हम कहां-कहां से गुजर गये!

:: हेमन्‍त ::

[1] सितम्बर, 2015ए गोखले-गणित : बेतिया, पश्चिम चम्पारण। जेपी स्मृति कुटीर में 40-45 लड़कियों से भेंट हुई। 5 से 12-13 वर्ष की आयु की वे लड़कियां पश्चिम चंपारण के अलग-अलग गाँवों से वहां आयी हुई थीं - तीन महीने के ट्रेनिंग कैम्प में साथ रहकर पढ़ाई-लिखाई और जीवन की शिक्षा प्राप्त करने के लिए। संयोगवश पंकज जी ने मुझसे उन बच्चियों को संबोधित करने को कहा। मैंने ‘गोखले गणित’ कहानी सुनाई। और, तब एक अद्भुत घटना हुई! 
“तय कार्यक्रम के अनुरूप प्रोफेसर गोपालकृष्ण गोखले एक दिन फिनिक्स आश्रम पहुंच गए। आश्रम की पाठशाला में गणित की पढ़ाई के लिए निर्धारित पुस्तक थी ‘गोखले गणित’ (प्रथम भाग)। उसके मूल रचयिता गोखले स्वयं थे।
 “फिनिक्स पाठशाला के शिक्षकों और विद्यार्थियों का अनुमान था कि गोखले जी आयेंगे, और यहाँ की गतिविधियों का मुआइना करेंगे तो पाठशाला में चलनेवाली पढ़ाई-लिखाई के बारे में भी पूछ–ताछ अवश्य करेंगे। गणित के शिक्षक हैं, तो हो सकता है गणित के सवाल ही पूछ बैठें। इसलिए शिक्षकों ने सभी छात्रों को गणित के कई पाठों का खूब अभ्यास कराया। छात्रों ने भी गणित के अपने-अपने पाठ कई-कई बार दोहरा लिये।
गोखले जी स्वागत-सत्कार के तुरंत बाद पाठशाला में पहुंच गए। पाठशाला के सभी शिक्षक और विद्यार्थी झटपट एक ही क्लास-रूम में जमा हुए। गोखले जी के सामने पहले भजन का कार्यक्रम हुआ। सबसे पहले ‘इंटर्नल स्पिरिट’ नामक अंग्रेजी भजन का गायन हुआ, जिसे शिक्षक मगनलाल दो महीने से विद्यार्थियों को सिखा रहे थे। उसके बाद ‘तुलसी रामायण’ से ‘जेहि सुमिरत सिधि होइ’ आदि मंगलाचरण के सोरठे गाये गए। उसके बाद छोटी उम्र के विद्यार्थियों को छुट्टी दे दी गयी। तब गोखलेजी ने युवा विद्यार्थियों और शिक्षकों के सामने एक प्रश्न रखा – ‘मान लो तुम अपने माता-पिता के साथ किसी वन में भ्रमण करने गये हो ; तुम्हारी एक ओर कुछ दूरी पर पिताजी चल रहे हैं और दूसरी ओर माताजी चल रही हैं। ऐन मौके पर एक भूखा बाघ सामने से आ गया। यदि तुम पिताजी की सहायता के लिए जाओगे तो बाघ माताजी को मार डालेगा और यदि माताजी की सहायता करने जाओगे तो वह पिताजी को खा जाएगा। बताओ, ऐसी हालत में तुम किसकी सहायता करने दौड़ोगे?
“कक्षा में मौजूद तमाम विद्यार्थी सहित शिक्षक भी असमंजस में पड़ गये। सब चुप्पी साध गये। पाठशाला के हेडमास्टर मोहनदास गांधी इंतजार करते रहे, लेकिन सबको चुप देख उन्होंने जवाब के लिए हाथ उठा दिया...।” 
इतना कहकर मैं थम गया। और, मेरे सामने दरी पर बैठी चालीस-पैंतालीस लड़कियों को निहारने लगा। बड़े-से हॉल में पीछे की कुर्सियों पर जेपी कुटीर के संचालक-सहयोगी और कई युवा-वृद्ध स्त्री-पुरुष विराजमान थे। मैंने उनको भी देखा। सबके चेहरे पर जिज्ञासा थी, उत्सुकता थी। सब चुप थे, मौन थे। मैंने सबके सामने सवाल रखा – “आप में से कितने लोगों को यह कहानी मालूम है?”
पीछे से एक या दो लोगों के हाथ उठे। मैं बोला - “तो चलिए, मैं बाद में बताऊंगा कि गांधीजी ने क्या जवाब दिया। मैं पहले आप से यह जानना चाहूँगा कि अगर आप से कोई यही सवाल करे, तो आप क्या जवाब  देंगे? क्या आपको कोई जवाब सुझता है? जो जवाब देना चाहता है, हाथ उठाये। जिनको गोखले गणित की यह कहानी पहले से मालूम है, वे हाथ न उठाएं।”
मेरे इतना कहते ही बच्चों के बीच से कई हाथ उठ गए। पीछे बैठे लोगों में से सिर्फ पंकज जी (जेपी कुटीर के न्यासी) ने हाथ उठाया। मैंने पहले, हाथ उठानेवाली बच्चियों के नाम पूछे। उन्होंने नाम बताए - प्रीति, मुस्कान, तमन्ना, रोशनी, अंजनी, माया, सुनैना, गुंजा...। इतने नाम! मुझे किसी का नाम याद नहीं रहा कि नाम से पुकार कर जवाब मांगूं। सो मैंने एक लड़की की ओर हाथ से इशारा कर कहा – “तुम पहले बताओ।”    
वह लड़की सकुचाती सी उठी और मासूम आवाज में बोली – “खुद हम्मे बाघ के पास चले जाएंगे, तो माई और बाबूजी दोनों बच जाएंगे। है कि नहीं...?”
मैं अवाक् रह गया! मेरा चेहरा देख वह लड़की यूं सकपका गयी, जैसे उसने कुछ गलत कह दिया हो। मैंने दूसरे ही पल हाथ उठानेवाली सब लड़कियों से पूछा – “क्या इसका उत्तर सही है?”
सभी लड़कियों ने एक साथ चिल्लाकर कहा – “हाँ..., एकदम सही है।”
चकित-विस्मित मैं खुशी के आवेग के मारे कुछ पल के लिए कुछ नहीं बोल पाया। आँखों में नमी घुलने लगी। अंतत: इतना ही बोल पाया – “फिनिक्स पाठशाला में गांधीजी ने यही उत्तर दिया – ‘मैं स्वयं बाघ के पास चला जाऊंगा और इस प्रकार माताजी और पिताजी दोनों की रक्षा हो जाएगी!’” हॉल तालियों से गूंज उठा। लड़कियों के चेहरों से खुशी छलकने लगी। मेरी आँखों से आंसू छलकने को थे। सो मैं पटना से पश्चिम चंपारण आने के अपने उद्देश्य के बारे में विस्तार से बोलना भूल गया। जल्दी-जल्दी में सिर्फ दो-तीन वाक्य बोल पाया – “मैं और मेरे साथी चंपारण आये हैं – गांधी की खोज में। करीब सौ साल पहले गांधीजी चंपारण आये थे।... अभी यहां मैंने गोखले गणित सुनाते हुए पूछा, तो उसका इन लड़कियों ने जो जवाब दिया, उससे हमें विश्वास हो गया कि चंपारण में गांधी ज़िंदा हैं। उन्हें ढूंढ निकालने में हम जरूर सफल होंगे...।” 
हम कहां-कहां से गुजर गये!– [2]
25-03-2016
गांधी की खोज में 
बेतिया।आज सुबह हम पटना से बेतिया रवाना हुए।शिशिर टुडू जी रात 12:00 बजे के बाद पटना पहुंचे थे। ‘जुड़ाव’ कार्यालय में ठहर गए थे – नूतन निवास नहीं आये। हम –मैं, छोटू और जितेंद्र (ड्राइवर) सुबह 3:30 बजे उठे और 5:00 बजे तक तैयार होकर जुड़ाव कार्यालय पहुंच गए - शीशिर जी और पंकज जी को लेने। पटना से बेतिया के लिए हमारी यात्रा सुबह 5:00 बजे से शुरु हो गई, इसलिए 10 बजते-बजते हम बेतिया पहुंच गए। गांधी सेतु के जाम में फंसने से बाल-बाल बच गए। हालांकि करीब आधे घंटे के लिए फंस ही गए थे! 
पंकज जी के घर पहुंचते ही, प्रकाश जी (चनपटिया) और प्रभात जी (कनछेदवा) पहुंच गए।
तय हुआ कि हम आज बेतिया में पीर मोहम्मद मूनिस की नतिनी से मिलने जाएंगे।हुआ, तो केन्हर राय के परिवार के सदस्य,जिनकी दूकान बेतिया में ही कहीं है,से भेंट करने जायेंगे।
पहले से तय कार्यक्रम के अनुसार शिशिर जी 28 मार्च को चंपारण से रांची लौट जाएंगे। मुझे 30 तारीख तक तो रहना ही है। इसलिए साथियों ने 27 मार्च तक का कार्यक्रम तय किया।कल भितहरवा से लौटने  के बाद 28 से 30 तक का कार्यक्रम तय  किया जाएगा।
साथियों ने मिल-बैठ कर तय किया कि कल, 26 मार्च को, हम गौनाहा - मुरली भरवा (बेलवा कोठी के पूरब) से होते हुए भितहरवा आ जाएंगे।ठीक उसी वक्त चंद्रशेखर प्रसाद यादव नामके व्यक्ति पंकज जी से मिलने आ गए।युवक लगते हैं - मुझे उनकी उम्र की जानकारी लेनी थी, भूल गया।
उनके जाते ही सब मित्र गांधी की चंपारण-यात्रा का नक्शा बताने लगे और उसके अनुरूप हमारी चंपारण यात्रा का रूट-मैप भी तैयार करने लग गए।27 मार्च को हम जसौली पट्टी जाएंगे। प्रभात जी ने सुझाव दिया है कि हम चडरहिया से तुरकौलिया और अरेराज से होते हुए बेतिया लौटें।
प्रकाश जी ने कहा और मैंने नोट कर लिया - कि गांधी जी पश्चिम चंपारण में आते ही बेतिया से किस-किस गांव में कब-कब गए?(प्रकाश जी के अनुसार उन-उन तारीखों में राजकुमार शुक्ल गांधीजी के साथ थे)
22 अप्रैल (1917) - हजारीमल धर्मशाला (में ठहरे)। 23 अप्रैल  - पीर मोहम्मद मूनिस  के घर।24 अप्रैल – केन्हर राव के घर (लौकरिया),बैरिया कोठी।25 अप्रैल –शिवराजपुर, करनैनी (नौतन), भितहा दुबे जी के यहां।26 अप्रैल - सिंघाछापर (कुड़िया कोठी)- बेतिया से 3 किलोमीटर दूर, कुमारबाग जाने वाले रास्ते से। (यहीं की एक तेलिन और बढ़इन, दो सहेलियों का इजहार हुआ। बयान दर्ज किया गांधीजी ने। उसको सुधारकर लिखा राजेंद्र प्रसाद जी ने)।27 अप्रैल - शिकारपुर – बाबू आद्या के घर।मुरली बरहवा - राजकुमार शुक्ल के गांव-घर।उसी दिन बेलवा कोठी गए।अमोलवा संत राउत  के यहां गए।30 अप्रैल –साठी - कठहरी कुमार दुबे के यहां। साथी कोठी भी गए।16 मई  - गांधीजी लालगढ़ होते हुएसरसिवां।29 जुलाई - सिंघाछापर और लालगढ़।30 जुलाई –मलहिया।31 जुलाई – मलहिया।31 जुलाई को ही ढोकराहा।6 अगस्त –हरदिया कोठी।16 नवंबर –अमोलवा, श्रीरामपुर, भितहरवा।20 नवंबर - उन्होंने भितिहरवा पाठशाला का उद्घाटनकिया।
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शिशिर जी ‘कैमरा’ और मैं ‘कलम’ हाथ में लिये पटना से बेतिया के रास्ते चलते रहे - बतियाते रहे। बीच में कहीं गाड़ी रोक कर शिशिर जी कैमरा चलाने लगते। और मैं हमारे बीच की अधूरी-बिखरी बातचीत को अपनी डायरी में चंद शब्द या आधे-अधूरे वाक्यमें नोट कर लेता।
हम चम्पारण के गांधी को खोजने निकले है? गांधी चम्पारण का गांधी? लेकिन हम उस ‘गांधी’ के बारे में कितना जानते हैं जो चम्पारण आया था? भर रास्ते हमारे बीच गांधी की ‘अपनी-अपनी पहचान’ पर चर्चा चली – कभी कहीं रुक कर, रुक-रुक कर, तो कभी शोर और कभी सन्नाटे में भटकते हुए...।
किसी पड़ाव पर हम कुछ देर के लिए रुकते, और फिर चल पड़ते तो समझ में नहीं आता कि रुकते वक्त किसने क्या कहा और किससे कहा? हम अक्सर एक-दूसरे के कहे शब्दों या वाक्यों में भटक जाते! और,हमारे बीच लम्बा मौन पसर जाता! फिर हम बतियाते - मैं उनको कहता, खुद से पूछता-सा! या वह कहतेमुझको समझाने के लिए, लेकिन लगता, वह खुद को समझा रहे हैं! 
- “कई सवाल पुराने होते हैं - सनातन होते हैं।”
- “हां, उनको समझने के लिए, उनके समाधान के लिए खोज में निकलना पड़ता है। शोध करना पड़ता है।”
- “समाज-कर्मी के नाते हम कई तरह के प्रयोग करते हैं - अभ्यास भी करते हैं।”
- "...लेकिन अक्सर लगता है, ऐसे सवालों का स्वयं ही अपना हल भी खोजना होता है।”
लम्बा मौन...। हम गाड़ी की खिड़कियों से बाहर का नजारा देखने लगे। तेजी से पीछे छूटते पेड़ – भरे-पूरे, हरे पत्तों से लदे...हवा में झूमते कुछ कहते से, कुछ गाते से, लेकिन पेड़ न जाने उसी जगह कब से खड़े हैं - बरसों से, हम पीछे छूटते पेड़ों को छोड़ मुड़ते हैं। पल भर के लिए एक-दूसरे को निहार सामने फिर देखने लगते हैं - लम्बी सड़क - दूर कहीं मुड़ने वाली है...!
- “सनातन सवालों का हल स्वयं खोजना पड़ता है यह तो सही लगता है लेकिन...! आप कोई हल सामने रखते हैं, तो जरूरी नहीं कि उसे कोई दूसरा, जैसे कि अभी मैं, स्वीकार करूं। है कि नहीं? तब? हम क्या करें?”
- “हां, यह समस्या तो हैं। इसका समाधान हमें निकालना चाहिए। मुझे तो लगता है, समाधान निकल सकता है, बशर्ते हम सामूहिकता की शक्ति – मिलजुल कर संभावना के बंद द्वार खोलने की शक्ति –का निर्माण करें और उस पर भरोसा करें।”
- “इसके सिवा और भी कोई विकल्प है?”
फिर मौन! शायद हम जिलेबिया मोड़ से, गुजरते हुए - कुछ स्थानों पर हादसों के मौजूद दारुण परिणामों के दर्शक बनकर बगल से निकलते हुए बेतिया पहुंच गये! रास्ते में याद आया कि झारखंड में ऐसे ही कई घुमावदार मोड़ों पर बोर्ड लगा था –Speed thrills, but kills! पटना से गांधी के चंपारण तक पहुँचने के रास्ते पर ऐसा कोई बोर्ड नहीं दिखा...! 
बेतिया में हमारे पहुंचते ही पंकज जी के घर पर कई मित्र जुट गये - शैलेन्द्र, प्रो. प्रकाश, प्रो. शमसुल हक, प्रभात जी (कनछेदवा), लक्ष्मण गुप्ता जी, मनोज जी, अमर राम जी, गिरधारी राम जी, इस्लाम जी, भावेश असगर जी, जेपी कुटीर के साथी, और भी कई जेपी-गांधी के लोग...। उन सबके बीच फिर वही सवाल दस्तक देने लगा, जो जिलेबिया रोड के किसी घातक मोड़ पर मेरे और शिशिर जी के बीच से चुपचाप निकल कर कहीं गुम हो गया था!
