हां, मैंने भी गांजा सेवन किया है

Approved by Srinivas on Tue, 09/15/2020 - 08:08

:: श्रीनिवास ::

और मेरे गांव (फुलवरिया) में भांग तो अपवादों को छोड़ कर हर वयस्क लेता था, साल में कम से कम एक दिन- होली के दिन- तो जरूर ही. कुछ उत्साही 'श्रद्धालु' उस दिन अपने बच्चोंं को भी देते थे. लड़कियों के लिए निषेध अवश्य था- यहां भी 'भेदभाव' की परंपरा कायम थी.

यह बात मैं बिना किसी दबाव या प्रलोभन या किसी ख़ास मंशा  के कह रहा हूं. और मुझे इसे लेकर कोई अपराध बोध या ग्लानि भी नहीं है. सच तो यह है कि मेरे  गांव/इलाके (भागलपुर) में गांजा या भांग का सेवन करना कोई घृणित काम है, यह भाव ही नहीं रहा, बल्कि इन्हें 'शंकर भगवान' का प्रसाद या 'बूटी' कहा और 'सात्विक' नशा माना जाता था. अब भी माना ही जाता होगा. बचपन से गेरुआ वस्त्रधारी 'साधुओं' को मंदिरों- यज्ञ समारोहों में चिलम (गांजा) फूंकते और हर किसी को उनके सामने श्रद्धापूर्वक झुकते देखता रहा हूं. इसलिए गांव में रहने के दौरान हमउम्रों के साथ, उनके आग्रह पर भंग सेवन करने में कभी बहुत हिचक नहीं हुई. कभी कभार गांजे का भी. लेकिन भयवश कभी इस कदर नहीं लिया कि होश खो बैठूं. सो, अफसोस कि 'पूरा आनंद' कभी नहीं ले सका!

(एक विनम्र आत्मस्वीकार; संदर्भ : मुंबई में गांजे पर मची हायतौबा और धड़ाधड़ गिरफ्तारी)

बेतिया (चंपारण) में भी, जहां मैंने लंबा अरसा गुजारा है, ताड़ी के प्रति कोई हेय भाव नहीं था. किसी को 'झूमते' देख यह पूछने पर कि 'पीये हैं क्या?', मासूम उत्तर मिलता- 'दारू ना, ताड़ी पीले बानी.'

भागलपुर शहर में तो अनेक जगहों पर भांग की गोली, दूध, बादाम के शर्बत या नारंगी के रस में मिला कर बिकती थी. खुलेआम. कोई छिपाव नहीं. बिहार के अन्य अनेक शहरों की भी यही स्थिति थी.  मिथिलांचल के एक पत्रकार मित्र ने बताया- ‘हमारे यहां तो भांग की डंडी से दतवन करते हैं और बारात में यह आवश्यक सामग्री की श्रेणी में होती है.’ 

और मेरे गांव (फुलवरिया) में भांग तो अपवादों को छोड़ कर हर वयस्क लेता था, साल में कम से कम एक दिन- होली के दिन- तो जरूर ही. कुछ उत्साही 'श्रद्धालु' उस दिन अपने बच्चोंं को भी देते थे. लड़कियों के लिए निषेध अवश्य था- यहां भी 'भेदभाव' की परंपरा कायम थी.

होली में गांव के अनेक 'केंद्रों' पर समारोहपूर्वक और 'शुद्धता' का खयाल रखते हुए भंग की घिसाई-पिसाई होती और फिर दूध बादाम आदि के साथ ठंडई तैयार होती. फिर बड़े छोटे एक दूसरे का लिहाज करते हुए नजर बचा कर 'प्रसाद' ग्रहण करते. उसके बाद ही होली गानेवालों की टोली निकलती, जो हर दरवाजे पर जाती. बीच में नशा कम होने पर खास लोगों के लिए अतिरिक्त डोज का भी इंतजाम रहता. कुछ के लिए गांजे का भी.

हमारे गांव में शिव मंदिर है, जहां हर धार्मिक पर्व/समारोह में (यदि उसके आयोजन का नेतृत्व युवाओं के हाथ हो) 'शिवलिंग' पर भंग का घोल 'अर्पित' किया जाता. फिर उसका सेवन. गांव के एक युवा ने इस विषय पर चर्चा के क्रम में बताया 'गांव के 80% पुरुषों के लिए यही सच है. उनमें से 10% उसमें डूब गये.  90% डुबकी लगा कर आगे निकल गये.'

