Author: श्रीनिवास
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डॉ आंबेडकर से चंद असहमतियां
कल पूरे देश के साथ मैंने भी बाबा साहेब डॉ भीमराव आंबेडकर के प्रति श्रद्धा व्यक्त की. मेरी श्रद्धा (इसे मैं ‘सम्मान’ कहना पसंद करता हूं) दिखावटी नहीं थी. मैं मानता हूं कि वह एक विलक्षण प्रतिभा के धनी, जिस पर देश और मानवता को गर्व करना चाहिए. जिन स्थितियों में और जिस समुदाय में…
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असम चुनाव : कथित भाजपा विरोधी दलों को कांग्रेस से कुछ ज्यादा ही कष्ट है!
असम, केरल और पुददुचेरी में मतदान हो गया. सबसे ‘सुरक्षित’ भविष्यवाणी- ऊंट किस करवट बैठेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता! फिलहाल असम की बात. वहाँ के चुनावी परिदृश्य से तो ऐसा ही लगा कि कथित भाजपा विरोधी दलौं को कांग्रेस से कुछ ज्यादा ही कष्ट है. वैसे भी आमतौर पर भाजपा के विरोध में बोलते…
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कहानियों का वंश फलता-फूलता रहे! – पुस्तक समीक्षा
लेखिका (किरण जी) की रचना प्रक्रिया से एक हद तक जुड़ा रहा हूं- इस तरह कि आम तौर पर उनकी अमूमन कहानी छपने से पहले पढ़ने को मिल जाती है. पत्रकारिता से जुड़े रहने के कारण हिज्जे व व्याकरण दुरुस्त करना पेशे का हिस्सा रहा है, शायद इस कारण वह भरोसा भी करती हैं- धन्यवाद.…
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‘वंदे मातरम’ एक ‘हथियार’ भी है!
इनके पास धार्मिक/सांप्रदायिक गोलबंदी, या कहें, ‘हिंदुओं का खून खौलने’ के लिए मुद्दों और तरीकों की कमी नहीं है. ये इनका प्रयोग लागातर करते रहते हैं. अब एक ऐसा ही पुराना मुद्दा नये रूप में लाया गया है. ‘वंदे मातरम’ गीत के 150 वर्ष पूरे होने पर देशव्यापी समारोह! शायद याद हो, कुछ वर्ष पहले…
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अठारह महीने बनाम ग्यारह साल!
आधी सदी पहले देश पर थोपे गये आपातकाल पर विमर्श में यदि स्पष्ट विभाजन नजर आ रहा है, तो यह अकारण नहीं है! सत्ता पक्ष ने इस बार भी एक कर्मकांड की तरह इसका आयोजन ‘सविधान हत्या दिवस’ के रूप में किया. इंदिरा गांधी ने कैसे संविधान को स्थगित कर, लोकतंत्र को कुचल कर सारे…
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महज शादी के लिए धर्मांतरण, कोई शोर नहीं!
दो ‘हिंदुओं’ ने महज शादी के लिए इस्लाम ग्रहण कर लिया, मगर गुपचुप. समाज की नजरों में ‘हिंदू बने रहे. धर्मांतरण के विरोधियों और इसलाम से चिढ़ने वालों को कोई कष्ट नहीं हुआ! मामला धर्मेंद्र और हेमा मालिनी से जुड़ा है. ये किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. भारतीय हिंदी फिल्म जगत के बीते दिनों…
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ये ‘धर्म संसद’ क्या बला है?
ये ‘धर्म संसद’ क्या बला है?राहुल गांधी को हिंदू धर्म से बहिष्कृत करने की धमकी के मायने!खबरों के मुताबिक बीते नौ फरवरी को प्रयागराज महाकुम्भ में हुई ‘धर्म संसद’ में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष, राहुल गांधी के ‘मनुस्मृति’ से सम्बद्ध एक कथन को लेकर नाराजगी व्यक्त की गयी. बाद में बाकायदा प्रस्ताव पारित कर उनसे…
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दिल्ली के नतीजे उतने भी चौंकानेवाले नहीं हैं
दिल्ली विधानसभा चुनावों में भाजपा को मिली सफलता जितनी चौंकानेवाली लगती है, उतनी है नहीं. 2014 से केंद्र में अपराजेय भाजपा के रहते और मोदी-शाह जोड़ी की नाक के नीचे दिल्ली विधानसभा चुनावों में ‘आप’ को मिलती रही प्रचंड जीत- और भाजपा जिस अंतर से हारती रही- उससे कहीं अधिक चौंकानेवाली थी. इसे केजरीवाल की…
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एक साधारण, पर ‘असाधारण’ सरदार!
अभी अभी दिवंगत हुए डॉ मनमोहन सिंह पर कुछ लिखने की न मुझमें पात्रता है, न ही बहुत जरूरी लग रहा था. सबसे पहले तो यह स्वीकारोक्ति कि मुझे अर्थशास्त्र की बहुत समझ नहीं है; और मनमोहन सिंह की ख्याति अर्थशास्त्र के विद्वान के रूप में है. और वित्त मंत्री के रूप में देश में…
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संपूर्ण क्रांति : पचास साल का अधूरा सफर
वर्ष 1974 में गांधी मैदान (पटना) में लोकनायक जयप्रकाश नारायण द्वारा “संपूर्ण क्रांति’ के उद्घोष को पचास वर्ष पूरे हो रहे हैं. उस आंदोलन का मकसद समाज और व्यवस्था में आमूल बदलाव करना था. मगर अफसोस कि वह लक्ष्य अधूरा रह गया! लेकिन उसकी जरूरत और प्रासंगिकता बनी हुई है. इसलिए उस आंदोलन और उस…