किसी ने कहा (शायद प्रो. प्रकाश ने) – “गांधी खब्ती था। वह किसी सवाल को सामने पाकर बचके निकलने की सोच नहीं सकता था...। वह सवाल को भी बचके निकलने नहीं देता था। खुद टकरा जाता या कहता – 'आ बैल मुझे मार! ज्यादा से ज्यादा क्या होगा? जय या क्षय! वह क्षय की हर कीमत देने को तैयार रहता था। कहता था - मेरे फना होने की कीमत पर जीत हासिल हो, तो वह भी मुझे कबूल है...।”
रात को मैंने दिल्ली-मुंबई और न जाने कहां-कहां फोन से संपर्क किया - कुछ तारीखें और स्रोत-संदर्भ के पते-ठिकाने मिले। और शायद दूसरे या तीसरे दिन वह गांधी भी मिला, जो कह रहा था – “...मैं किसी सवाल का कोई हल सामने रखता हूं, तो जरूरी नहीं कि उसे आप या कोई दूसरा स्वीकार करें। तब यही उचित लगता है कि मैं यह बताऊं कि मैंने अपना अर्थ किस तरह निकाला है और उस अर्थ तक पहुंचने के लिए मुझे किन सिद्धांतों को मानना पड़ा। ...मेरे लिए इतना बताना पर्याप्त होगा, क्योंकि अर्थ निकालने का तरीका बताते-बताते मैं यह जाहिर करता चलता हूं कि मैं अपना अर्थ निकालने के लिए संघर्ष कर रहा हूं - अपने अंदर लड़ रहा हूं और मुझे लड़ना ही चाहिए, भले मैं सफल होऊं या असफल...। यहां, इस बिंदु पर, शायद मेरा यानी हल खोजने वाले का और उसको स्वीकार करने वाले (अन्य या दूसरे) का हल एक जैसा हो जा सकता है। क्योंकि हम दोनों जानते होते हैं कि अंततोगत्वा मनुष्य बुद्धि से नहीं, हृदय से संचालित होता है। हृदय उस निष्कर्ष को स्वीकार कर लेता है, जिसके लिए बाद में बुद्धि तर्क निकालती है। यानी पहले विश्वास, फिर तर्क। मनुष्य जो कुछ करता है, करना चाहता है, उसके समर्थन में प्रमाण ढूंढ़ निकालता है...।”
हम कहां-कहां से गुजर गये! – [3]
25-26 मार्च, 2016   
नीम का पेड़   
हम - शिशिर टुडू, प्रकाश और मैं - पीर मोहम्मद मूनिस की नतिनी हाजरा खातून से मिलने गए (बेतिया शहर)। उनके पति मोहम्मद मुस्तफा उर्फ भोला जी। बिहार राज्य के नामी फुटबॉल प्लेयर रहे हैं। अब उनकी उम्र शायद 70 के पार है। उन्होंने आवाज देकर हाजरा खातून को बुलवाया। उनकी आवाज सुनकर अंदर से हाजरा खातून बाहर आईं। 65-67 की उम्र। गोरी - औसत कद-काठी की महिला। चेहरे पर निर्मलता! 
अपने नाना की यादों में पगी हाजरा खातून ने बताया - “मैं 5-6 महीने की थी, तभी मेरे पिता का इंतकाल हो गया। पिता मोहम्मद सुलेमान - मेरे नाना पीर मोहम्मद मूनिस के इकलौते पुत्र। मेरी मां का नाम राबिया खातून। मैं जब तीन-चार साल की थी, तभी पीर बाबा (मोहम्मद मूनिस) का देहांत हो गया। 
हजरा खातून ने हमें वह जगह दिखाई जहां पीर साहब की झोपड़ी हुआ करती थी। जहां गांधीजी आये और पीर बाबा की मां से मिले थे। उस जगह आज दो मंजिला पक्का मकान खड़ा है - किसी महानुभाव ने उस पर अपना मकान उठा लिया है। (भोला जी ने पीर बाबा के रहते उस जमीन को लेकर हुई तनातनी, झंझट और बाद में बने उस मकान की पूरी कहानी सुनाई!)
हाजर खातून ने घर के सामने का पेड़ (नीम का) दिखाया। सूखा -  ठूंठ - काला पड़ा! उन्होंने कहा - इसे गांधी बाबा ने लगाया था!
वह अभी तक धराशाई नहीं हुआ, यह आश्चर्य की बात है! 
मैंने शिशिर जी से कहा कि वह पेड़ की वीडियोग्राफी विस्तार से करें। यह सौ वर्ष बाद के, आज के चंपारण के लोकमानस में पैठे गांधी की छवि का शायद वास्तविक प्रतीक है!
पीर साहब की जमीन पर ही कुछ हटकर नतिनी का मकान है। उसकी गली के मुहाने पर एक छोटा सा मंदिर बना हुआ है। हाजरा खातून कहती हैं - गांधी बाबा ने यहां पीर बाबा के पास पहुंचकर कुछ पूजा-पाठ की बात की थी, तब बाबा ने एक ‘पत्थर’ लाकर रख दिया था। अब उसी को घेरकर मंदिर बना दिया गया है। (शिशिर जी ने उस मंदिर के अंदर-बाहर की वीडियोग्राफी की)  
हाजरा खातून ने कहा - गांधी बाबा ने उस पत्थर की पूजा की थी।
मैं हाजरा खातून और उनके पति भोला जी से इस सवाल में उलझा रह गया कि क्या उस वक्त गांधीजी ने सचमुच पूजा-पाठ-सा कुछ किया था? दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के बाद गांधीजी ने भारत के किसी मंदिर में जा कर पूजा-पाठ किया, इसका कोई स्पष्ट उल्लेख इतिहास में नहीं मिलता!
लौटती में मैं मंदिर के अंदर झांकर उस पत्थर को देखना भूल गया!
हम कहां-कहां से गुजर गये! – [4] 
26-03-2016
कुड़िया कोठी 
आज हम कुड़िया कोठी गए। रास्ते में एक शिलालेख देखा। उसके दोनों पाटी पोस्टर से अटे पड़े थे।
हमने उसे पानी से साफ किया। खूब रगड़ना पड़ा। छोटू भिड़ा और साफ़ कर दम लिया – रंजीत कार में रखा बोतल-पानी ले आया था।
शिलालेख के सामने की पाटी और पीठ पर दर्ज इबारतों को हमने कागज पर उतारा।
प्रकाश जी ने कुड़िया कोठी के खंडहर और सामने की जमीन पर आज जिनका स्वामित्व है उनके कार्य- व्यापार के बारे में विस्तार से बताया।
शिलालेख के पास ही सड़क से लगे ‘महादलित टोले’ (डोम परिवारों के) में हम गए। 8 परिवारों का टोला। गंदगी का अद्भुत नजारा! 
लोगों से खूब बक-झक हुई। मजा आ गया।
एक युवक - दारू पिया हुआ - आया। मुझ पर गुस्साने लगा। उसने झगड़ा मोल लेने के लहजे में कहा – “जाइए, जाइए! आपकी तरह के बीसियों आए, गए। उपदेश झाड़ गए।”
मेरी गलती यह थी कि हमारे वहां पहुंचते ही मेरे पास नंग-धड़ंग बच्चों की एक टोली आ गई थी। उनमें से एक से मैंने पूछा – “कितने दिन हुए नहाए? 
उसके हाथ-पांव माटी-कादो से पगे थे। उसने हंसते हुए कहा - रोज नहाता हूं...।
उसी वक्त उसकी मां आई। वह साफ-सुथरी थी। वह लाल साड़ी पहनी थी। सस्ती-सी, लेकिन साफ-सुथरी और चमकदार! 
उसने कहा - बच्चा है, नटखट है, दिन भर खेलता रहता है धूल-माटी में।
“लिखता-पढ़ता है कि नहीं? आसपास कोई स्कूल है कि नहीं ...?” मैं पूछ ही रहा था कि अचानक कई-कई महिलाएं दौड़ती हुई-सी पहुंच गयीं। शिशिर जी एक्शन में आ गये! वह तेजी से वीडियोग्राफी करने लगे। सब की निगाहें उस ओर मुड़ गईं...।
प्रभात जी और अन्य साथी मुझे समझाने लगे – “आप चलिए यहां से। किन बातों में उलझ गए। बेकार गाली खा रहे हैं... । असली काम छूट जाएगा। भितहरवा मेंसाथी इंतज़ार कर रहे हैं... ।
मैं उनसे भी उलझ पड़ा। छोटू को कुछ समझ में नहीं आता। वह तैश में आ गया। मुझसे कहा – “आप गजबे हैं! आप को कुछ समझ नहीं है। ऐसे थोड़ी ना चलता है? आपके कहने से थोड़े ना कुछ बदल जाएगा। एक दिन में सब पूरा कहीं बदलता है?”
शाम को हम भिताहरवा से बेतिया उसी रास्ते से लौटे। शिलालेख के पास रंजीत ने गाड़ी की रफ़्तार धीमी की। हमें शिलालेख देखने को कहा। हमने देखा – शिलापट्ट के दोनों तरफ बड़े-बड़े पोस्टर चिपके हुए थे!
बहरहाल बेतिया से भितिहरवा जाते वक्त ही हमने शिलापट्ट के सामने की पाटी और पीठ पर दर्ज इबारतों को कागज पर उतार लिया था।शिलापटृ में दर्ज है :
इस कोठी का प्रबंधक एसी इलियट बहुत ही क्रुर एवं हठी स्वभाव का व्यक्ति था। वह गांव के बगल (गोइड़ा) के खेतों में नील की खेती करने के लिए लोगों को तंग करता था। रैयतों को नील की कीमत एवं कटाई की मजदूरी बहुत कम देता था। वह बिना किसी पट्टा के ही नील की खेती करने के लिए रैयतों को बाध्य करता था। उसका यह कार्य तत्कालीन सरकारी नियम के प्रतिकूल था। अप्रैल,1917 में जब कोठी के कर्मचारियों ने सिंघाछपरा गांव की एक तेलिन और बढ़इन के साथ दुर्व्यवहार किया, तो उस गांव में रैयतों ने इसकी शिकायत गांधीजी से की।
शिलापट्ट के दूसरी तरफ लिखा है रू 26 अप्रैल 1917 की सुबह 8 बजे गांधीजी रामनवमी बाबू के साथ बरवत के बाबू के हाथी पर सवार होकर सिंघाछपरा गए थे। वहां पर दोनों पीडि़त महिलाओं का इजहार हुआ। नील के खेती की तहकीकात की गई। 11 बजे गांधी जी बेतिया लौट गए।
चनपटिया पथ में कुडिया कोठी के पास लगा शीलालेख देखा। शिलालेख में दर्ज है  - ‘...कोठी के कर्मचारियों ने सिंगाछापर गाँव की एक ‘तेलिन’ और ‘बढ़इन’ के साथ दुर्व्यवहार किया, तो उस गाँव के रैय्यतों ने इसकी शिकायत गांधीजी से की। गांधीजी रामनवमी बाबू के हाथी पर सवार होकर सिंगाछापर (बेतिया से 06 किमी दूर) गए। वहां पर दोनों पीड़ित महिलाओं का इजहार हुआ...।’
शिलापट्ट को पढ़ते ही हम कई सवालों से उलझ गए रू यह शिलापट्ट किस साल, किस सरकार की पहल पर यहाँ गड़ा? यह ‘तेलिन’ और ‘बढ़इन’ क्या है? उन महिलाओं के नाम क्या थे? चम्पारण सत्याग्रह के दौरान निलहों के जुल्म से पीड़ित 8000 किसानों ने अपने बयान दर्ज कराये। उनमें कई महिलाओं के नाम दर्ज हैं। क्या बयानकर्ताओं के उपलब्ध दस्तावेजों में भी उन महिलाओं के नाम की जगह तेलिन-बढ़इन ही दर्ज है? इसकी वजह? शिलापट्ट में दर्ज इन संबोधनों को सौ साल पहले के समाज में व्याप्त महिलाओं के प्रति पुरुष-दृष्टि की संकीर्णता-सीमाओं का संकेतक मान कर छोड़ दिया जाय? या कि आजादी के वर्षों बाद लगा यह शिलापट्ट अपने आप में एक टिप्पणी है कि आजाद देश में गाँधी और चंपारण-सत्याग्रह की स्मृति के महत्व और प्रासंगिकता के प्रति?
हम कहां-कहां से गुजर गये!– [5]
अप्रैल, 2016    
एक पर्चा 
पंकज जी के पर्चे का एक अंश इस प्रकार है : “15 अप्रैल, 2016 से चम्पारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष का प्रारंभ हो चुका है। 15 अप्रैल, 2017 को चम्पारण सत्याग्रह के सौ वर्ष पूरे होंगे। शताब्दी वर्ष ने हमें गांधी के चम्पारण की हालत का जायजा लेने का अवसर दिया है।चम्पारण से ही हिंदुस्तान में सत्याग्रह की शुरुआत हुई। गांधीजी के आने से चम्पारण के लोग निर्भय बने। किसानों ने निर्भय होकर अपने ऊपर हुए जुल्मों की कहानी सुनाई और बयान लिखवाये। जांच कमिटी बनी। गांधीजी भी उस कमिटी के सदस्य नामित हुए। कमिटी के सामने बड़ी संख्या में लोग आए। जांच कमिटी की रिपोर्ट के आधार पर निलहों की मनमानी और जुल्म पर रोक लगी।
चम्पारण सत्याग्रह की सफलता से –(1) भारत की आजादी के संघर्ष से आम आदमी और सत्याग्रह की पद्धति पूरी तरह जुड़ गयी, (2) कांग्रेस में गांधीजी का नेतृत्व सर्वमान्य हुआ, (3) चम्पारण सत्याग्रह की सफलता के बाद ही गांधीजी महात्मा कहलाये। यहां की गरीबी देखकर गांधीजी ने अपने लम्बे कठियावाड़ी वस्त्र त्याग कर घुटने तक धोती पहनने की शुरुआत की।
चम्पारण सत्याग्रह से निलहों के जुल्म से आजाद हुए किसान आज भी दुखी और परेशान हैं। बेतिया,रामनगर और मधुबन के राजाओं से नील की कोठी वाले अंग्रेजों ने ठेके पर हजारों एकड़ जमीन ली थी। बेतिया के राजा ने कर्ज चुकाने के लिए इंग्लैंड से लिए 95 लाख रुपये के बदले निलहों को एक लाख एकड़ जमीन स्थायी लीज पर दे दी। जब ये कोठियाँ बन्द होने लगीं, तब उन अंग्रेजों ने चीनी मिलों, जिलों के सम्पन्न लोगों और अपने गुमाश्तों को कोठी की जमीन बेच दी | किसान और खेतिहर मजदूर जो उस जमीन के सच्चे हकदार थे, वंचित रह गये। चम्पारण के किसान निलहों के जाने के बाद मिलहों (चीनी मिलों) की मनमानी के शिकार बनते गये और भूमिहीन किसान–मजदूर, जो अपनी मेहनत से फसल उगाते थे, भूमि के अधिकार से दूर रह गये।
चीनी मिल वाले अंग्रेज सरकार से चम्पारण के भू-भाग अपनी सुविधानुसार बांट कर आरक्षित क्षेत्र का कानून बनवाने में सफल रहे।यह क़ानून आज भी लागू है।इस कानून के अनुसार, उक्त आरक्षित क्षेत्र के किसान आज भी अपने गन्ना से गुड़ बनाकर बेच नहीं सकते हैं। आज तो कम तौल और पुर्जी वितरण में धांधली तथा भुगतान में विलम्ब के कारण किसान परेशान हैं।
बिहार में देश का पहला जमींदारी उन्मूलन कानून बना। 1948 में ही विशेषाधिकार प्राप्त रैयत कानून बना। भूमि सुधार एवं अधिकतम जोत की सीमा निर्धारण का कानून भी बना। किन्तु इन सभी कानूनों को लागू करने में बिहार फिसड्डी साबित हुआ। हांलाकि चम्पारण को छोडकर बिहार के अन्य जिलों में जनता ने अपनी पहल से जमींदारी प्रथा को कमजोर किया और भूमि के पुनर्वितरण का काम एक हद तक हुआ भी। लेकिन चम्पारण में जमींदारी का अवशेष अब भी बचा है और बिहार में सबसे ज्यादा भू–हदबंदी के मुक़दमे इसी जिले से संबंधित हैं |
वर्ष 2014–15 में बिहार सरकार के आपरेशन दखल–दहानी के विशेष कैंपों के बाद जारी आँकड़े के अनुसार चम्पारण के लगभग 02 लाख 34 हजार परिवारों ने गैरमजरुआ मालिक, गैरमजरूआ आम, भूदान और भू-हदबंदी कानून के अंतर्गत घोषित अधिशेष भूमि का पर्चा (परवाना) प्राप्ति का दावा किया है। पर इनमें लगभग आधे से ज्यादा लोगों को पर्चे की भूमि पर कब्जा हासिल नहीं हुआ। 09 चीनी मिलों के पास लगभग 40 हजार एकड़ भूमि है। हरिनगर चीनी मिल की 5200 एकड़ भूमि भूहदबंदी कानून के अंतर्गत समाहर्ता ने वर्ष 2007 में ही अधिशेष घोषित कर दी थी।विडंबना यह है कि इस बीच मुख्यमंत्री नीतीश जी के नेतृत्व में राज्य मंत्रिपरिषद नेसीलिंग एक्ट की धारा 45 बी को निरस्त करने संबंधी विधेयक को अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी, लेकिन सारे मामले यथावत राजस्व मंत्री के कोर्ट में लम्बित हैं! चम्पारण में गंडक,सिकरहना (बूढ़ी गंडक), मसान एवं अन्य पहाड़ी नदियों से कटाव के कारण हजारों विस्थापित गरीब परिवारदशकों से पुनर्वास की आस में दर-दर भटक रहे हैं।
चम्पारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष का आयोजन करने वाली सरकारों, जन संगठनों–संस्थाओं और नागरिकों के सामने भूमिहीन किसानों को भूमि का हकदार बनाने और बेघरों को वास की भूमि और घर हासिल कराने का काम, पूरा करने की चुनौती लेनी चाहिए। अन्यथा चम्पारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष का आयोजन एक दिखावे भर का आयोजन बनकर रह जाएगा।
हम कहां-कहां से गुजर गये! – [6]
अप्रैल-मई 2016 
चरखा-करघा बनाम कंप्यूटर-प्रिंटर 
'चंपारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष' के सिलसिले में ‘वृन्दावन’ के शिक्षकों से विमर्श के बाद भितहरवा कस्तूरबा विद्यालय के शिक्षक एवं अन्य ग्रामीण लोगों के साथ बैठक हुई। उसके बाद से हम कुछ मित्रों के दिमाग में दो सूत्र आये। ये व्यावहारिक सूत्र हो सकते हैं - बुनियादी या नयी तालीम की कार्य-योजना को आज नये सिरे से विकसित करने के। पहला, बुनियादी तालीम के गांधी-विचार के तहत विद्यालय में दस्तकारी (उत्पादक-श्रम)के द्वारा पूरी शिक्षा देने की संकल्पना के लिए ‘करघा’ के स्थान पर ‘कंप्यूटर’ लाया जाए। दूसरा, विद्यालय को ग्राम विकास के ऐसे केंद्र के रूप में विकसित किया जाए, जहां पढ़नेवाले लडके-लड़कियों के साथ आस-पास के ग्रामवासियों के लिए ‘अनाज की खेती’ और ‘अक्षर की खेती’ का जोड़ पैदा हो।
जो सुझाव आये हैं, उनसे यह समझ बनी है : 
(1) ‘वृन्दावन’ विद्यालय में एक प्रकाशन संस्थान (रजिस्टर्ड) की स्थापना की जाए,
(2) उसके तहत एक कंप्यूटर इकाई हो। यहां गांधी-साहित्य का प्रकाशन, ख़ास तौर से बच्चों की शिक्षा के लिए, हो और साथ ही बच्चों को कंप्यूटर की शिक्षा, ज्ञान और प्रशिक्षण दिया जाए।
(3) इसके लिए अलग से परमानेंट नौकरी चाहने वाले कंप्यूटर शिक्षक की बहाली न हो, इसमें स्वेच्छया समय-समय पर एक निशचित अवधि तक समय देनेवाले मित्रों को आमंत्रित किया जाए, जो कंप्यूटर के जरिये लेखन (हिंदी), पुनर्लेखन, संपादन, पुस्तकों के प्रकाशन के विज्ञान और तकनीक का बच्चों और शिक्षकों को ज्ञान व प्रशिक्षण दें।
(4) वे बच्चे और शिक्षकों को ऐसा हुनर सिखाएं कि वे बच्चे-शिक्षक मिलकर चंपारण की धरती से गांधी-साहित्य की किताबों का प्रकाशन – उत्पादक-श्रम - करें, जिनका वितरण और विक्रय चंपारण सहित बिहार व देश के अन्य स्कूल-कालेजों में संभव हो। यह तो जरूरी और स्वाभाविक है कि यहां से बड़ों के लिए किताबें प्रकाशित हों।
(5) इस प्रक्रिया में अपना पुस्तकालय और नेट के जरिये देश भर के गांधी संस्थानों और पुस्तकालयों से संबंध-स्थापन की बात आगे आयेगी ही।
क्या उपर्युक्त सूत्रों के आधार पर कोई ठोस प्रस्ताव तैयार कर उस पर अमल किया जा सकता है ताकि बुनियादी तालीम की गांधी-नीति को आज भी प्रयोग-सिद्ध साबित किया जा सके?
