकि ईरान ने अमेरिकी शर्तों को स्वीकार नहीं किया। यह वार्ता पिछले एक दशक में दोनों देशों के बीच पहली प्रत्यक्ष बातचीत थी और 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद सबसे उच्च-स्तरीय संवादों में से एक मानी जा रही थी।
हालांकि ईरान की ओर से संकेत दिए गए कि बातचीत पूरी तरह खत्म नहीं हुई है और तकनीकी स्तर पर दस्तावेजों का आदान-प्रदान जारी रहेगा, लेकिन वार्ता के भविष्य को लेकर कोई स्पष्ट समयसीमा सामने नहीं आई। इस दौरान अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल में JD Vance के साथ विशेष दूत Steve Witkoff और Jared Kushner शामिल थे, जिन्होंने ईरानी संसद अध्यक्ष Mohammad Baqer Qalibaf और विदेश मंत्री Abbas Araqchi से मुलाकात की।
इस पूरी कूटनीतिक कवायद के केंद्र में Strait of Hormuz रहा, जो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का लगभग 20% मार्ग है। युद्ध के बाद से इस जलडमरूमध्य में बाधा आने से वैश्विक तेल बाजार में भारी उथल-पुथल देखी गई है। अमेरिका ने जहां इस मार्ग को फिर से खोलने के लिए सैन्य तैयारियों का संकेत दिया, वहीं ईरान ने इस पर अपने नियंत्रण और ट्रांजिट शुल्क की मांग दोहराई।
ईरान की प्रमुख मांगों में विदेशी बैंकों में जमा उसकी संपत्तियों की रिहाई, युद्ध क्षतिपूर्ति और क्षेत्रीय संघर्षों—खासतौर पर लेबनान—में युद्धविराम शामिल हैं। इसके विपरीत, अमेरिका की प्राथमिकता इस जलमार्ग में निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने पर केंद्रित है। इस पूरे समीकरण में Israel की भूमिका भी महत्वपूर्ण बनी हुई है, जो पहले से ही ईरान समर्थित गुटों के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है।
इसी पृष्ठभूमि में अमेरिका-इराक वार्ता को भी देखा जा रहा है। बगदाद के साथ बातचीत में अमेरिका ने क्षेत्रीय स्थिरता और सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने की बात की, जबकि इराक ने अपनी संप्रभुता और विदेशी सैन्य उपस्थिति को लेकर स्पष्ट नीति की मांग रखी। इराक की स्थिति विशेष रूप से संवेदनशील है, क्योंकि वह एक तरफ अमेरिका का साझेदार है तो दूसरी ओर ईरान के प्रभाव से भी पूरी तरह अलग नहीं हो सकता।
विश्लेषकों का मानना है कि इन दोनों कूटनीतिक प्रयासों का संयुक्त प्रभाव पश्चिम एशिया की दिशा तय करेगा। जहां अमेरिका-इराक संवाद स्थिरता की ओर बढ़ता दिख रहा है, वहीं अमेरिका-ईरान गतिरोध क्षेत्र में अस्थिरता को बढ़ा सकता है।
इस समय सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या आने वाले दिनों में ये बातचीत किसी ठोस समझौते में बदल पाएंगी या फिर पश्चिम एशिया एक लंबे और खिंचे हुए तनाव के दौर में प्रवेश कर चुका है।

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