केरल के बहाने ‘आलाकमान कल्चर’ की कुछ बात

दस दिन की जद्दोजहद के बाद अंततः केरल (अब केरलम) के मुख्यमंत्री का नाम तय हो गया- बीडी सतीशन! विरोधी तंज कर रहे हैं- कांग्रेस मुख्यमंत्री का नाम तय करने में हाँफ गयी, कि आलाकमान (इशारा राहुल गांधी की ओर ही है) की भद्द पिट गयी! यह भी कि राहुल गांधी अपने चहेते के वेणुगोपाल को मुख्यमंत्री नहीं बनवा सके. कि मुश्किल से एक राज्य में मिली जीत के बाद मुख्यमंत्री तय करने में 10 दिन लग गए और दावा है देश चलाने का! लेकिन सच यह है कि केरल की जीत अकेले कांग्रेस की जीत नहीं है. गठबंधन की जीत है. बेशक कांग्रेस बड़ा दल है, मुख्यमंत्री उसका ही होना था, पर काँग्रेस सहयोगी दलों की पूरी तरह से अपेक्षा करने की स्थिति में भी नहीं होगी. संभव है, यह काँग्रेस के अंदर की खेमेबाजी का परिणाम हो. इसे खड़गे या राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता की विफलता भी मान सकते हैं (वैसे क्या पता इसके पीछे खुद राहुल गांधी की कोई चाल रही हो), मगर यह राहुल गांधी की विवशता या काँग्रेस ‘आलाकमान’ के कमजोर होने का एक प्रमाण भी है, तो बुरा क्या है? इसे लोकतंत्र की मजबूती भी तो कह सकते हैं.
इस ‘आलाकमान कल्चर’ की शुरुआत बहुत बाद में हुई. आजादी के बाद कोई दो दशकों तक देश में कांग्रेस का लगभग एकछत्र राज रहा. नेहरू निर्विवाद नेता थे. बहुत ऊंचा कद. लेकिन तब राजनीति में कुछ मूल्य बचे हुए थे, काँग्रेस में लोकतंत्र बचा हुआ था. और सच यह भी है कि अनेक राज्यों में आजादी के आंदोलन से निकले कद्दावर नेता थे- विधानचंद्र राय, ‘बिहार केसरी’ श्रीकृष्ण सिंह, एसबी चह्वाण, श्यामा चरण शुक्ल, कामराज नाडार, गोविंद बल्लभ पंत व चंद्रभानु गुप्त आदि, जिन पर नेहरू अपनी मर्जी थोप नहीं सकते थे. वे एक सीमा से अधिक हस्तक्षेप नहीं करते थे या शायद नहीं करना चाहते थे.
इंदिरा गांधी के प्रादुर्भाव के बाद सारी चीज बदल गई- ‘आलाकमान कल्चर’ शब्द का चलन भी उसके बाद ही शुरू हुआ.
किसी को याद है कि पिछली बार कब किसी राज्य में मुख्यमंत्री का चयन बहुमत प्राप्त दल के विधायकों की बैठक में बाकायदा चुनाव से हुआ था? वर्ष 1990, बिहार, लालू प्रसाद. तब तक काँग्रेस के अलावा अन्य दलों में ‘आलाकमान संस्कृति’ पूरी तरह स्थापित नहीं हुई थी.
कायदे से, संविधान के मुताबिक विधानसभा में बहुमत दल का नेता मुख्यमंत्री; और लोकसभा के बहुमत का नेता प्रधानमंत्री बनता है. उनका चयन क्रमशः विधायक और सांसद करते हैं. लेकिन यह सिर्फ कहने की बात रह गयी है. इंदिरा गांधी के निर्विवाद नेता बन जाने के बाद सब कुछ ‘दिल्ली’ से तय होने लगा. विधायक दल की बैठक होती थी, मगर पहले से तय नाम पर मुहर लगाने के लिए. बेशक केंद्रीय नेतृत्व भी विधायकों की पसंद की पूरी तरह अनदेखी नहीं करता होगा, मगर उसकी पसंद का ही बनता था. कांग्रेस में केंद्रीय नेतृत्व मतलब इंदिरा गांधी.