हम कहां-कहां से गुजर गये! – [7] 
जुलाई-नवम्बर 2016   
तेलिन ‘अकिला’ : बढ़इन ‘मतेसरी’
हम जुलाई के प्रथम सप्ताह (पंकज, प्रकाश, शैलेन्द्र, शमशुल हक और मैं) सिंगाछापर गए। गांधी को अपनी पीड़ा-कथा बताने वाली ‘तेलिन’ और ‘बढ़इन’ के नाम-पते की तलाश में। बढ़ई और तेली समुदायों की बस्ती में कई महिलाओं और युवकों से मिले। शैलेन्द्र और प्रो. शमशुल हक ने भोजपुरी में लंबी बातचीत चलाई। करीब 15 दिन की खोज के बाद उनके नाम-पते मिले। 
तेलिन का नाम ‘अकिला’ देवी, पति का नाम गुल्ली साह। और बढइन का नाम ‘तेसरा’ देवी, पति का नाम डोमा मिस्त्री।उनके वंशजों से मुलाकात भी हुई।अकिला देवी के पोते भीष्म साह और पोती शांति देवी से भी मिले...।भीष्म साह वकील हैं।उनके घर में जाली दार गेट से झांकते ही सामने की दीवार पर गांधीजी की तस्वीर लगी दिखी। उन्होंने कहा –पहले मैं शिक्षक था।पद से सेवानिवृत हुआ तो मेरे एक छात्र ने इसे भेंट किया था। साह जी की बैठक वाले कमरे में दीवार पर टंगी रायफल और तलवार दिखती है।
[करीब तीन महीने बाद पटना के पत्रकार शाशिभूषण ने सप्ताह भर बेतिया में रह कर नामों के सत्यापन का श्रमसाध्य कार्य किया और यह रिपोर्टिंग की :
चम्पारण सत्याग्रह के दौरान गांधी जी और उनके सहयोगी जब किसानों का बयान ले रहे थे तब हजारों किसानों ने लिहों के जुल्म के खिलाफ बयान दर्ज कराये थे। सबके नाम हैं। यह इकलौता वाकया है जिसमें तेलिन और बढ़इन दर्ज है। दस्तावेजों में नाम नहीं है।
बढ़इन और तेलिन की शिनाख्त के लिए सिंघाछपरा गांव पहुंचने पर यह स्पष्ट हुआ कि उन दोनों के बारे में मौजूदा पीढ़ी को कुछ भी पता नहीं है। लोगों ने गांव के दो बुजुर्गों दारोगा राऊत (96 वर्ष) और डॉक्टर साहब का नाम बताया कि वे शायद कुछ बता पाएं। 
डॉक्टर साहब का नाम यदुनंदन राय। 82 वर्ष के हैं। बेतिया के डॉक्टर राजीव लोचन बैनर्जी के यहां कम्पाउंडर थे। गांव में लोग बीमार पड़ते हैं तो वह दवा देते हैं, सो गांव वाले उन्हें डाक्टर साहब पुकारने लगे। यदुनंदन राय (डॉक्टर साहब) बताते हैं कि तेलिन का नाम ‘अकिला’ देवी और बढ़ईन का नाम तेसरी नहीं, ‘मतेसरी’ देवी था। उन्होंने मतेसरी देवी को देखा था। अकिला देवी को नहीं।
दारोगा राऊत बोते - हॉं, मैंने दोनों को देखा है। दोनों सहेली थीं, बड़ी बहादुर थीं दोनों। अकिलवाली भी।  गांव नीलहों और गुमाश्तों के आतंक से तबाह था। कोठी का गोड़ाइत उगरे दुसाध था। बड़ा अटपट बोलता था। आतंक से परेशान गांव के ही बच्चू बाबू ने कोठी के एक अंग्रेज को घोड़ा से गिरा दिया। उसने गांव लुटवा लेने की धमकी दी। गांव एकजुट हुआ। बांस काटा गया। फट्टर बनाया गया। बाबू जी बताते थे कि अकिला और मतेसरी भी घर से निकलीं। अकिला कहती थीं - राज रही त इज्जत ना रही। उन दिनों बड़कू (ऊंची जाति) लोग की औरतें घर से नहीं निकलती थीं। अकिला और मतेसरी छोटी जात की थीं, सो निकल गई। अकिला की मौत का तो मुझे नहीं, लेकिन मतेसरी, छोटे रामधनी की असमय मौत के बाद विक्षिप्ता अवस्था में गुजरीं।
दोनों महिलाओं के वारिस आज भी गांव में मौजूद हैं। लेकिन उन्हें नहीं पता कि उनकी दादी-परदादी ही वे बढ़इन और तेलिन थी, जिनका उल्लेख कुडि़या कोठी के शिलालेख में है। 
अकिला देवी के पति का नाम गुल्ली साह था। दारोगा राऊत ने बताया - “अकिला देवी रामजी साह के महतारी रहली। हमारा खूबर खेलवले बाड़ी।” रामजी साह, गुल्ली साह के बेटे थे। उनकी तीन संतान हैं दृ भीखम (भीष्म) साह, नारद साह और शांति देवी। 
अकिला देवी के पोते भीष्म साह बातचीत में कहते है -“हमें कुछ भी नहीं मालूम। डॉक्टर साहब और दारोगा राऊत पुरनिया (बुजुर्ग) हैं। वो जो बता रहे हैं उसे ही सही माना जाए।” 
हम कहां-कहां से गुजर गये! – [8]  
20 जुलाई 2016
गिरफ्तारी दी 
लोकसंघर्ष समिति, पश्चिम चम्पारण के कार्यकर्ता पंकज के नेतृत्व में चौतरवाथाना केस (कांड संख्या 282,दिनांक 03.11.2015) में पटना उच्च न्यायालय द्वाराअग्रिम जमानत की अर्जी ख़ारिज कर दिये जाने के कारण आज20 जुलाई 2016 को बगहा कोर्ट मेंहाजिर होकर 19 नामजद लोगों में से 13 लोगों ने गिरफ्तारी दी.
ज्ञातहो कि सीलिंग वाद संख्या 25/1991-92 ध्रुवेश्वर सिंह बनाम बिहार सरकार में भूधारी ने 24 वर्षों तक अपील वाद की कोई पैरवी नहीं की. भूधारी औरसमाहर्ता, पश्चिम चम्पारण की नींद तब टूटी जब सम्बंधित बाद  की गैरमजरूआ भूमि पर परचाधारियों ने जुलाई 2015 में अपनी लगाई हुई धान की फसल 3 नवम्बर (संभवतः वर्ष 2015) को काटना शुरू किया.
अप्रैल 2016 के प्रथम सप्ताह में समाहर्ता ने भूधारी के अपील वाद 25/1991-92 कोनिष्पादित करते हुए पर्चाधारियों के पक्ष में फैसला दिया. अब भूधारीसमाहर्ता के खिलाफ राजस्व पर्षद की अदालत में गए है,जिसकी पहली सुनवाई 21 जुलाई,2016 को है. अगर भूधारी के खिलाफ वहां भी फैसला होगा तो वे land tribunal या उच्च न्यायालय और फिर सर्वोच्च न्यायालय जायेंगे. अभी चालीसवर्ष बीते हैं, तारीखों के भंवरजाल में बीस-तीस वर्ष और बीतेंगे.
चम्पारणकी ज़मीन चंपारण के किसान-मजदूरों की है. लेकिन यहाँ की जमीन पर चीनी मीलोंऔर पूर्व जमींदारों ने कब्ज़ा कर रखा है. सलहा बरियरवा का यह संघर्षचम्पारण की ज़मीन की मुक्ति का संघर्ष है.
समाहर्ता को तो 24 वर्षों सेमृत भूहदबंदी वाद को खोलने और सुनवाई के लिए बाध्य करने वाले सलहाबरियरवा के पर्चाधारियों को प्रशंसा पत्र देना चाहिए था. पर अंचल अधिकारीबगहा-1 ने मारपीट और सरकारी काम में बाधा पहुँचाने का झूठा मुकदमा कर नसिर्फ भूपतियों का पक्ष लिया है, बल्कि न्याय का भी मजाक उडाया है.
फ़रवरी 2016 में सलहा बरियारवा में लगे राजस्व विभाग के विशेष कैम्प में इसीअंचलाधिकारी ने कहा कि भूधारी ने हाईकोर्ट में मुकदमा किया है. जबकि सच्चाईयह है कि समाहर्ता कोर्ट, बेतिया में अपने अपील वाद को भूधारी ने जिलाविधि शाखा से मिलकर अपनी अपील की मूल प्रति ही गायब करा दी थी. 24 वर्षोंतक अपील वाद की सुनवाई से बचने वाले भूधारी की खोज-खबर नहीं लेने वाली विधिशाखा और हाईकोर्ट में मुकदमा चल रहा है. झूठी जानकारी देकर पर्चाधारियोंको गुमराह करने वाले बगहा-1के अंचलाधिकारी ने कानून का मजाक उडाया है. इनतीनों के खिलाफ समुचित कार्रवाई होनी चाहिए. 
पंकज ने अपने बयान में कहाहै कि हमें संतोष है कि चम्पारण सत्याग्रह के शताब्दी वर्ष में हम चंपारणकी ज़मीन पर किसानों मजदूरों के अधिकारों की मांग को लेकर जेल जा रहे हैं.
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पंकज जी व उनके 12 भूमिहीन पर्चाधारी आज 19 दिन से बगहा जेल में हैं।पंकज जी सहित सभी परभीड़ को हिंसा के लिए भड़काने, सरकारी काम में बाधाडालने, गाली-गलौज करने, सरकारी अधिकारीयों की (निकम्मी) जान लेने का प्रयास करने जैसे कई गंभीर आरोप हैं।
इन सभीका अपराध बस यही है कि इन्होंने अपना क़ानूनी अधिकार माँगा था औरनहीं मिलने पर शांतिपूर्ण आंदोलन करने की जुर्रत कर दी। जी हाँ, बगहा अंचलके दो गाँवों के 224 भूमिहीन परचधारियों को बिहार सरकार ने 1991 मेंआधासे एक एकड़ तक का परचा दिया लेकिन कब्ज़ा रहा जमींदार के पास।
और मजेकी बात है कि 1991 मेंपरचा वितरण के 10 दिनों के अंदर ही जमींदार हाईकोर्ट, पटना से स्टे आर्डर ले आता है और कुछ दिनों बादहाई कोर्ट ने यहकेस जिला समाहर्ता, पश्चिम चंपारण के पास भेज दिया।लेकिन जिला समाहर्ताके यहाँ जमींदार और कर्मचारियों ने मिलकर "न्याय" की वाट लगा दी। केस सेसम्बंधित सभी मूल दस्तावेज गायब करा दिए गए और तब से आज तक 24 सालों तक "केस जिन्दा रहा लेकिन चला नहीं"।
इसी बीच बिहार सरकार के भूमिसुधार व राजस्व विभाग ने भूमि सुधार कोर कमिटी का गठन किया और इसमें पंकजजी भी सदस्य हुए। इसी दौरान जब पंकज जी और परचाधारियों ने जब बिहार सरकारके ऑपरेशन दखल देहानी अभियान के दौरान बगहा सी.ओ. को घेरा तो उन्होंने "केसहाई कोर्ट में चल रहा है" का झुठाबयान दिया।
अब सूचना के अधिकार से यह पता चला कि मामला हाई कोर्ट में नहीं बल्कि बेतिया के डी.एम. के पास गतालखाने में है।
बस यहीं से लड़ाई शुरू हुई और धरना, उपवास और साईकिल यात्रा शुरू हुई औरअप्रैल 2015 में हुएभूमिहीनों केसम्मेलन में "भूमि सत्याग्रह" करने कानिर्णय लिया गया।
निर्णय के अनुसार सैकड़ों भूमिहीनों ने हाथ मेंतिरंगा झंडा और धान का बीज ले कर 26 जून 2015 को जमीन जोत-आबाद किया। इसीधान की फसल को लगाने के बाद डी.एम. साहब पर दबाव बढ़ा और केस की सुनवाई मेंतेजी आई। जब 03 नवम्बर को जब अपने धान की फसल काटने जब परचधारी जमीन परपहुचे तोसैकड़ो प्रशासन ने ऐसा करने से रोका और तब पंकज जी व सभीपरचधारियों के साथ इसी दिन पदाधिकारियों ने गांव में ही वार्ता की। वार्ताके बाद परचाधारियों ने खुद काटे गए धान के बोझों को सरकारी गाड़ी पर लाददिया और आंदोलन स्थगित करते हुए अपने घरों को लौट गए।
गांव सेलौटने के दौरानसी. ओ. साहब ने "सरकारी तेवर" दिखाते हुए चौतरवा थाना मेंझूठा एफ. आई. आर. दर्ज करवा दिया। इसी केस मे सभी साथियों को जेल हुई है।सभी आरोप बगहा 1 के सी.ओ. की झूठी प्राथमिकी के आधार पर लगाये गए हैं।पश्चिम चंपारण का भूमिहीन- किसान आज भी जमींदारों के चंगुल में छटपटा रहाहै। वह कोर्ट और पदाधिकारियों के बीच पिस रहा है और सामाजिक न्याय के साथविकास सरकार को इसकी फ़िक्र नहीं है। और समूची घटना न्यूटन के चौथे नियम कोसिद्ध करती है कि सी.ओ., कई नेतागण व पदाधिकारी खाते तो जनता की हैं लेकिनगाते जमींदारों की हैं।
हम कहां-कहां से गुजर गए! – [9]
6 अगस्त, 2016
मुख्यमंत्री को पत्र 
प्रतिष्ठा में,श्री नीतीश कुमार जी, मुख्यमंत्री, बिहार
महोदय,  
आपसे संपर्क साधने के सारे प्रयास विफल हए, तो मैंने श्रीकांत जी को निम्नलिखित पत्र कल ई-मेल पर भेजा. आज पटना के किसी मित्र ने आपका ई-मेल पता मुझे भेजा, तो वही पत्र आपको भेजने का साहस कर रहा हूं. हालांकि यह पता सही है या नहीं, मैं नहीं जानता. अगर आपकी ओर से कोई पावती की सूचना मिलेगी, तो खुद को धन्य मानूंगा.  -  6 अगस्त, 2016, हेमंत, रांची.       
प्रिय श्रीकांत जी, पंकज जी (बेतिया) जेल में हैं. इसकी आपको जानकारी होगी. चंपारण-सत्याग्रह शताब्दी वर्ष मनाने वाले बिहारी समाज और सरकार के लिए उनकी गिरफ्तारी शायद यह संकेत दे रही है कि सौ साल पहले ‘चंपारण आनेवाले गांधी’ आज कहाँ हैं और सौ साल पहले के ‘गांधी का चंपारण’ आज कहाँ है? आज अलसुबह मुझे डॉक्टर ओझा जी और अन्य मित्रों ने सूचना दी कि उन्हें जेल में तरह-तरह से परेशान किया जा रहा है (मित्रों ने ‘टॉर्चर’ शब्द का इस्तेमाल किया है). 