(वैसे 1974, यानी आंदोलन में शामिल होने के बाद वह सब धीरे धीरे छूटता गया और फिर मेरे लिए इतिहास हो गया.)

वर्ष 1985 में राजीव गांधी सरकार द्वारा गांजा (मैरुआना) पर प्रतिबन्ध लगा दिये जाने से पहले तक गांजा और भांग का सेवन खुलेआम होता था, अब थोड़ा छिप कर होने लगा है. वैसे तो तीर्थ स्थलों पर, कुम्भ आदि मेलों में यह खुलेआम ही होता है. सावन में कांवर लेकर जो लोग बोल बम करते हुए सुल्तानगंज या भागलपुर से पैदल देवघर या बासुकीनाथ जाते हैं, उनका विशाल बहुमत भांग/गांजे से लैस रहता ही है.

आम धारणा है कि बिहार के इंजीनियरिंग कॉलेजों के कम से कम आधे विद्यार्थी गांजा पीते हैं. देश के अनेक उच्च, खास कर तकनीकी शिक्षा संस्थानों और उनके छात्रावासों में भी गांजे का सेवन  होता है. और प्रतिबंध के बावजूद देश के दो बड़े शहर दिल्ली और मुंबई गांजा की बिक्री और इसके सेवन के सबसे बड़े केंद्र बने हुए हैं.

मैं गांजा या भांग के पक्ष में कुछ नहीं कह रहा, न इन्हे निर्दोष बता रहा हूं. मगर तमाम सर्वे और विशेषज्ञ यह तो बताते ही हैं कि शराब की तुलना में गंजा मानव के लिए कम नुकसानदेह है. यह भी कि शराबखोरी के बाद आदमी में जो हिंसक प्रवृत्ति और आक्रामकता दिखती है, वैसा असर गांजा का नहीं होता. इसमें कुछ औषधीय गुण भी पाये जाते हैं. जानकार यह भी बताते हैं कि  जिन देशों में गांजे पर रोक नहीं है, वहां शराबखोरी तुलना में कुछ प्रतिशत कम होती है.

पता नहीं, मोदी जी को यह मालूम है या नहीं कि गांजा पर रोक एक 'ख़ास परिवार' के प्रधानमंत्री की सरकार ने लगाई थी. कोई याद दिला दे, तो...!

अंत में : आश्चर्य कि बिहार के एक उभरते हुए सिने कलाकार सुशांत सिंह  राजपूत की कथित आत्महत्या या हत्या पर मचे शोर और (संदिग्ध रूप से) राजनीतिक मकसद व एंगल से हो रही जांच के क्रम में, जाने अनजाने उसे 'गंजेड़ी' के रूप में और उसकी घोषित प्रेमिका रिया को ड्रग का धंधा करने वाली के रूप में प्रचारित और प्रताड़ित किये जाने पर बिहार व झारखंड के गांजा प्रेमी लोग, खास कर युवक एकदम चुप्पी साधे हुए हैं!

वैसे बिहार के एक गांजा प्रेमी का कहना है : गांजा को ड्रग्स कहना, उसके सेवन पर रोक लगाना, गांजा पीने वालों को अपराधी मान कर गिरफ्तार करना 'शैव दर्शन' और शिवभक्तों का अपमान है! उसने तो, मजाक में ही सही, यह नारा ही लगा दिया- गांजे का यह अपमान, नहीं सहेगा हिंदुस्तान..

About the Author

Srinivas

मूल रूप से समाजकर्मी, फिर पत्रकार रहे श्रीनिवास जी की सम-सामयिक मुद्दों में विशेष रुचि रही है। पत्रकारिता में आने से पहले वह 74' के बिहार (संयुक्त) आंदोलन और जेपी द्वारा गठित छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी में सक्रिय थे। पत्रकारिता के आरंभ से अंत तक रांची से प्रकाशित 'प्रभात खबर' की संपादकीय टीम में रहे। 1989 में हरिवंश जी संपादक बने तो संपादकीय पन्ने की जिम्मेवारी इन्हें मिली। सेवानिवृत्ति के बाद लेखन के साथ ही सामाजिक आयोजनों व गतिविधियों में शामिल रहते हैं।

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