कल पूरे देश के साथ मैंने भी बाबा साहेब डॉ भीमराव आंबेडकर के प्रति श्रद्धा व्यक्त की. मेरी श्रद्धा (इसे मैं ‘सम्मान’ कहना पसंद करता हूं) दिखावटी नहीं थी. मैं मानता हूं कि वह एक विलक्षण प्रतिभा के धनी, जिस पर देश और मानवता को गर्व करना चाहिए. जिन स्थितियों में और जिस समुदाय में उनका जन्म हुआ, उसे याद करें तो उनकी विद्वता ही नहीं, देश के लिए उनका योगदान भी अद्भुत जान पड़ता है. लेकिन भारत में वोट की राजनीति के कारण; और कुछ हमारे समाज के चरित्र के कारण जिस तरह उन्हें ‘भगवान’ बनाया जा रहा है, वह अतिरेक है. ऐसे में उनकी थोड़ी भी आलोचना से बहुतों की ‘आस्था’ को ठेस लग सकती है. फिर भी मैं विनम्रतापूर्वक कुछ असहमतियां दर्ज करना या शायद हिमाकत करना चाहता हूं.
अपने निधन के कुछ माह पहले उन्होंने हिंदू धर्म का त्याग करने की घोषणा की और बौद्ध धर्म अपना लिया। मगर उसके 5-6 वर्ष पूर्व ही भारत का जो संविधान बना, वे जिसकी प्रारूपण समिति के अध्यक्ष थे, उसमें ईसाइयों और मुसलमानों के अलावा भारत के सभी समुदायों को हिंदू मान लिया दिया गया! आज की सरकार भी यही मानती है- शायद गलत भी नहीं मानती- कि संविधान के मुताबिक आदिवासी और बौद्ध हिंदू ही हैं. तो आंबेडकर ने धर्मांतरण धन्मांतरण कैसे किया?
वैसे भी मेरी नजर में धर्मांतरण मनुष्य की मुक्ति मार्ग नहीं है, क्योंकि हर धर्म कम या अधिक अंधविश्वास पर आधारित है, स्त्री विरोधी भी.
डॉ आंबेडकर आजादी के आंदोलन में शामिल नहीं थे. उन्होंने खुल कर कहा कि जब तक भारत की समाज व्यवस्था नहीं बदलती, सामाजिक भेदभाव-उत्पीड़न खत्म नहीं होता, देश की राजनीतिक आजादी से वंचितों को कोई लाभ नहीं होगा, इसलिए हम उस लड़ाई में शामिल नहीं हैं. एक हद तक यह बात ठीक भी लगती है. आजादी के बाद भी भेदभाव जारी रहा, जारी है. मगर गांधी और नेहरू को छोड़िए, भगत सिंह, आजाद आदि को जरूरी क्यों नहीं लगा कि अंग्रेजों को भगाने के पहले भारत की समाज व्यवस्था को बदलने की लड़ाई लड़नी चाहिए? क्या उनको दलितों-वंचतों की चिंता नहीं थी?
आदिवासी समाज के बारे में उनकी समझ सीमित थी. ऐसा मानने का आधार है. उन्होंने देश की काल्पनिक नेशनल असेंबली के स्वरूप के लिए सुझाव दिया था कि उसमें सभी समुदायों का सीट रिजर्व होगा. वह बहुत तार्किक भी था, कि कोई धार्मिक समुदाय संख्या बल के आधार पर सत्ता पर नियंत्रण न कर ले. इसलिए हिंदू 70 या 80 प्रतिशत थे, तब भी उसे 40 फीसदी सीट ही दिया. हिंदुओं, दलितों, सिखों, मुसलमान, ईसाई सबके लिए रिजर्वेशन था, पर आदिवासियों को एक भी सीट नहीं दी. तर्क यह कि आदिवासी इतने नासमझ हैं कि दूसरे समुदाय के चालाक लोग उनको फुसला कर उनका इस्तेमाल कर लेंगे!
तुलना में बौद्ध धर्म मुझे भी कुछ ठीक लगता है, लेकिन वह भी आदर्श नहीं है. बौद्ध धर्म में बहुत सारी विकृति आ चुकी है. अंबेडकर के रहते आ चुकी थी. उन्होंने उन सारे अतार्किक व अंधविश्वासपूर्ण बातों को स्वीकार स्वीकार किया.
मेरी समझ से धर्मांतरण ही गैरजरूरी है/था. उनके साथ जो हजारों या लाखों दलित बौद्ध बने, उनमें से कितनों ने सोच समझ कर ऐसा किया? आंख मूंद कर अनुसरण. आज उनका आचरण कैसा है, यह भी देख्नने की जरूरत है.
वैसे कथित या घोषित अंबेडकरवादी आज राजनीतिक दृष्टि से ढुलमुल भी दिखते हैं. अनेक हिंदू राष्ट्र (जिसकी बुनियाद में ही धार्मिक संकीर्णता और उन्माद है) का झंडा ढोते भी दिख रहे हैं. इसके लिए आंबेडकर को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, तकरीबन सभी महापुरुषों के बहुतेरे शिष्यों की यही स्थिति है. फिर भी यह विडंबना तो है ही.
14 अप्रैल को अंबेडकर और राहुल सांकृत्यान पर रांची में हुए एक कार्यक्रम में शामिल हुआ था. वहां एक वक्ता ने कहा कि सिद्धार्थ गौतम के पहले 23 (या 24) ‘बुद्ध’ हो चुके थे, महावीर जैन के पहले 35 तीर्थंकर हो चुके थे. मेरे खयाल यह लगभग वैसा ही है, जैसे हिंदू ग्रंथों-पुराणों के किस्से हैं! अन्य धर्मों में भी होंगे. डॉ आंबेडकर इन बातों को स्वीकार करते थे.
बौद्ध संघ में बुद्ध ने बहुत मुश्किल से स्त्रियों को प्रवेश तो दिया, लेकिन वहां महिलाओं के साथ भेदभाव वाले नियम कानून बने हुए थे, बुद्ध ने ही बनाये थे.
बुद्ध मूर्ति पूजा के विरोधी थे, मगर आज दुनिया में शायद सबसे अधिक मूर्तियाँ बुद्ध की ही हैं!
आंबेडकर बुद्ध की शरण में गये; और उनकी भी मूर्तियां पूजी जा रही हैं! इसे मैं सकारात्मक नहीं मानता. मेरी समझ से धर्मांतरण ही गैरजरूरी है/था. उनके साथ जो बौद्ध बने, उनमें से कितनों ने सोच समझ कर ऐसा किया? मेरे ख्याल से आंख मूंद कर अनुसरण. यह ‘अंध श्रद्धा’ ही तो है!
इतना लिख लेने के बाद ख्याल आया कि इसमें पहले हुए ‘बुद्ध’ और तीर्थंकरों का उल्लेख गैरजरूरी तो नहीं? जो भी हो, पहले हो चुके ‘बुद्ध’ और तीर्थंकरों की बात मान लेने का एक अर्थ तो ‘अवतार’ की धारणा को मानना भी होगा; और इसे वैज्ञानिक दृष्टि से सही नहीं माना जा सकता!

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