अब जाकर मुझे पंकज जी पर के केस के बारे में कुछ लिखित प्राप्त हुआ (पंकज जी के पुत्र टीपू से) है. पिछले 15 दिन से मैं फोन के मार्फ़त सुनी-सुनाई जानकारियों के आधार पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार,  मुख्य सचिव अंजनी कुमार और सांसद अली अनवर से फोन-संपर्क साधने की कोशिश करता रहा. कितना विफल हुआ, यह जाहिर है.
इसलिए आज सुबह से आपको फोन करता रहा. अभी (9 बजे सुबह) आपका फोन आया, तो जान में जान आयी. आपसे अनुरोध है कि पंकज जी के केस से संबंधित यह कागज़ मुख्यमंत्री जी और मुख्य सचिव जी सहित व्यास मिश्र जी तक पहुंचाने की कृपा करें. यह कागज़ मैं आपके ई-मेल पर भेजने की कोशिश कर रहा हूं. रांची में हूं. आप की उक्त महानुभावों से जो बात हो, मुझे फोन पर बताने की कृपा करें. पंकज जी जेल से निकलें, इसके लिए मुझे और क्या करना चाहिए बताएं. – आपका, हेमंत. 05 अगस्त, 2016.         
+++
केस :             
लोकसंघर्ष समिति, पश्चिम चम्पारण के कार्यकर्ता पंकज के नेतृत्व में चौतरवाथाना कांड संख्या 282,दिनांक 03.11.2015 में पटना उच्च न्यायालय द्वाराअग्रिम जमानत की अर्जी ख़ारिज कर दिए जाने की स्थिति में आज (संभवतः 19 या 20 जुलाई 2016 को) बगहा कोर्ट मेंहाजिर होकर 19 नामजद लोगों में से 13 लोगों ने गिरफ्तारी दी.
ज्ञातहो कि सीलिंग वाद संख्या 25/1991-92 ध्रुवेश्वर सिंह बनाम बिहार सरकार में भूधारी ने 24 वर्षों तक अपील वाद की कोई पैरवी नहीं की. भूधारी औरसमाहर्ता, पश्चिम चम्पारण की नींद तब टूटी जब सम्बंधित बाद  की गैरमजरूआ भूमि पर परचाधारियों ने जुलाई 2015 में अपनी लगाई हुई धान की फसल 3 नवम्बर (संभवतः वर्ष 2015) को काटना शुरू किया.
अप्रैल 2016 के प्रथम सप्ताह में समाहर्ता ने भूधारी के अपील वाद 25/1991-92 कोनिष्पादित करते हुए पर्चाधारियों के पक्ष में फैसला दिया. अब भूधारीसमाहर्ता के खिलाफ राजस्व पर्षद की अदालत में गए है,जिसकी पहली सुनवाई 21 जुलाई,2016 को है. अगर भूधारी के खिलाफ वहां भी फैसला होगा तो वे land tribunal या उच्च न्यायालय और फिर सर्वोच्च न्यायालय जायेंगे. अभी चालीसवर्ष बीते हैं, तारीखों के भंवरजाल में बीस-तीस वर्ष और बीतेंगे.
चम्पारणकी ज़मीन चंपारण के किसान-मजदूरों की है. लेकिन यहाँ की जमीन पर चीनी मीलोंऔर पूर्व जमींदारों ने कब्ज़ा कर रखा है. सलहा बरियरवा का यह संघर्षचम्पारण की ज़मीन की मुक्ति का संघर्ष है.
समाहर्ता को तो 24 वर्षों सेमृत भूहदबंदी वाद को खोलने और सुनवाई के लिए बाध्य करने वाले सलहाबरियरवा के पर्चाधारियों को प्रशंसा पत्र देना चाहिए था. पर अंचल अधिकारीबगहा-1 ने मारपीट और सरकारी काम में बाधा पहुँचाने का झूठा मुकदमा कर नसिर्फ भूपतियों का पक्ष लिया है, बल्कि न्याय का भी मजाक उडाया है.
फ़रवरी 2016 में सलहा बरियारवा में लगे राजस्व विभाग के विशेष कैम्प में इसीअंचलाधिकारी ने कहा कि भूधारी ने हाईकोर्ट में मुकदमा किया है. जबकि सच्चाईयह है कि समाहर्ता कोर्ट, बेतिया में अपने अपील वाद को भूधारी ने जिलाविधि शाखा से मिलकर अपनी अपील की मूल प्रति ही गायब करा दी थी.24 वर्षोंतक अपील वाद की सुनवाई से बचने वाले भूधारी की खोज-खबर नहीं लेने वाली विधिशाखा और हाईकोर्ट में मुकदमा चल रहा है. झूठी जानकारी देकर पर्चाधारियोंको गुमराह करने वाले बगहा-1के अंचलाधिकारी ने कानून का मजाक उडाया है. इनतीनों के खिलाफ समुचित कार्रवाई होनी चाहिए. 
पंकज ने अपने बयान में कहाहै कि हमें संतोष है कि चम्पारण सत्याग्रह के शताब्दी वर्ष में हम चंपारणकी ज़मीन पर किसानों मजदूरों के अधिकारों की मांग को लेकर जेल जा रहे हैं.
हम कहां-कहां से गुजर गये! – [10] 
25 सितंबर, 2016
जेल गेट : घूस देने के पाप से बचे 
बगहा (पश्चिम चंपारण)। दो महीने हो गए, पंकज जी जेल में है। 
आज बगहा जेल गेट पर मैंने आवेदन दिया। मैं इस बात पर अड़ा रहा कि मैं जेल अधीक्षक या जेलर महोदय या किसी जेल अधिकारी की उपस्थिति में ही पंकज जी और उनके साथियों से बातचीत करूंगा। करीब पंद्रह मिनट तक जेल के कनीय स्टाफ से तीखी बहस और हील-हुज्जत – नियम-कानूनों पर वाक्-युद्ध – के बाद मेरा अनुरोध स्वीकार किया गया। लेकिन मेरे साथ आये पंकज जी की पत्नीश्री शची जी और उनके सुपुत्र अपूर्व को जेल के अन्दर जेलर के कक्ष में जाने से रोक दिया गया। शची जी ने मुझे पुनः बहस में उलझने से रोकते हुए कहा कि मैं अकेल्रे अन्दर जाऊं। वह और अपूर्व बाहर खड़े रहेंगे और पंकज जी को खिड़की की जाली के पीछे खड़े देखकर संतोष कर लेंगे। पिछले महीने पंकज जी की इसी तरह की एक झलक के लिए अपूर्व को 50 रुपये खर्च करने पड़े थे [लंबे इंतज़ार के बावजूद आवेदन मंजूर न हुआ तो 30 रुपए दिए। लेकिन मुलाक़ात का समय ख़त्म होने तक भी पंकज जी जाली के पीछे नहीं आये, क्योंकि इसकी सूचना अन्दर उनको दी नहीं गयी थी। तब इसके लिए अंततः और 20 रूपए दिए।] शची जी ने कहा, इस बार घूस देने के पाप से बच गये, यही सबसे बड़ा संतोष का विषय है। 
पंकज जी की पत्नीश्री शची जी और उनके सुपुत्र अपूर्व के साथ बगहा जेल पहुंचा, तो मैंने देखा, जेल गेट के बाहर जेलबंद दो या तीन दलित साथियों के परिवारों के स्त्री-पुरुष, बूढ़े-बुजुर्ग-बच्चे मौजूद थे। उनके साथ गाँव की करीब 30 महिलाएं और बच्चे भी थे। वे सब जेल गेट पर तैनात प्रहरी से सिर्फ एक फ़रियाद लेकर बहस में उलझे थे कि वे पंकज जी और साथियों को एक झलक देखने के लिए दूर गाँव से आये हैं, उन्हें इसकी इजाजत मिले। लेकिन उनके लिखित आवेदन देने के बावजूद प्रहरी और अनुमति देनेवाले अधिकारी जेल के नियम-क़ानून के हवाले से उन्हें कह रहे थे कि यह कतई संभव नहीं है। हमारे पहुंचते ही, उन सब लोगों ने हमें पहचान लिया। उनके साथ के युवा पुरुष बन्धुओं ने, जो आज की दिहाड़ी मजदूरी छोड़कर आये हैं, साहस किया और पुनः आवेदन लिख कर मेरे आवेदन के साथ गेट पर जमा किया। तब काफी लंबी प्रक्रिया के बाद उन्हें भी अपने जेलबंद बंधु-बांधवों की जाली के पीछे से झलक पाने की इजाजत मिली। शायद मेरे वहां होने के कारण अनुमति देने वाले सज्जन अधिकारी की आवाज कुछ ढीली पड़ी। हालांकि वह अंत-अंत तक मुझे तीखी निगाहों से देखते हुए यह अनुमान लगाने की कोशिश करते रहे कि मैं कौन हूं और मेरी हैसियत क्या है? वह मेरी ऊंची आवाज सुनकर संभवतः इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके थे कि मैं कोई आम आदमी नहीं हूं। सो उन्होंने शालीनता बरतते हुए सबको मुलाकातियों के खड़े होने के लिए निर्धारित स्थान तक जाने की अनुमति दे दी। 
उन बन्धुओं ने भी शची जी की बात का समर्थन करते हुए मुझे बिना बहस के अकेले अन्दर जाने को कहा, ताकि इस बहस में मुलाकात का समय (सुबह 8 से 12 बजे तक) बिना मुलाकात के न गुजर जाये। उन्हें भी इस बात का संतोष था कि हर बार की तरह उन्हें इस बार 25-25 रुपए की भेंट नहीं चढ़ानी पड़ी। (हालांकि मैं जब मुलाक़ात के बाद जेल परिसर से बाहर निकला तो कई मुलाकातियों ने बताया कि उनसे 25-25 रुपए वसूले गए!) 
जेल से बाहर निकलते ही मैंने कई पत्रकार मित्रों और शिक्षक-प्रोफ़ेसर बन्धुओं से पंकज जी के लिखे “चम्पारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष और गांधी के लोग” शीर्षक पर्चे की चर्चा की। दो-तीन मित्रों ने कहा कि वे वह पर्चा जदयू के उन स्थानीय नेताओं तक जरूर पहुंचा देंगे, जिनकी पहुंच नीतीश जी तक है। वे यह भी कोशिश करेंगे कि वह पर्चा जदयू के उन पदयात्रियों तक पहुंच जाए जो पार्टी के चंपारण-यात्रा कार्यक्रम के तहत पटना से चलकर बेतिया पहुंच चुके हैं। हालांकि उन बन्धुओं में से एक ने हंसते हुए मुझसे कहा – मुझे नहीं लगता कि जदयू के किसी नेता में इतना साहस है कि वह पर्चा नीतीश जी को थमा सके। वैसे, नीतीश जी भी शायद ही पर्चे को पढ़ने का कष्ट करेंगे। वह तो गांधी के नाम जनता को शराबबंदी का अपना संदेश देने के लिए भितिहरवा आश्रम आयेंगे। वे गांधी के चंपारण की यह आवाज सुनने नहीं आ रहे कि “प्रजा-वर्ग शराब के नशे से तभी पूर्णतः मुक्त होगा, जब देश-समाज का प्रभु-वर्ग सत्ता के नशे से मुक्त होगा।”   
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25 सितंबर, 2016, बगहा (पश्चिम चंपारण)। 
बगहा जेल पहुंचा। पंकज जी और उनके साथ जेल-बंद भूमिहीन दलित साथियों से मुलाक़ात करने के लिए। मैं जेल के नियम-क़ानून के मुताबिक़ आवेदन देकर उनसे मिला। जेलर के कक्ष में, उनकी उपस्थिति में ही पंकज जी और अमर राम तथा अन्य साथियों से बातचीत हुई। लंबी बातचीत हुई। उसके बाद जेलर के सुझाव पर मैं अधीक्षक महोदय से भी मिला। जो कर्मचारी (हवलदार साहब) मुझे अधीक्षक से मिलने से रोकने के लिए नियम-क़ानून की लंबी प्रक्रिया समझा रहे थे, अंततः जेलर महोदय के आदेश पर मुझे खुद अधीक्षक के निवास पर ले गए। पंकज जी से बातचीत, फिर श्रीमान जेलर और अधीक्षक महोदय से बातचीत का पूरा प्रकरण काफी लंबा है। 
पंकज जी स्वस्थ हैं। शांत हैं। मुझे वह तनिक भी निराश नहीं दिखे। बातचीत के दौरान तनिक भी न उत्तेजित  हुए और न बेचैन। मुझे वह कुछ उदास नजर आये। मैं काफी देर तक उनका चेहरा निहारता रहा, और अपने आप से यह पूछता रहा कि कहीं उनकी उदासी उनके चेहरे पर छाई निर्मल शान्ति की आलोक-छाया की पहचान तो नहीं? 