धीरे-धीरे सभी पार्टियों ने इस ‘कल्चर’ को अपना लिया. ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ बनाने की बात करने वाली भाजपा ने भी कांग्रेस की सारी ‘बुरी’ चीजों-परंपराओं के साथ इसे भी अपना लिया. हाँ, तब भाजपा, उसके पहले जंसघ में भी आलाकमान का मतलब कोई एक नेता नहीं होता था, अब वह अंतर भी नहीं रहा.
फिर 1990 की बात- बिहार में जनता दल को बहुमत मिला था. विधायक खेमों में बंटे हुए थे. एक दावेदार लालू प्रसाद थे. देवीलाल और समाजवादी खेमे की पसंद. मगर प्रधाममंत्री वीपी सिंह चूंकि देवीलाल को पसंद नहीं करते थे, तो उनकी पसंद रामसुंदर दास थे. श्री दास का पलड़ा भारी लग रहा था, मगर वीपी सिंह को नापसंद करने वाले चंद्रशेखर नहीं चाहते थे कि वीपी की पसंद का कोई मुख्यमंत्री बने. तो एक तीसरा प्रत्याशी मैदान में आ गया! इस झगड़े का लाभ लालू प्रसाद को मिल गया और विधायक दल के नेता निर्वाचित हुए और मुख्यमंत्री बन गये! इत्तेफाक से बना ऐसा मुख्यमंत्री, जो गलत सही- अपनी छाप छोड़ गया, जिसने बिहार की राजनीति में एक लंबी पारी राजनीति में खेली. एक हद सामाजिक समीकरण और सामाजिक बदलाव के प्रेरक बने, और इसी कारण समाज के एक हिसई हिस्से के लिए खलनायक! फिर अपनी गलतियों की सजा भी भोगी, बहुतों को निराश भी किया. अपनी निरक्षर पत्नी, जो विधायक भी नहीं थीं, को मुख्यमंत्री बना दिया. 2020 में जदयू के साथ गठबंधन की सरकार बनी तो दोनों बेटों को उपमुख्यमंत्री बनवा दिया. यह परिवारवाद का बहुत कुरूप उआदहरण था.
लेकिन आज कोई पार्टी इन बीमारियों से अछूती नहीं है. लालू प्रसाद के कथित ‘जंगल राज’ और परिवारवाद का विरोध करते हुए उनसे अलग होकर ‘सुशासन बाबू’ का खिताब हासिल करने वाले नीतीश कुमार ने भी आखिर अपने पुत्र को मंत्री पद पर बिठा दिया!.
साम्यवादी दलों को छोड़ दें तो आलाकमान कल्चर हर पार्टी में है. कुछ दल तो व्यक्ति-केंद्रित ही हैं. कथित लोकतान्त्रिक दलों में विधायक दल के नेता का चयन होने के पहले पर्यवेक्षक जाता है. विधायकों से मिलता है, आलाकमान को रिपोर्ट करता है. फिर खबर आती- आलाकमान तय करेगा! अब तो मोदी जी (जैसे जादूगर टोपी से जमूरा या कबूतर निकालता है) मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा कर देते हैं! मोदी पर मुग्ध मीडिया इसे मोदी जी का ‘मास्टर स्ट्रोक’ बताता है!
अगर नियम कहता है कि विधायक अपना नेता चुनेंगे, तो चुनाव से पहले से ‘मुख्यमंत्री का चेहरा’ घोषित करना अलोकतांत्रिक नहीं है? आप पहले से मुख्यमंत्री का नाम घोषित कर को विधायक चुन कर आएंगे, उनसे अपना नेता चुनने का अधिकार छीन लिया! इसलिए यह ‘आलाकमान कल्चर’ लोकतंत्र के विरुद्ध है. इसे खत्म होना चाहिए. यह तभी होगा, जब राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र मजबूत होगा.
इसकी बात सभी करते हैं, लेकिन फिलहाल इसकी संभावना नहीं दिखती. कभी कभी तो लगता है, हमने एक शासन प्रणाली के तौर पर लोकतंत्र को अपना तो लिए, पर आत्मसात नहीं कर पाये हैं. हमें हनेशा एक नायक चाहिए, हम व्यक्ति पूजक समाज हैं! अंदर से अलोकतांत्रिक हैं!
ऐसे में केरल में यदि कांग्रेस आलाकमान या राहुल गांधी की भद्द पिटी है, तो मेरी समझ से यह स्वागतयोग्य है!


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