उन्होने जेल में उनके साथ हुई किसी बदसलूकी का कोई जिक्र नहीं किया। किसी अधिकारी के खिलाफ कोई शिकायत नहीं की। मैंने उनके केस के मामले में हाई कोर्ट की सुनवाई के बारे में जो बात बताई, उस पर उन्होंने खुलकर संक्षेप में प्रतिक्रया व्यक्त की। उन्होंने जो कुछ कहा, उसका निहितार्थ (जो मैं समझ सका) यह था कि वह और उनके साथी ‘कैद’ हैं, ‘गुलाम’ नहीं हैं। भूमिहीन दलितों को राज्य-सत्ता ने जमीन देने की घोषणा के तहत बरसों पहले परचा दिया। हमारी मांग है कि उन पर्चाधारी भूमिहीनों को जमीन मिले – सरकार उसकी समय-सीमा सुनिश्चित करे। लेकिन सरकार की नजर में हमारा ‘अपराध’ यह है कि हमने हमारी ‘मांग’ को ‘याचना’ मानने से इनकार किया। हमने सत्याग्रह संघर्ष का आह्वान किया, इसमें हमारे हजारों दलित परिवार शामिल हुए। इसे हमारे सत्ताधीश प्रभुओं ने शायद अपनी दाता-छवि पर प्रहार माना। शायद इसीलिए पूरा मामला कोर्ट और जमानत देने-दिलाने के खेल में उलझ गया। कोर्ट कोई फैसला देगा, हमें जमानत देगा या नहीं देगा, बस। यह न मूल मांग का वाजिब समाधान होगा और न हजारों दलितों के प्रति न्याय। वाजिब और न्यायसंगत समाधान तो यह था कि सरकार हमारे सत्याग्रह को अपनी प्रतिष्ठा पर चोट न मानने की कृपा करती, ‘स्टेट’ को हमारे ऊपर लगाए गए केस वापस लेने को कहती, और भूमिहीनों को जमीन पर वास्तविक अधिकार दिलाने की दिशा में ठोस पहल करती। 
मैंने उन्हें जानकारी दी कि आगामी 27 सितंबर को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भीतिहरवा आश्रम आएंगे और चंपारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष के अवसर पर जनता को संबोधित करेंगे। इस पर उन्होंने कुछ विशेष टिप्पणी नहीं की, लेकिन एक दलित बंधु ने मुझसे आग्रह किया कि चंपारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष के सिलसिले में पंकज जी ने जो पर्चा (चम्पारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष और गांधी के लोग) जारी किया था, उसे मुख्यमंत्री तक पहुंचाया जाय, ताकि नीतीशजी गांधी के चंपारण की आज की जमीनी हकीकत से वाकिफ हो लें।
हम कहां-कहां से गुजर गये! - [11] 
27 सितम्बर, 2016
जी, ये पंकज जी हैं
पंकज जी व उनके संगी 12 भूमिहीन पर्चाधारी गत 20 जुलाई से बगहा जेल (बिहार) में हैं।पंकज जी जेल में कदम रखने के पूर्व ही कहा था – “हमें संतोष है कि चम्पारण सत्याग्रह के शताब्दी वर्ष में हम चंपारणकी ज़मीन पर किसानों-मजदूरों के अधिकारों की मांग को लेकर जेल जा रहे हैं।”
गांधी के प्रयास से मुक्त चंपारण बरसों पहले ही मिलहों के चंगुल में फंस गया। मिलहों ने चंपारण की जमीन पर अपना कब्जा मजबूत करने के लिए निलहों जैसी शक्ति भी अर्जित कर ली। इसमें उन्हें प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष तरीके से राज्य-सत्ता ने मदद की। और, अब उन मिलहों ने चंपारण के पर्चाधारी भूमिहीन दलितों और उनकी शुभचिंतक मानी जाने वाली वर्तमान सरकार को ही एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने में कामयाबी हासिल कर ली है! यह कहना कतई अत्युक्ति नहीं लगता कि उक्त मामले को ‘स्टेट बनाम पंकज’ केस का रूप देकर सरकार को गफलत में डालने तथा असहाय दलितों को जमीन बांटने के वर्तमान सरकार के संकल्प को बेमानी बनाने की साजिशनुमा कोशिशों में प्रशासन के कई अधिकारियों ने मिलहों की भरपूर मदद की।
बिहार के तमाम ‘गांधियन एंड जेपीयाईट्स’ राजनेता (जिनमें बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी भी शामिल हैं), विभिन्न दलों के पार्टी नेता एवं समाजकर्मी जानते हैं और कमोबेश मानते हैं कि गांधी-जेपी के संघर्ष और रचना की संकल्पनाओं को अमलीजामा पहनाने के लिए 40 सालों से निरंतर संघर्षरत पंकज जी कुछ मायनों में वर्तमान गांधीवादियों और समाजवादियों से अलग पड़ते हैं। वह करनी तो क्या कथनी में भी हिंसा (वाचिक द्वेष, घृणा, झूठ, अपशब्द) बरतने के खिलाफ रहे हैं। उन्होंने लोक को भीड़ में तब्दील करने की परंपरागत सत्ता-राजनीति के खिलाफ बिहार आन्दोलन-1974 के दौरान लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में ‘भीड़ को लोक में परिणत करने’ के विराट आन्दोलनात्मक प्रयोग और अभ्यास में खुद को पूर्ण रूप से समर्पित किया। तब से उनके लिए ‘हमला चाहे जैसा होगा, हाथ हमारा नहीं उठेगा’ – महज नारा या रणनीतिक सूत्र नहीं रहा, यह उनके व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में लोकतंत्र की प्रतिष्ठापना का सर्वाधिक मुख्य, न्यायोचित और व्यावहारिक नीति-नियम बन गया। चंपारण में हुई पिछड़े-दलित भूमिहीन किसान-मजदूरों की पिछली कई लड़ाइयां और उनमें शामिल निहत्थे लोग इस तथ्य के गवाह हैं कि किसी भी जन संघर्ष में राज्यसत्ता का सशस्त्र हमला झेलने के लिए पंकज जी सबसे आगे रहे ; उस दौरान उनके अपने किसी संगी-साथी ने उत्तेजना और आवेश में हमलावरों पर हाथ उठाया, तो पंकज जी ने वह प्रहार भी खुद पर लेने की कोशिश की। और तो और, अपने साथी की इस भूल के लिए भी उन्होंने ‘पश्चाताप’ की प्रचलित वाचिक परंपरा को ‘प्रायश्चित’ के प्रयोग की ओर मोड़ने का प्रयास किया। उन्होंने नेतृत्व की भूमिका में होने के नाते अपने साथी की भूलके लिए खुद को जिम्मेदार और जवाबदेह माना – उसके लिए उन्होंने खुद को सजा दी – लंबे उपवास के जरिये प्रायश्चित किया। इस प्रायश्चित्त से राज्यसत्ता के तत्कालीन संचालकों-नियंत्रकों में किन-किन का सोया विवेक कितना जागृत हुआ – इस सत्य के भी चंपारण में प्रमाण मौजूद हैं। 
लेकिन वर्तमान जेलबंदी के लिए पंकज जी और उनके निहत्थे दलित संगी-साथियों पर भीड़ (कौन भीड़?) को हिंसा के लिए भड़काने, सरकारी काम (कौन काम?) में बाधा डालने, गाली-गलौज करने, सरकारी अधिकारियों की जान लेने का प्रयास करने (निहत्थे लोगों ने सशस्त्रों की जान लेने का प्रयास किया!) के आरोप लगाए गए हैं। और जेलबंदी के दिन से ही उन्हें ‘टॉर्चर’ किये जाने के समाचार भी बाहर आ रहे हैं। टॉर्चर की क्रिया स्पष्ट नहीं है। हो सकता है कि जेल में उन्हें जिस तरह से ‘टीज’ या ‘परेशान’ किया जा रहा हो, वह राज्य-सत्ता के ‘टॉर्चर’ की परिभाषा के दायरे में न आता हो। इस बाबत सिर्फ यह बात सामने आयी है कि जेल-प्रशासन पंकज जी और उनके साथियों पर उनके ‘माओवादी’ होने का खुले आम आरोप लगा चुका है, और अपने आरोप को सिद्ध मानकर टॉर्चर जैसी कारवाई करने (जिसे हमारा प्रशासन अपना विशेषाधिकार मानता है) के प्रति अपनी उद्धतता का इजहार कर चुका है।
जेलर के कक्ष में उनकी उपस्थिति में पंकज जी को मैंने बताया कि पटना से बेतिया रवाना होने के वक्त एक सूचना प्राप्त हुई। वह यह कि ‘बिहार आंदोलन-1974’ के इतिहास के 8 खंडों में से प्रकाशित 5 खंडों का लोकार्पण आगामी 27 सितंबर को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी करेंगे। यह सूचना किसी सरकारी स्रोत से प्राप्त नहीं हुई। डॉ. महेंद्र नारायण कर्ण जी से प्राप्त हुई, जो प्रकाशित और प्रकाश्य बिहार आंदोलन-1974 के इतिहास के आठ खंडों के ‘प्रधान संपादक’ हैं। और उनके सहयोगियों की करीब 350 लोगों की टीम में सबसे प्रमुख सहयोगी - मुख्य आधारस्तंभ – हैं पंकज जी।
हम कहां-कहां से गुजर गए!–[12]
3 दिसंबर, 2016
जेल से छूटे  
रांची।पंकज जी,आज सुबह फोन पर कविता जी से पूरी खबर मिली। आप कल (2 दिसंबर) शाम जेल से निकले। आप स्वस्थ-कुशल होंगे – इस पर कविता जी ने यह सूचना देकर मोहर लगाई कि आप आज भूमिहीन साथियों के गांव जाएंगे – वहां शायद सभा होगी। उसके बाद शाम को पटना रवाना होंगे। पटना में देश भर के करीब एक हजार संघर्षशील साथी जुटे हैं – वे कल आपका अभिन्दन करेंगे और आपको सुनेंगे। मैं कल के उस आयोजन के प्रत्यक्षदर्शी होने के महान अवसर से वंचित रहूंगा। इसका मलाल रहेगा।
मैं सुबह से ही अपनी डायरी के वे पन्ने उलट-पुलट रहा हूं, जो डेढ़-दो महीना पहले आपसे दूसरी बार जेल में भेंट करने के बाद पटना-रांची लौटते वक्त भरे थे। उनमें आपके नाम लिखे पत्रनुमा वे कागजात भी हैं, जिन्हें आपको जेल के पते पर डाक से भेजा था। (वे कागजात आप तक क्यों नहीं पहुंचे, यह ‘विषय’ मेरी अक्षमता और पर-निर्भरता की मजबूरी से जुड़ा मामला है। साथ ही वर्तमान समय, व्यवस्था, और हम साथियों के विचार-कार्य-व्यापार के बीच उन कागजातों की उपयोगिता की ‘समझ’ से भी जुड़ा मामला है। सो इस पर फिर कभी बात होगी – जब आप से मिलने का सौभाग्य मिलेगा।) 
फिलहाल, मैं यह जानने को उत्सुक हूं कि आपने जेल में क्या कुछ लिखा। पिछली बार जेल में मिला था, तो आपने मुझसे ऐसा ही कुछ कहा था। मैंने पटना और रांची में कई ‘गांधी-जेपी के लोगों’ को यह बात बताई थी। मैंने साथियों से ‘बिहार आंदोलन-1974’ के (उसी दौरान लोकार्पित) पांच खंड आपको जेल में भिजवाने का आग्रह किया था कि इससे आपको ‘लिखने’ की प्रेरणा- उत्साह मिले (टीपू जी से हाल में सूचना मिली कि वे खंड आपको जेल में पहुंचा दिये गए)। मैंने आपसे यह आग्रह किया था कि आप जो लिखें, उसका कुछ न कुछ डाक से बाहर भेजें। ऐसा क्यों करना है और ऐसा करना क्यों जरूरी है, इस पर जेलर के समक्ष खूब चर्चा भी हुई थी। आपने ऐसा किया? बाहर के कई साथियों से मैंने कहा था कि वे भी आपको पत्र लिखें, और जेल के पते पर डाक से पत्र भेजें। ख़ास तौर से मैंने आपसे मिलने के लिए जब-तब जेल गेट पर पहुंचनेवाले साथियों से कहा था कि वे आपको पोस्ट कार्ड डालें। लेकिन शायद किसी साथी ने ऐसा नहीं किया!  
मैंने कई साथियों को आपके उस प्रस्ताव के बारे में बताया जो भूमिहीन परचाधारियों को भड़काने के अपने आरोप को क़ुबूल कर भड़कने के आरोप में आपके साथ जेलबंद निर्दोष साथियों को मुक्त करवाने की अपील से संबंधित है। आपके प्रस्ताव में मुझे चंपारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष के मौके पर भूमि-सत्याग्रह के लिए संघर्ष-रचना के विशेष और प्रभावी कार्यक्रम की संभावना छुपी नजर आती है – ऐसा मैंने कई पुराने साथियों से कहा (महेंद्र भाई, प्रो. प्रकाश और घनश्यामजी को भी)। शायद कल आप देश भर के साथियों के बीच इस पर विस्तार से कुछ कहना चाहेंगे।
आप और चंपारण के साथियों के साथ मिलकर आपकी भावी योजना के बारे में आमने-सामने बात करूंगा; अपनी उपयोगिता और क्षमता की सीमा और मर्यादा को समझूंगा। यह भी सोचा है कि आपकी जो भी भावी योजना होगी, उसमें मेरे लिए जो भी भूमिका तय की जायेगी, उसका अनुपालन करूंगा। इसके लिए मुझे निजी स्तर पर जो भी साधन-संसाधन की जरूरत होगी, उसको जुटाने में लगूंगा, ताकि नए साल में – ख़ास कर चंपारण-सत्याग्रह शताब्दी वर्ष के रूप में उपलब्ध मौके के मद्देनजर - मैं खुद को सार्वजानिक जीवन जीने लायक बना सकूं ; ताकि नेतृत्व की भूमिका निभाने को तैयार-तत्पर अपने युवा साथियों को मैं सार्वजानिक योजना या कार्यक्रम में किसी भी स्तर पर मेरे बोझ या बाधा होने की आशंका से मुक्त रख सकूं।
आगे की यात्रा के लिए देह के कल-पुर्जों की मरम्मत में लगा हूं, लेकिन पिछले बीस दिन में दिल-दिमाग इतना हिल गए कि मानसिक तैयारी गड़बड़ा गयी है! हमारे प्रभुओं ने नोटबंदी (विमुद्रीकरण) के नाम पर हमारी निजी और सामाजिक ईमानदारी की पूंजी को नष्ट करने का ऐसा खेल जो शुरू किया! बरसों से सिद्ध अपनी ‘पूंजी की ईमानदारी’ को फिर से सिद्ध करने के लिए सड़क पर कतार में खड़े होकर अपनी ‘ईमानदारी की पूंजी’ को बचाने में हम (गांधी-जेपी के लोग होने का दावा करने वाले!) किस कदर अकेले हो गए! - आपका, हेमंत।
हम कहां-कहां से गुजर गये! - [13]
जनवरी 2017
चम्पारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष : प्रस्तावित कार्यक्रम
पंकज जीको 29 नवंबर, 2016, को पटना हाईकोर्ट से जमानत मिली। वह 1-2 दिसम्बर 2016 को बगहा जेल से छूटे। जेल से छूटने के बाद वह पहले अपने साथ छूटने वाले भूमिहीन साथियों के साथ उनके गांव गये और तब बेतिया अपने घर लौटे। तीन दिसंबर को देशभर के संघर्षशील साथी – जो अपने किसी संस्था-संगठन से ज्यादा गांधी-जेपी के लोग नाम से चर्चित हैं - पटना में जुटे। नए साल यानी चम्पारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष में चम्पारण भूमि-सत्याग्रह करने के प्रस्ताव पर कुछ ठोस फैसला करने के लिए। लेकिन उसके पहले उन्होंने यह पत्र जारी किया:
(1) चम्पारण सत्याग्रह के दौरान गांधीजी का सहयोग करने वाले वकीलों और संपन्न किसानों–जमींदारों के नाम तो सभी जानते हैं। लेकिन अपने पर हुए जुल्मों का बयान करने वालों के नाम आज भी दबे–छुपे हैं। ये नाम चम्पारण सत्याग्रह के इतिहास के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। इनके नाम के बिना चम्पारण सत्याग्रह का इतिहास अधूरा है।                                                     
चम्पारण सत्याग्रह के दौरान निलहों के जुल्म से पीड़ित 8000 किसानों ने आपने बयान दर्ज कराये थे। 26 अप्रैल, 1917 को गांधीजी और रामनवमी बाबू बेतिया से 06 किमी दूर सिंघाछापर एक जांच के लिए पहुँचे। वहाँ उन्होने एक तेलिन और एक बढ़इन का बयान लिया। राजकुमार शुक्ल की डायरी और बेतिया–चनपटिया पथ में कुडिया कोठी के पास लगे शीलालेख पर ‘तेलिन’ और ‘बढ़इन’ का उल्लेख है। लेकिन उनके नाम नहीं हैं। 
24 अप्रैल, 1917 को गांधीजी ने ब्रजकिशोर प्रसाद, राजकुमार शुक्ल, खेन्हर राव आदि के साथ बेतिया से लवकरिया के लिए रवाना हुए थे। रास्ते में राजमन कुरमी की जमीन की तहकीकात हुई। उसी दौरान गांधीजी उस ‘मां’ से मिले, जो एक अद्भुत फ़रियाद लेकर आयी थी। निलहों के लठैतों ने उस मां के जवान बेटे पर लाठी बरसाई थी। लाठी की मार से सिर फूट जाने से वह मर गया। वह मां का इकलौता बेटा था। मां के दुःख की सीमा न थी। वही मां गांधीजी के पास आयी और बोली – “मेरा इकलौता बच्चा चला गया। उसे किसी तरह जिला दीजिए।” 
गांधीजी गम्भीर होकर बोले – “मां,मैं तुम्हारे बच्चे को कैसे जीवित करूं? मेरी ऐसी शक्ति कहां? ऐसी पुण्याई कहां?”
“क्यों? राजकुमार शुक्ल से हम जान चुके हैं, आप महात्मा हैं। अब तो साक्षात देख रहे हैं। आप भगवान के अवतार हैं। हम पापियों का उद्धार आप से ही होगा। हम पापी दूसरों को मारते हैं,इसलिए किसी को जिंदा करने की ताकत खो चुके हैं। लेकिन आप तो किसी मारते नहीं,दूसरे के बदले खुद मरने को तैयार रहते हैं। सो आप में किसी को भी जिंदा करने की ताकत होगी...।”
चम्पारण-सत्याग्रह शताब्दी वर्ष में हमारा यह दायित्व है कि हम ऐसे 'अनाम' पात्रों का अनुसंधान करें और इतिहास में उनको यथोचित स्थान एवं सम्मान दिलावें। उन किसानों के वंशजों की पहचान कर आज की उनकी हालत से परिचित होना भी एक महत्वपूर्ण काम होगा।
(2) चम्पारण आगमन के दौरान गांधीजी ने यहां की गरीबी, निरक्षरता और गंदगी को देखा। उन्होने यहां तीन स्कूलों की स्थापना की। परन्तु स्थानीय स्वंयसेवक नहीं मिलने के कारण ये सभी स्कूल एक साल के अन्दर ही बन्द हो गये।
1939 में गांधीजी दूसरी बार चम्पारण आये। मई के प्रथम सप्ताह में चनपटिया में बुनियादी विद्यालयों की शुरुआत हुई। चनपटिया अंचल में 28 और पूरे चम्पारण में 53 बुनियादी विद्यालय हैं। पर आज ये विद्यालय बुनियादी या नयी तालीम के केन्द्र नहीं रहे। अब यहाँ श्रम व कौशल विकास के साथ सीखने–सिखाने का काम नहीं होता। चनपटिया अंचल के वृन्दावन में बुनियादी विद्यालयों के संस्थापक एवं स्वतंत्रता सेनानी प्रजापति मिश्र ने वृन्दावन आश्रम के लिए दान में 102 बीघा जमीन प्राप्त की थी। खादी–वस्त्र, ग्रामीण विश्वविद्यालय की स्थापना और गोसेवा के लिए प्राप्त यह जमीन छिन्न-भिन्न हो गयी। 
आज बेतिया से लेकर पटना तक - प्रजा से लेकर प्रभु-वर्ग तक – को यह जानकारी है कि वृंदावन आश्रम की 102 बीघा में से नवोदय विद्यालय के लिए 35 एकड़ जमीन ले ली गयी है | ट्रस्ट की शेष जमीन को एक बड़े दान–दाता के परिवार वाले गैरकानूनी ढंग से बेच रहे हैं। जबकि ट्रस्ट के संरक्षण की जिम्मेवारी जिला पदाधिकारी और चनपटिया के अंचल अधिकारी की है। अनेक बुनियादी विद्यालयों की भूमि पर दबंगों का कब्जा है। इस शताब्दी वर्ष में इन विद्यालयों एवं वृन्दावन आश्रम की भूमि मुक्त कराना भी एक चुनौती है |
भितिहरवा आश्रम के पास स्थानीय प्रयास से 1986 में कस्तूरबा कन्या उच्य विद्यालय की स्थापना हुई थी। प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री सहित अनेक नेताओं ने आश्रम में माथा टेकने के बाद इस विद्यालय की सहायता करने का आश्वासन दिया। यह विद्यालय एक कदम आगे और दो कदम पीछे चलता एवं बन्द होता है। चंपारण शताब्दी वर्ष में कुछ धुनी युवकों ने विद्यालय को ज़िंदा-जीवंत करने का संकल्प किया है। लेकिन उनके संकल्प के भुक-भूक करते दीये में इतना प्रकाश नहीं कि सामने के घने अँधेरे को चीर सके। थारू आदिवासी बहुल एवं शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़े इस इलाक़े में कस्तूरबा कन्या उच्य माध्यमिक विद्यालय+2 को सबल बनाना समाज और शासन के सामने एक जरूरी काम है।
(3) आज भी चम्पारण के गांवों में कूड़े के ढ़ेर लगे हैं। शासन ने जिन गांवों में नालियाँ बनवायीं उनमें से अधिकांश टूट–फूट गयी हैं या गांववालों ने उसे मिट्टी से भर दिया है। भितिहरवा आश्रम में रहते हुए कस्तूर बा ने बच्चों एवं स्त्रियों को साफ–सफाई के लिए प्रेरित किया था। गांधीजी ने कहा – “घर-आंगन, अड़ोस–पड़ोस और तन– मन की सफाई के बिना स्वराज नहीं आयेगा।” शायद इसीलिए आज तक स्वराज आया भी नहीं। चम्पारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष से गांधीजी की 150वीं जयन्ती तक समाज और शासन को लोक शिक्षण एवं सफाई का अभियान चलाना होगा। व्यक्तिगत शौचालय के मुकाबले सामुदायिक शौचालय ज्यादा उपयोगी साबित हो सकेगा। गरीब परिवार के पास वास भूमि की कमी, पानी का अभाव और शौच के लिए बाहर जाने की लत के कारण व्यक्तिगत शौचालय का निर्माण असफल साबित हो रहा है। सामुदायिक शौचालय के संचालन के लिए वार्ड सभा और वार्ड सदस्य को जवाबदेही सौंप कर और शौचालय के इस्तेमाल का अभियान चला कर हालात को बदला जा सकता है |
(4) 22 अप्रैल, 1917 को गांधीजी मोतीहारी से बेतिया पहुंचे। तत्कालीन बेतिया सब डिवीजन में किसानों का बयान दर्ज करने, स्वंयसेवकों–सहयोगियों से विमर्श करने तथा भोजन एवं ठहराव के लिए हजारीमल धर्मशाला केन्द्र बना। धर्मशाल के संस्थापकों के वंशजों ने इसे एक व्यापारिक केन्द्र के रूप में बदल दिया है। बिहार सरकार का यह कर्तव्य है कि वह धर्मशाला के शेष पुराने ढाँचे को राष्ट्रीय स्मारक के रूप में विकसित करे।
यह सब कुछ करके ही हम चम्पारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष के आयोजन को सार्थक बना पायेंगे। स्वराज्य गांधीजी का सपना था। हमें सफाई और सत्याग्रह के रास्ते ही स्वराज की ओर बढ़ना है। 
(5) आजादी मिलने से पहले ही हिंदूवादी संगठनों ने कई बार गांधीजी की जान लेने की कोशिश की। समझौते के अनुसार पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये देने का समर्थन करने और देश के बंटवारे का झूठा आरोप उन पर थोपकर 30 जनवरी 1948 को उनके शरीर का अन्त कर दिया गया। 1917 में चम्पारण में महात्मा गांधी की जान बत्तक मियां ने बचाई और आज कुछ लोग बचानेवाले की नहीं, बल्कि मारनेवाले गोडसे की जय बोलने में लगे हैं। हमें शांतिपूर्वक इस साजिश का भी मुकाबला करना है। 
हम कहां-कहां से गुजर गए! – [14]  
05-02-2017
पंकज जी का फोन 
पिछले हफ्ते पंकज जी (बेतिया, पश्चिम चंपारण) का फोन आया। संभवतः 28 जनवरी को। पूछा कैसा हूं, क्या कर रहा हूं। हालांकि वह जानते हैं कि मैं फिलहाल क्या कर रहा हूं और कैसा हूं। फिर कहा कि 21 फरवरी 2017 को मैं चंपारण आऊं। “उस दिन देश भर के कम से कम सौ समाजकर्मी जुटेंगे। ये सब के सब वे लोग होंगे जिन्हें आप जानते हैं – गांधी-जेपी के विचारों को जानने-मानने वाले लोग, बिहार आन्दोलन-1974 में शामिल साथी-मित्र। सब मिलकर गाँधी चंपारण सत्याग्रह शताब्दी (वर्ष 2017) के लिए एक कार्य-योजना तैयार करेंगे। उसमें आपका काम बन जाएगा। आप सप्ताह-दस दिन के लिए आइएगा, तो काम को आगे बढ़ाने का सब इंतजाम हो जाएगा।”        
मैं चौंका। हाँ-हां आऊंगा कहते हुए जल्दी-जल्दी में बता गया कि “मैं बिस्तर पर पड़े रहने के सुअवसर का लाभ लेते हुए चंपारण और गांधी-सत्याग्रह विषयक दस्तावेजी सामग्री को पढ़ने और कच्चा लेखन करने का ‘होमवर्क’ कर रहा हूं – बिल्कुल अनियमित ढंग से। चम्परण-सत्याग्रह के शोध-अध्ययन के लिए पिछले दो-तीन सालों से पैसा जुटाने की कोशिश में अब थक चुका हूं। गांधी स्मृति दर्शन समिति (दिल्ली) की ओर से बच्चों के लिए मोनिया-मोहनदास-महात्मा कथा-सिरीज के तहत आगे की 13 पुस्तकों के संपादन,प्रकाशन और पारिश्रमिक के पैसे के बारे में अभी तक अनिश्चितता बनी हुई है। सोचा था कि यह पैसा मिलेगा तो कम से कम ‘चंपारण का गांधी: गांधी का चंपारण’ विषयक शोध-अध्ययन के लिए चंपारण दौरों का खर्च निकल आएगा। लेकिन पैसा जुटाने का काम अधर में लटका हुआ है। अब मुझे यह ख़तरा नजर आ रहा है कि कहीं यह शोध-अध्ययन धरा का धरा न रह जाए...!” 
मेरा रोना लंबा हो रहा था – जो अक्सर होता ही रहता है ; यह जानते हुए भी कि कई साथियों को यह रुदन रुचता नहीं, तब भी मैं इसे जारी रख कर उन्हें परेशान करता रहता हूं। सो बीच में ही पंकज जी ने कहा – “मैं फिलहाल बैठक में हूं। साथियों ने कहा तो आपको फोन किया। आप आइए, शोध-अध्ययन का काम भी होगा। आप चिंता न कीजिए। बैठक अभी चल रही है...।” और, फोन कट गया।
हम कहां-कहां से गुजर गए!–[15]
26 फरवरी, 2017
सत्याग्रह सभा 
26 फरवरी, 2017को लौरिया में ‘सत्याग्रह-सभा’ का आयोजन हुआ।सत्याग्रह-सभा में दशकों से भूमि-अधिकार से वंचित हजारों पर्चाधारी किसान-मजदूरों के व्यापक ‘सत्याग्रह’ के दृष्टि-पत्र और संकल्प की घोषणा हुई। ‘सत्याग्रह’ की दृष्टि-दिशा और विधि-प्रक्रिया सूत्रबद्ध रूप में पेश की गयी, ताकि भूमि-अधिकार से वंचित पर्चाधारी किसान-मजदूर अपने संघर्ष की गरिमा, महत्ता और संभावनाओं की समझ के साथ एकजुट हों ; और बिहार सहित देश के विभिन्न इलाकों में इसी तरह के अन्य मुद्दों पर संघर्ष-रचना के कार्यों में सक्रिय लोग और संगठन ‘चंपारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष-2017’ के उपलक्ष्य में इस एकजुटता को नया अर्थ, व्यापकता और दृढ़ता प्रदानं करने में योगदान करें।
(1) भूमि-अधिकार से वंचित पर्चाधारी किसान-मजदूर व्यापक सत्याग्रह की तैयारी करेंगे। ‘सत्याग्रही’बनने के लिए प्रशिक्षण लेंगे।अपने हक-अधिकार के लिए दूसरों पर हमला करना या उन्हें दुख पहुंचाना आसान है, लेकिन अपने वाजिब हक के लिए खुद को संकट में डालना, तकलीफ उठाना, मार खाना कठिन है। सत्याग्रह की सफलता के लिए इसीकी तैयारी की जाएगी। 
(2) चंपारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष 2017 ने एक अवसर दिया है ; विशेषकर प्रगतिशील लोगों को, छात्रों-युवाओं को, 1974 के बिहार आंदोलन, जिसे जेपी आंदोलन के नाम से भी जाना जाता है, के साथियों को। आजादी के संघर्ष के सपनों को साकार करने के लिए जेपी की ‘संपूर्ण क्रांति’ के उद्घोष की दिशा में तेज गति से बढ़ने का यह एक मौक़ा है। निश्चित ही भूमि-अधिकार से वंचित किसान-मजदूरों के वर्तमान काम का भी यही मकसद है कि आम जन, खासकर खेत-मजदूर, छोटे किसान और महिलाएं, निर्भय बनें, सशक्त बनें। 
(3) लोकतंत्र में ‘चुनाव’ जनता की अपनी चाहत और ताकत जाहिर करने का जरिया है। नहीं वह एकमात्र जरिया नहीं है।सत्याग्रह और नागरिक अवज्ञा (सिविल नाफरमानी) के द्वारा भी जनता अपनी ताकत और इच्छा प्रकट करने के लिए ‘स्वतंत्र’ है। विशेषकर तब, जब भूमिपतियों ने भूमिसुधार कानून की धज्जियां उड़ा दी हैं।हजारों पर्चाधारी भूमि की आस में बूढ़े हो गए हैं और ‘घराड़ी’ की जमीन से वंचित हजारों परिवारों के बच्चे और महिलाएं गुमनामी के अंधेरों में भटक रहे हैं। 40-42 वर्षों से चल रहे सीलिंग के केसों का न्यायिक निष्पादन नहीं हुआ।विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की छतरी के नीचे यह अन्याय जारी है। सभी कहते हैं कि न्याय में विलंब अन्याय है, लेकिन यह सवाल आज भी अनुत्तरित है कि यह अन्याय कौन कर रहा है?
(4) जनता भी बंटी हुई है। कोई मोदी का दीवाना है, तो कोई मायावती का। कोई दीवाना लालू का, मुलायम का, तो कोई नीतीश का, अखिलेश का। कोई आम का तो कोई ख़ास दल का। जात, मजहब और नेताओं के बीच बंटे हुए लोगों का सत्याग्रही बनना और ज्यादा मुश्किल है। ऐसे हालात में दुष्यंत याद आते हैं : “लोग हाथों में लिये बैठे हैं अपने पिंजरे, आज सैय्याद को महफ़िल में बुला लो यारो!” 
(5) वर्षों पुरानी मांग को मानते हुए बिहार सरकार द्वारा सितंबर 2016 में बिहार भूमिसुधार (भूहदबंदी एवं अधिशेष भूमि अर्जन) कानून, 1961 की उपधारा 45बी में संशोधन कर देने से राजस्व मंत्री के कोर्ट में चल रहे दर्जनों मुकदमें खारिज हो गए हैं। फलतः सिर्फ पश्चिम चंपारण में 6000 एकड़ भूमि भूमिहीनों के बीच वितरण का इंतजार कर रही है। शराबबंदी लागू कर बेशक सरकार ने बड़ा काम किया है, पर भूमिसुधार लागू किए बिना और वास भूमि का अधिकार पक्का करने के लिए एक अधिनियम बनाए बिना शराबबंदी सफल नहीं होगी। 
(6) चंपारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष 2017 ने बिहार सरकार को बंदोपाध्याय कमेटी की अनुशंसा लागू न कर पाने के पाप को कम करने का एक अवसर दिया है। क्या बिहार सरकार जनता की ताकत प्रकट हुए बिना इस अवसर को पहचान पाएगी?
(7) हमारे लिए प्राथमिक काम यह है कि हम जनता, विशेषकर कमजोर वर्गों, को जातिवाद, सांप्रदायिकता, शराब और आपसी झगड़ों से मुक्त करें। अपनी कमजोरियों से मुक्त हुए बिना जनता सत्याग्रही नहीं बन सकती। हम सभी जानते हैं कि तन-मन से स्वस्थ और प्रशिक्षित सैनिक ही सीमाओं की हिफाजत करते हैं। अहिंसा के सैनिक यानी सत्याग्रही को भी अपनी कमजोरियों से मुक्त होकर स्वस्थ तन-मन से जोत और वास की भूमि, अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों का अधिकार हासिल करना है। हमारे नेताओं ने त्याग और बलिदान के बल पर, गहरे सामाजिक द्वेष-दूरियों के बीच भी, आजादी की लड़ाई जीत ली। बंटनी थी जमींदारों की जमीन, लेकिन बंट गया देश! गांधीजी ने कहा था कि अंग्रेजों के जाने के बाद जमींदारों को जमीन छोड़नी होगी। देश के बंटवारे की कीमत पर अंग्रेज चले गए, पर जमींदारों की जमीन नहीं बंटी। अगर जनता अपनी कमजोरियों को समझे बिना और उससे लड़े बिना सत्याग्रही बनकर कुछ हासिल कर भी लेती है, तो वह हाथ से निकल भी जाएगी। 
(8) हमें गांधी, अंबेडकर और भगतसिंह में कौन बड़ा है, कौन छोटा है, इस लफड़े में नहीं पड़ना है। इनमें से किसी को महान और किसी को छोटा बताने-दिखाने वाले लोग घटिया मानस के शिकार और क्षुद्र राजनीति के सौदागर हैं। हिंदू अच्छा है या मुसलमान, इस तरह के सवालों ने ही आजादी के सपने को पूरे नहीं होने दिए। 
(9) हमें संभव बराबरी वाला मुक्त समाज बनाने के लिए हर स्तर पर बड़े-छोटे के भेद के खिलाफ उठ खड़ा होना है। व्यापक सत्याग्रह कर हम जोत भूमि और वास भूमि का अधिकार हासिल करेंगे। और, इस तरह बड़े-छोटे के बीच अंतर करने वाली एक दीवार को गिरा देंगे। एक ऐसी दीवार, जिसमें कोई खास दम नहीं है, लेकिन आदमी और आदमी के बीच भेद करने वाली दीवारें तभी बेदम होंगी, जब हम दमदार होंगे।
(10) हमें यह ताकत हथियारों से नहीं, अपने अंदर की नैतिक (रूहानी) सत्ता और संगठन की शक्ति से हासिल होगी। तभी हम सत्याग्रही बन पाएंगे। हमारे सत्याग्रह का एक बड़ा मतलब यह है कि आम जनता ताकतवर हो और जनप्रतिनिधि (नुमाइंदे) जवाबदेह।
हम कहाँ-कहाँ से गुजर गये! [16]  
अप्रैल, 2017
सर्वेक्षण 
डॉ. राममनोहर लोहिया की अध्यक्षता वाली ‘चम्पारण फार्म जांच आयोग’ (1950) के अनुसार गांधीजी के चम्पारण छोड़ने (1918) के बाद लगभग ढाई लाख एकड़ भूमि रैयतों के हाथ से निकलकर सूदखोंरो, चीनी मिलों तथा भूस्वामियों के पास चली गई।
वर्ष 1917 मेंयानी सौ साल पहले चंपारण में नील की कोठियों के अंग्रेज साहबों के दो दर्जन अहबाबों (टैक्सों) से दबे और उनकी मनमानियों के शिकार 8000 किसानों ने गाँधी जी और उनके सहयोगियों के सामने बयान दर्ज कराया था।
उक्त दो प्रमाणिक तथ्यों के बीच एक छोटा-सा सवाल है, जो पिछले 67 सालों से जवाब चाहता है।आज उस सवाल को सूत्रबद्ध करें तो वह इस प्रकार होगा - सौ वर्ष पहले जिन किसानों ने निर्भय होकर अंग्रेज कोठी वालों के खिलाफ अपने बयान दिये थे,  आज उनके वंशजों की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिति क्या है और कैसी है? पूर्वजों के उन बयानों के आधार पर ही तो ‘चंपारण कृषक जांच समिति’ का गठन हुआ था। जांच समिति की सिफारिशों के आधार पर ‘विधेयक’ बना, पारित हुआ और चंपारण के किसानों के लिए ‘निलहों’ से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त हुआ था।
पूर्वजों द्वारा दिये गए बयानों के आधार पर वंशजों से यह पूछें तो कि
क्या उनके पूर्वज किसान थे? बटाईदार थे? या गोर निलहे या देशी जमींदार या किसी रैयत के यहां काम करने वाले खेतिहर मजदूर थे? 
वर्ष 1917 में पुरखों के पास कितनी भूमि थी, और आज उनके वंशजों के पास कितनी है?
क्या बयान देने वाले पूर्वजों के वंशजों में कोई आज पर्चाधारी भूमिहीन हैं? पर्चे की भूमि पर उनका दखल-कब्जा है या नहीं?
यह सर्वविदित है कि वर्ष 2019 में महत्मा गांधी के जन्म के 150 वर्ष पूरे होंगे। वर्ष 2017 के अप्रैल से वर्ष 2019 के अक्टूबर तक की अवधि है करीब ढाई वर्ष। इस अवधि ने हमें एक अवसर दिया है – (1) वर्तमान के सन्दर्भ में ‘इतिहास को जानने-पहचाने का और (2) ‘इतिहास’ के परिप्रेक्ष्य में ‘वर्तमान’ का आकलन-विश्लेषण का।
इसे संक्षेप में कहें, तो हमारे देश के अतीत, वर्तमान और भविष्य से जुड़े तीन शब्द - ‘चंपारण’, ‘गांधी’ और ‘सत्याग्रह’ – से जुड़ा यह अवसर है : ‘चम्पारण के गाँधी’ और ‘गाँधी के चम्पारण’को जानने-समझने-पहचानने का।
इतिहास की हमारी यह पुनर्यात्रा’ वर्ष 2015 के जनवरी से ही शुरू हो गयी थी। जब गांधी की भारत वापसी के सौ साल पूरे होने के उपलक्ष्य में देश भर में कई तरह के आयोजन हुए थे – सरकारी स्तर पर और गैर-सरकारी स्तर पर भी। कहीं सभा-सम्मेलन हुए, कहीं जुलूस निकले, कहीं प्रदर्शन हुए। गांधी के दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने की स्मृति में केंद्र सरकार के स्तर पर सिर्फ दिल्ली नहीं, बल्कि और अन्य प्रदेशों की राजधानियों में राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर के ‘प्रवासी भारतीय सम्मेलन’ का सिलसिला शुरू हुआ। तभी से देश भर के हमारे पत्रकार, समाज-कर्मीं, संस्कृति-कर्मी मित्रों को यह सवाल दिल-दिमाग को मथने लगा था कि 9 जनवरी, 1915 को जिस गांधी के भारत आगमन की याद में आयोजन या समारोह हो रहे हैं, वह कौन गांधी था? कैसा गांधी था? किसका गांधी था? इन आयोजनों-समारोहों के मकसद और मतलब के आईने में गांधी का वह चेहरा (भारतीय मूल का प्रवासी!) क्या वैसा नजर आता है, जो दक्षिण अफ्रीका से भारत वापसी (स्थायी निवासी बनने के लिए) के ‘दस्तावेजी’ इतिहास से झलकता है? 
सत्याग्रह और चंपारण-प्रयोग के सिलसिले में गांधी की 1917 के पूर्व की और बाद की विचार-यात्रा को जानने-समझने के लिए हमने कई दस्तावेज (गांधी के प्रकाशित-अप्रकाशित पत्र और उनके द्वारा संपादित एवं अन्य समकालीन पत्र-पत्रिकाओं में प्राकाशित उनके आलेख) और कुछ पुस्तकों (हिंद स्वराज, गांधी की आत्मकथा – ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ और सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय के कुछ खंड सहित) के सामूहिक अध्ययन का अभ्यास किया। उन पुस्तकों के ख़ास अंशों पर विचार-विमर्श हुआ, तो हम मित्र इन सवालों पर अटक गए कि क्या ‘चंपारण-सत्याग्रह’गांधी का वैचारिक प्रयोग था?अगर हां, तो सौ साल बाद उस प्रयोग का क्या महत्व है? और, इससे दीगर सवाल यह कि आखिर चंपारण ने अपनी समस्या और संकट के समाधान के लिए गांधी को ही क्यों चुना और खुद गांधी ने 21 साल बाद दक्षिण अफ्रीका से भारत लौट कर अपने सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन की शुरुआत चंपारण से करने की क्यों ठानी?
बहरहाल, इतिहास के रुके हुए क्षणों जैसे इन सवालों की तलाश में हमने गांधी के उन सभी बयानों और आलेखों की खोज करने और संकलित करने का प्रयास किया, जिसमें उन्होंने चंपारण-प्रयोग का उल्लेख किया। और, इसके साथ हमने सत्याग्रह शताब्दी वर्ष के सिलसिले में चंपारण की यात्रा का कार्यक्रम और रूट-मैप तैयार किया। इसके लिए हम मित्रों का एक शोध-अध्ययन दल “गांधी के चंपारण” की यात्रा में निकल गया था - “चंपारण के गांधी” की खोज में। अध्ययन दल के सदस्य-मित्र – पंकज, शैलेन्द्र, प्रो.प्रकाश, प्रो. शमशुल हक़, प्रभात और हेमंत – कभी साथ मिलकर और कभी दो-तीन ग्रुपों में बंटकर मोतिहारी-बेतिया से लेकर कनछेदवा, लवकरिया, जसौली, सींघाछापर, नरकटियागंज, शिकारपुर, लालगढ़, सरसिवां आदि-आदि दर्जनों गांवों में पहुंचे। ऐसे क्षेत्रों और स्थानों का दौरा किया - जहां गांधी के जाने, रहने-टिकने और लोगों की स्मृति में उनके जिंदा होने की जानकारी मिली। इस दौरान आम और ख़ास लोगों से गांधी के प्रयोग और वैचारिक-यात्रा से संबंधित जो जानकारी मिली, सौ साल पूर्व की जो घटनाएँ और तथ्य किस्से-कहानियों के रूप में सुनने को मिले, उनसे हम बरसों से दबे-ढंके और नये रूप में पुनः प्रकट कई पुराने सवालों से घिरे। उन सवालों के सामाधान के लिए दस्तावेजों और प्रमाणों की खोज, संकलन, अध्ययन और मौखिक इतिहास के सत्यापन की हमारी अकादमिक यात्रा जारी है। इस अकादमिक यात्रा में मदन मिश्र (पटना), सचिन चक्रवर्ती (दिल्ली), शाशिभूषण (पत्रकार, पटना) भी शामिल हुए। इतिहास की इस पुनर्यात्रा में ज्ञात-अज्ञात दस्तावेजों से गुजरने के श्रम-साध्य कार्य के लिए बेतिया, पटना और दिल्ली स्थित अभिलेखागारों में कार्यरत कुछ कर्मचारियों और अधिकारियों ने सहयात्रियों-सा सहयोग प्रदान किया।
अब सत्याग्रह शताब्दी वर्ष के सिलसिले में हम पुराने मित्रों ने नयी पीढ़ी के चंद युवा मित्रों के सहयोग से पश्चिम चंपारण के सर्वेक्षण की योजना बनायी है। इसके तहत, उन पूर्वजों के वंशजों की खोज और पहचान का कार्यक्रम तय किया गया है, जिन्होंने सौ साल पहले गांधी जी और उनके सहयोगियों के सामने बयान दिए थे। इतिहास के जानकारों के अनुसार चम्पारण में सुदूर गांव-देहातों से निकल कर मोतिहारी और बेतिया में गांधी और उनके सहयोगियों के समक्ष निलहों के खिलाफ बयान देने के लिए पहुँचने वालों के संख्या 8 से 14 हजार थी। हमने उपलब्ध या उपलब्ध हो सकने वाले बयानों के आधार पर सौ बयानकर्ता पूर्वजों के वंशजों के परिवारों की ‘पहचान’ करने के लिए एक सर्वेक्षण जून से दिसंबर, 2017 तक संपन्न करने का लक्ष्य तय किया है। सौ पूर्वजों के वंशज परिवारों के जितने सदस्य (स्त्री और पुरुष) चंपारण में हैं, उनकी खोज कर एक प्रश्न-पत्र के जरिये नाम-पता और सत्यापन का कार्य किया जाएगा। इसी दौरान ऐसे लोगों से मुलाकत करनी है, जिन्होंने सौ साल बाद भी अपनी स्मृति में अपने पूर्वजों की याद सहेज रखी है।उनमें ऐसे लोग भी अवश्य होंगे जिनके पूर्वजों ने सौ साल पहले भले ‘बयान’ दर्ज नहीं कराए, लेकिन गांधी के मिशन में निर्भय होकर का सक्रिय सहयोग किया।उनसे मालूम हो सकेगा कि उन्होंने कैसी-कैसी यातनाएं झेलीं, कष्टों और कठिनाइयों का सामना किया, त्याग और कुर्बांनी की कीमत पर सामाजिक और राजनीतिक सत्ता को चुनौती दी। इस सर्वेक्षण को अंजाम देंगे  पश्चिम चंपारण के तीन युवा मित्र– शंभू कुमार सिंह (गांव), संत राम (गांव), और जीतेंद्र।
चंपारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष में ‘इतिहास के और 'सर्वेक्षण' के आईने में चंपारण-सत्याग्रह को समझने-परखने के इस प्रयास का मकसद यह है कि    
(क) पिछले 100 वर्षो में विशेषकर 1918 के बाद से लेकर 1950 तक किसानों के हाथ से निकल कर चीनी मिलों और बड़े भूपतियों तक क्यों और कैसे पहुंची– इस रहस्य का खुलासा हो।
(ख) चम्पारण में जमीन की लूट की कहानियां प्रचलित हैं। शोध-सर्वेक्षण के जरिये प्राप्त तथ्यों/आंकड़ों से ऐसे ठोस नतीजे रेखांकित हों जो समाज तथा शासन का ध्यान आकृष्ट कर सकें।
(ग) ठोस तथ्यों/आंकड़ों और सूचनाओं के जरिये चंपारण में भूमि और खेती की अद्यतन स्थिति समझी जा सके।आज भी संघर्ष-सत्याग्रह के लिए उत्तेजित-प्रेरित भूमिहीन और पर्चाधारी किसान-मजदूर भी अपनी भूमिहीनता और बदहाली के कारणों को जान-समझ सकें। ताकि वे गत तीस वर्षो में बड़े पैमाने पर हुए भूमि-हस्तांतरण के खिलाफन्याय की मांग तेज कर सकें।
(घ) सौ साल पहले बयान देने वाले पीड़ित लेकिन संघर्ष के लिए निकले निर्भय किसान परिवारों के वंशजों ने पिछले 100 वर्षों में क्या खोया व क्या पाया? 1917 में अनेक ऐसे किसानों ने बयान दिया था जिनकी रैयती जमीन अंग्रेज कोठी वालों ने छल से ले ली थी। क्या उन पूर्वजों के वंशज में भी कोई आज भूमिहीन या पर्चाधारी है? 
यह सब जानने-समझने से वह इतिहास परत दर परत खुलेगा, जो चंपारण की ‘स्मृतियों’ में ज़िंदा ‘गांधी, उनके ‘सत्याग्रह’ की संकल्पना-स्ट्रैटजी की सफलता-विफलता और प्रासंगिकता आदि से जुड़ा है। और, यह सिर्फ चंपारण या बिहार के नहीं, बल्कि पूरे देश के किसानों के लिए प्रासंगिक हो सकता है। सौ साल पहले जिस चंपारण ने देश को आजादी की नयी राह दिखाई थी, वह आज आजाद देश की विकास-यात्रा की राह में कितना आगे बढ़ा या कितना पीछे रह गया – अतीत और वर्तमान के शोध-अध्ययन-सर्वेक्षण की यह पुनर्यात्रा भावी चिन्तन और योजनाओं के लिए “आधारपाठ’ साबित हो सकती है।
हम कहाँ-कहाँ से गुजर गये!– [17] 
जनवरी, 2018 
चंपारण को ही क्यों चुना?
सौ साल पहले चंपारण के किसानों ने अपनी समस्याओं से निजात पाने के लिए गांधी को बुलाया।
क्यों? सिर्फ गांधी को क्यों चुना? 
और, गांधी ने भारत में सत्याग्रह के अपने प्रथम विराट प्रयोग के लिए चंपारण को चुना।
क्यों? चंपारण को ही क्यों चुना?  
गांधीजी 21 साल बाद अभी-अभी दक्षिण अफ़्रीका से आये थे। उस वक्त देश में उनसे ज्यादा लोकप्रिय और बड़े-बड़े नेता थे, जिनके चंपारण जाने से व्यापक प्रभाव पड़ सकता था।इतिहास गवाह है कि वस्तुतः उस समय तक यानी चंपारण जाने का फैसला करने तक गांधी भारत की राष्ट्रीय राजनीति में दूसरी पंक्ति की नेताओं की कतार में थे। पहली पंक्ति में बालगंगाधर तिलक थे - लोकमान्य। ‘कांग्रेस’ के बैनरतले राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल देश के ख़ासो आम में वे ‘गरम दल’ के शिखर पुरुष के रूप में चर्चित थे। और, खुद गांधी उनको देश का सर्वश्रेष्ठ नेता मानते थे और उनके सार्वभौम रूप के सामने नतमस्तक थे। दूसरे, श्री गोपालकृष्ण गोखले को तो गांधी अपना गुरू मानते ही थे, जो देश में राष्ट्रीय आन्दोलन के नरम दल के श्रेष्ठ प्रतिनिधि के रूप में विख्यात थे। उस समय तो नेतृत्व के मामले में एनी बेसेंट, लाला लाजपत राय, विपिनचंद्र पाल, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, डॉ. सच्चिदान्न्द सिन्हा, मजहरुल हक़ जैसे कई क्षेत्रीय स्तर पर चमकते और राष्ट्रीय स्तर पर उभरते नेताओं की तुलना में भी गांधी पीछे थे।
दक्षिण अफ्रीका से भारत आते ही अपने गुरु गोखले जी (जिनका अगले तीन महीने बाद ही देहांत हो गया) के निर्देश पर गांधी ने कोई वास्तविक काम आरंभ करने से पूर्व अपनी राय कायम करने के लिए एक वर्ष तक देश का दौरा करने का संकल्प किया और देश के लोगों को जानने-पहचानने और तमाम तरह की संस्थाओं को समझने के लिए निकल पड़े थे। (किसी राजनीतिक मुद्दे पर आयोजित जुलूस, प्रदर्शन और सभाओं में शिरकत करने के दबाव और लोभ का संवरण करते उन्होंने चुपचाप और बिना किसी साथी-सहयोगी के – अक्सर कस्तूर और परिवार के अन्य सदस्यों को भी छोड़कर – देश का दौरा किया ; अधिकांशतः ट्रेन के तीसरे दर्जे में।)                
गांधी को भरोसा था कि वर्ष भर के दौरे के बाद उनको निश्चित रूप से मालूम हो जाएगा कि ऐसे प्रश्न कौन-कौन-से हैं जिन पर वे ध्यान दे सकेंगे। हां, अपने निरीक्षण-दौरे के एक साल के दौरान भी उन्होंने एक काम जारी रखा, जिसके बारे में Ÿश्री गोखले भी सहमत थे। वह था उस संस्था को जारी रखना,जिसे वे फीनिक्स आश्रम के नाम से पुकारते थे। वह नाम उन्होंने इसलिए दिया था €क्योंकि वे कुछ हद तक श्री कैलेनबैक के टॉल्स्टॉय फार्म में और नेटाल के उˆत्तरी तट पर स्थित एक छोटे-से स्थान फीनिक्स में सत्याग्रह के प्रयोग को ‘कार्य’ रूप में चलाते हुए छोड़कर आये थे। उस आश्रम में युवकों और स्त्रियों एवं बच्चों को,मातृभूमि की दीर्घकालीन सेवा के लिए शिक्षित किया जा रहा था। उस संस्था की यह विशेषता थी कि उसमें प्रत्येक व्यक्ति के लिए किसी-न-किसी प्रकार का शारीरिक श्रम करना आवश्यक था। और, चूंकि खेती का काम सर्वोत्तम शारीरिक श्रम माना जाता था,इसलिए प्रत्येक व्य€क्ति से दिन में कुछ समय तक खेत में काम करने की अपेक्षा की जाती थी। हाथ-करघे का उद्योग आरम्भ करने का भी विचार किया जा रहा था। उस संस्था में जो लोग थे वे भारत की मुख्य भाषाएं सीख रहे थे,ताकि वे देश लौट कर विभिन्न भागों में लोगों से बिनाकिसी कठिनाई के मिल-जुल सकें। आपसी बातचीत या प˜त्र व्यवहार में भी देशी भाषाओं का प्रयोग करने पर जोर था। दृढ़ प्रयास यह था कि जहां तक हो सके अंग्रेजी का प्रयोग सिर्फ अंग्रेजों से और उन लोगों से जो भारत की किसी भी मुख्य भाषा को नहीं समझते, व्यवहार करने के लिए ही किया जाए। गांधी को लगता था कि यदि वह प्रयोग सफल हुआ और काफी युवा आगे आएंगे तो देश जिन समस्याओं से दुविधा और चिंता में पड़ा हैं,उनमें से कितनी-ही अपने आप हल हो जाएंगी।
एक वर्ष के उस देश-निरीक्षण दौरे के भी एक साल बाद गांधी ने सार्वजानिक प्रयोग के लिए चंपारण को चुना, हालांकि उससे पहले यानी एक साल के भारत-भ्रमण के तत्काल बाद से ही उन्होंने गुजरात में साबरमती नदी के किनारे 'सत्याग्रह-आश्रम' स्थापित करने की तैयारी शुरू कर दी थी।
बहरहाल, तो क्या उस समय तक चंपारण के असहाय और अशिक्षित किसानों को यह अनुभव हो चुका था कि जो भी स्थापित राष्ट्री नेतृत्व उस समय था उनसे किसानों का ‘संवाद’ और समाधान सम्भव नहीं था? 
इतिहास के उपलब्ध तथ्यों से आज यह सहज अनुमान किया जा सकता है और जो लगभग सही भी माना जाएगा कि गांधी के आगमन के पूर्व देश के ज़्यादातर नेता न केवल शहरी लोग थे, बल्कि उनमें से ज़्यादातर लोगों की शिक्षा-दीक्षा भी विदेशों में हुई थी। अंग्रेजी और अंग्रेजियत की शिक्षा-दीक्षा से संपन्न ये लोग एक तरह से 'गुलाम लेकिन समृद्ध' भारतीय पृष्ठभूमि के लोगों का नेतृत्व कर रहे थे। अंग्रेज़ी शिक्षित उस भारतीय नेतृत्व में किसानों से जुड़ने की न इच्छा थी, न समझ और न ही क्षमता थी।लेकिन गांधी की शिक्षा-दीक्षा भी तो इंग्लैंड में हुई थी? उनको भी तो गाँव का कोई अनुभव नहीं था, खेती-किसानी से भी कोई सम्बंध नहीं था? यह जानते हुए भी चंपारण के किसानों ने अपनी समस्याओं के समाधान के लिए गांधी को चुना। तो इसके पीछे का मुख्य कारण या प्रेरणा क्या थी? क्या उस गांधी की छवि ‘प्रेरणा’ थी, जो एक वर्ष के निरीक्षण-काल और उसके बाद के एक साल में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित समाचार-विचार के रूप में प्रकट हुई थी?        
देश के इतिहास के जानकार और पढ़े-लिखे लोग कहते हैं कि गांधी की दक्षिण अफ़्रीका की लड़ाई ने चंपारण के किसानों में उम्मीद जगाई थी। आज ऐसा सोचना आसान है, यह सही भी हो सकता है, लेकिन सौ साल पहले, देश (जिसकी दो-तिहाई आबादी निरक्षर थी) में पत्र-पत्रिकाओं का सीमित प्रसार-प्रचार और गांवों तक उनकी पहुंच की सीमा के मद्देनजर चंपारण की निरक्षर ग्रामीण आबादी को दक्षिण अफ्रीका की ‘लड़ाई’ की सफलता-विफलता के बारे में कितनी जानकारी रही होगी? 
इतिहास के शोध-अध्ययन में सक्रिय मित्र मानेंगे कि इस मामले में गांधी के आजाद देश की वर्तमान अपढ़ और पढ़ी-लिखी आबादी भी पर्याप्त जानकारी से वंचित है। अगर मान भी लिया जाए कि पीर मोहम्मद मूनिस और गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे पत्रकारों और उस समय के अखबारों के चलते दक्षिण अफ्रीका की लड़ाई की कुछ-न-कुछ जानकारी चंपारण तक पहुंची होगी, तो भी यह सवाल कायम रहता है कि दक्षिण अफ्रीका की लड़ाई के किस 'सत्य'ने – आदर्श, सिद्धांत, लक्ष्य, नीति-रणनीति, प्रक्रिया के सूत्र ने -चंपारण के किसानों में उम्मीद जगाई होगी और अपने नेतृत्व के लिए गांधी को चुनने के लिए प्रेरित किया होगा?  और, इससे जुड़ा और इससे बड़ा यह सवाल है कि गांधी ‘चंपारण’ गये क्यों? जबकि उन्हें मालूम ही न था कि चंपारण है कहाँ? तब क्या दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटकर और देश को जानने-पहचानने के लिए भ्रमण के बाद सार्वजानिक जीवन में सक्रिय होने संकल्प का चुपचाप अनुपालन करने के एक साल बाद चंपारण जाने के उनके निर्णय को महज एक राजनीतिक संयोग माना जाए? 
देश की वर्तमान सत्ता-राजनीति में नेतृत्व के लिए जारी होड़ एवं उठापटक का ऐतिहासिक विश्लेषण करने में माहिर माने जाने वाले कई विद्वान् चिंतक यह कहते हैं कि गांधी अभी-अभी भारत आए थे। उनके दक्षिण अफ़्रीकी प्रयोग से देश के कई लोग परिचित थे और कुछ लोग प्रभावित भी थे। लेकिन इतने मात्र से भारत के प्रभावशाली नेता बंग-भंग के बाद राष्ट्रीय स्तर पर जारी ‘स्वराज्य’ (डोमीनियन स्टेट) आंदोलन का कमान गांधी को सौंप देते, यह मानना उचित नहीं जान पड़ता। सो ग़ाँधी ने नेतृत्व की दावेदारी के लिए भारत में कुछ करना ज़रूरी माना होगा, जिससे उनकी क्षमता और सूझ-बुझ पर लोगों का विश्वास जम सके। वैसे, अपने भारत-भ्रमण के दौरान गाँधी को यह बात समझ में आ गयी होगी कि किसानों को आंदोलन में शामिल किये बिना अंग्रेज़ों को स्वराज्य के लिए मनाना या झुकाना सम्भव नहीं होगा। चंपारण ने उन्हें अच्छा मौक़ा दिया किसानों को समझने और आगे की दिशा तय करने का।
लेकिन भारत-भ्रमण के बाद की गांधी की एक साल की गतिविधियां क्या इस बात का संकेत देती हैं कि चंपारण जाने का उनका निर्णय राष्ट्रीय राजनीति के नेतृत्व में दावेदारी की उनकी इच्छा या कोशिश का प्रमाण था? या कि जनता में विश्वास जमाने की किसी रणनीति – आजकल जिसे 'हिडेन एजेंडा' कहा जाता है - के तहत उन्होंने चंपारण जाने का फैसला किया? वे गतिविधयां तो यह संकेत भी नहीं देतीं कि चंपारण जाने का उनका निर्णय उस समय की तात्कालिक सामाजिक-राजनीतिक परिस्थियों के दबाव या खिंचाव का नतीजा था!तब? उस निर्णय का आधारभूत कारण क्या था? 
हां, उस दौरान गांधी ने जो कुछ कहा या लिखा, उससे उनके इस ‘माइंड-सेट’ का पता मिलता है, जो उनके राजनीतिक सोच या कहें चिंतन की दृष्टि-दिशा अन्य तत्कालीन राजनेताओं से सर्वथा अलग होने को कुछ झिझक के साथ लेकिन बेहिचक स्वीकार करता था। भारत-भरण के बाद गांधी ने जो कुछ कहा या लिखा उसका मूल आशय यह था कि देश के आम और अंतिम आदमी को संगठित और सहभागी बनाकर ही देश के मुक्ति का कोई भी मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है।
तो उस वक्त गांधी की नजर में देश का अंतिम आदमी कौन था? अंतिम आदमी की उनकी परिभाषा क्या थी? उसे संगठित और सहभागी बनाने का सैद्धांतिक आधार और व्याहारिक प्रक्रिया के प्रति उनकी सोच और समझ क्या थी? इस मायने में गांधी उस समय के राजनीतिक संघर्ष के लक्ष्य और उसके लिए सर्वमान्य नेतृत्व के सोच-समझ के कितने करीब और कितने दूर थे? कितने सहमत या असहमत थे?
हम कहाँ-कहाँ से गुजर गये! – [18] 
जनवरी, 2018 
इसलिए चम्पारण को चुना! 
1917 में 'चंपारण' जाने का गांधी का निर्णय क्या राष्ट्रीय राजनीति के नेतृत्व में दावेदारी की उनकी इच्छा या कोशिश का प्रमाण था?
गांधी के नीति-सिद्धांतों के विरोधी और संघर्ष की रणनीति के आलोचक आज भी अपनी इस धारणा को धार देते नजर आते हैं कि गांधी ने राष्ट्रीय स्तर पर अपने नेतृत्व की दावेदारी पेश करने के लिए ‘चंपारण’ को चुना'! अगर वे ईमानदारी और साहस के साथ तैयार हों, तो उनकी इस धारणा का क्या आधार है, यह 'विचारणीय' मुद्दा हो सकता है। और, यह 'बहस' देश की वर्तमान राजनीति के लिए फलदायक भी सिद्ध हो सकती है।
उक्त आलोचक कम से कम इतना तो स्वीकार करेंगे कि चंपारण के अपने प्रयोग के तहत गांधी ने खुले में जन-सुनवाई की, बयानदर्ज करवाने के उपाय आजमाए, भुक्तभोगी किसान समाज को निर्भय और मुखर बनने के लिए प्रेरित किया और ‘जिसका संघर्ष उसीका नेतृत्व’ जैसी अवधारणा के बीज रोपने की कोशिश की।साथ ही उस वक्त सत्ता-राजनीति के प्रचलित खेल में अपनी दावेदारी के लिए पैसा और पसीना बहाते नेताओं को ‘सामान्य कार्यकर्ता और स्वयंसेवक’ की कतार में लगने को मजबूर किया।उन्हें ऊपर से नीचे देखने की 'दाता-दृष्टि' की बजाय ‘नीचे से ऊपर देखने’ की राजनीतिक दृष्टि विकसित करने का रास्ता सुझाया।
इतिहास साक्षी है कि यह एक साल बाद ही, यानी 1918 में गांधी के चंपारण से खेडा कूच करने के बाद ही,  स्पष्ट हो गया कि 'स्वराज्य' के लिए जारी राजनीतिक संघर्ष में शामिल नेताओं को ‘नीचे से ऊपर देखने-सोचने’ की गांधी की राजनीतिक दृष्टि रास नहीं आयी। जब तक गांधी चंपारण में रहे, कुछ नेता गांधी मिशन के लिए गठित कार्यकर्ता मंडली में रहे और पटना-रांची करते रहे, लेकिन लड़ने के गांधी के तरीके – गांव की गरीब निरक्षर आबादी के लिए विद्यालय बनाना, गांव-घर की सामूहिक सफ़ाई करना, स्वास्थ्य की देख-भाल करना, आदि-आदि कार्य – में शामिल नहीं हुए। क्योंकि उन्हें शायद इन उपायों या तरीकों का 'स्वराज्य' हासिल करने के राष्ट्रीय आंदोलन से सीधा संबंध नजर नहीं आया होगा। आखिर वे ‘स्वराज्य’ हासिल करने का संघर्ष कर रहे हैं तो क्यों? इसलिए न कि उन्हें सत्ता की कुर्सी मिले? और वह भी किसलिए? जनता की सेवा के लिए! लेकिन सेवा की गांधी-राजनीति की रणनीति तो सत्ता हासिल किये बिना जनता की सेवा है!सत्ता हासिल किये बिना - शासन चलाने का अधिकार प्राप्त किये बिना जनता की सेवा? यह कैसे संभव है? इस ‘स्व-राज’ में वह ‘स्व-राज्य’ कहाँ है, जिसके लिए हम अंग्रेज हुकूमत से लड़ रहे हैं?
हमने चंपारण-सत्याग्रह शताब्दी वर्ष में पटना से करीब 300 किलोमीटर फासले पर स्थित चंपारण की  गांधी-रूट पर पुनार्यात्रा करते हुए कदम-कदम पर महसूस किया कि उपरोक्त ‘स्व-राज बनाम स्व-राज्य’ का सवाल आज भी ज़िंदा है और अनुत्तरित-सा वहीं पड़ा है, जहां तक लाकर गांधी 30 जनवरी, 1948 को छोड़ गए! और, यह सवाल सिर्फ चंपारण या सिर्फ बिहार-झारखंड का नहीं, बल्कि भारत के सभी प्रदेशों (जिनको हम ‘राज्य’ शब्द के द्वारा ही पहचान पाते हैं) का है – पूरे देश का है।
चंपारण में गांधी के जमाने में उनका साथ देनेवाले पूर्वजों के वंशज आज भी जब-तब सौ साल पहले की बातों को किस्से-कहानी के रूप में व्यक्त करते हैं। किस्से-कहानी के रूप में कहने का मतलब यह कि यह ऐसा इतिहास है जिसका वर्तमान जीवन से कोई ख़ास वास्ता नहीं रह गया है।वह इतिहास आज विचार के स्तर पर और व्यहहार के स्तर पर बरतने के लिए प्रासंगिक भी नहीं रह गया है। फिर भी उनके कहने का यह आशय निकलता है कि चंपारण आकर गांधीजी ने लड़ने के अपने तरीक़े को स्पष्ट तौर पर स्थापित किया। उनके सत्याग्रह का मूल मंत्र था अपने विरोधी को यह समझा देना कि उनका विरोध किसी व्यक्ति से नहीं, बल्कि उस सोच से है जिसका परिणाम है शोषण। यह कोई आसान काम नहीं था।
हमारे पुरखों ने गांधीजी के आगमन के पूर्व निलहों के खिलाफ हथियारी बगावत की थी। उस बगावत के परिणामस्वरूप अंग्रेजों को कई बार झुकना पड़ा ; नील के दाम में बढ़ोतरी करनी पड़ी। लेकिन तिनकठिया-प्रथा खत्म नहीं हुई। नील के दाम में बढ़ोतरी जैसी सफलता से तिनकठिया-प्रथा से मुक्ति का रास्ता नहीं खुला। उल्टे तात्कालिक सफलता ने मुक्ति के दीर्घकालिक रास्ते की तलाश की सोच को कुंद कर दिया – मुक्ति के वैकल्पिक विचारों को सर्वमान्य बनाने में चंपारण को असफलता मिली। 
गांधी ने लड़ाई का नया मंत्र दिया। चंपारण आकर गांधी ने घोषणा कर दी कि किसानों के संघर्ष में मानवीय मूल्यों की सर्वामन्यता को हथियार बनाया जाएगा। उन्होंने उस हथियार को गरीब और निहत्थों के हाथ में थमाने और चलाने के लिए तकनीक विकसित की, उसको खुद आजामाया। उन्होंने उस हथियार को हाथ में लेकर अंग्रेज-सत्ता को चुनौती दी, तो पहले कदम पर ही चंपारण के किसानों को औपनिवेशिक राज्य के डर से मुक्त होने का रास्ता मिल गया। और, यहीं से तिनकठिया प्रथा का खात्मा हुआ, जो अंग्रेजों की औपनिवेशिक सत्ता की हार के सिलसिले का पहला चरण था। 
तो क्या चंपारण-सत्याग्रह गांधी का वैचारिक प्रयोग था? क्या वह प्रयोग गांधी के किसी अलग या वैकल्पिक राजनीतिक दर्शन का संकेत करता है? क्या वह 'राज्य' और 'सरकार' से इतर समाज की स्वायत्ता का दर्शन है?
वर्तमान चंपारण इन सवालों का कोई जवाब देने में असमर्थ है, क्योंकि चम्पारण के लोगों को यह ज्ञात नहीं कि आजादी के बाद गांधी और उनके चंपारण-सत्याग्रह के स्मरण के किसी भी तरह के आयोजन-उत्सव के एजेंडे में ऐसा कोई सवाल विचारणीय बना अथवा नहीं।
वैसे, देश के कुछ राजनीतिक चिंतक देश-दुनिया में ग्लोबलाइजेशन के नाम पर पसरते याराना पूंजीवाद की प्रेत-छाया को साम्राज्यवादी संस्कृति के विस्तार के रूप में देखते हैं। इसलिए उन्हें अब यह ‘विचार’ विचारणीय लगने लगा है कि गांधी का सत्याग्रह, स्वराज, स्वाधीनता आदि से जुड़ा पूरा चिंतन और कर्म मूलतः पश्चिमी या कहें आधुनिक सभ्यता के विल्कप का विमर्श था, और चंपारण-सत्याग्रह उस विकल्प के लिए भारत में उनका किया पहला वैचारिक प्रयोग था। इसलिए वे चंपारण-सत्याग्रह को आज गांधी के वैकल्पिक सभ्यता के प्रयोग के रूप में देखने-परखने के हिमायती हैं।
आधुनिक शिक्षा, संपत्ति और राजनीतिक सत्ता से संपन्न कुछ विद्वान् अब चंपारण की अकादमिक यात्रा कर गांधी के व्यक्तिव-कृतित्व का पुनर्मूल्यांकन करने लगे हैं। वे कहते भी हैं कि “भारत आकर गांधी ने लगभग यह तय कर लिया था कि उनके लिए भारत का स्वतंत्रता आंदोलन एक तरह से पश्चिमी सभ्यता का एक विकल्प प्रस्तुत करने का मौक़ा है। यह विकल्प केवल एक राष्ट्र की स्वंत्रता केरूप में नहीं, बल्कि एक पूरी सभ्यता के रूप में प्रकट होना चाहिए। गांधी के लिए भारत की ग्रामीण सभ्यता में इस तरह के प्राकट्य की सम्भावनाएँ थी। गांधी जब गाँवों  की बात करते थे तो उसका अर्थ केवल शहर से दूर कोई जगह जहाँ खेती-किसानी की आर्थिक व्यवस्था थी ऐसा गाँव नहीं था, बल्कि एक पूरी सभ्यता थी; एक अलग तरह की जीवन प्रणाली, नैतिक मूल्य और सामाजिक व्यवस्था थी। गाँधी उसी की खोज में चंपारण गये थे।“
चंपारण-सत्याग्रह शताब्दी में इस तरह की व्याख्या और विमर्श को जरूरी मानने वाले लोगों को यह भी स्वीकार करना पडेगा कि एक सवाल जो भारत की आजादी के बाद एक अवसर के रूप में पैदा हुआ आज एक विकराल चुनौती बनकर खड़ा है। वह यह कि सौ साल बाद उस प्रयोग का क्या महत्व है? 
बिहार आन्दोलन-1974 में शामिल हमारे मित्र, जो देश भर में संघर्ष-रचना के विविध सामाजिक-राजनीतिक अभिक्रम एवं प्रयोगों में सक्रिय हैं, गांधी के चंपारण-प्रयोग को इसलिए महत्वपूर्ण मानाते हैं कि आज देश के किसान आत्महत्या कर रहे हैं।यह आत्महंता प्रवृत्ति कि किस राजनीतिक संस्कृति का प्रभाव है या किस सांस्कृतिक राजनीति का परिणाम है, यह समझने के लिए ‘चंपारण के गांधी’की नये सिरे से खोज करनी होगी और इसके लिए 'गांधी के चंपारण' की पुनर्यात्रा करनी होगी। एक बार नहीं, कई  बार। ख़ास-ख़ास तारीखों में उत्सव-आयोजन या ‘तवारीख़’ का वाचन-लेखन चंपारण पुनर्यात्रा का प्रतीकात्मक प्रमाण हो सकते हैं, 'तवारीख़' को बदलने के प्रयास के प्रतिमान नहीं।

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