मातृ-दिवस : मातृत्व का अतिशय महिममंडन

आज अखबारों में, सोशल मीडिया पर ‘मां’ छायी हुई है, ‘खास’ और आम लोग अपनी-अपनी ‘मां’ के बारे में बता रहे हैं. मांएं भी मातृत्व के अद्भुत सुख के अनुभव बता रही हैं. पर मुझे इसमें एक पाखंड नजर आता है. यह भी कि ‘मां’ और मातृत्व का हमेशा से कुछ ज्यादा ही महिमा मंडन किया जाता रहा है.
यदि हम सचमुच मातृत्व का सम्मान करते हैं, तो वही सम्मान स्त्री मात्र के लिए दिखना चाहिए. मगर अफसोस कि हमारे दैनंदिन आचरण में वह दिखता नहीं है.
सच यह है कि स्त्री मेन हर वह गुण और अवगुण हो सकता है, जो किसी पुरुष में होता है. एक स्त्री (मां) देवी समान, प्रेम से लबरेज हो सकती है, तो वह क्रूर भी हो सकती है. मौका मिलने पर रिश्वतखोर हो सकती है. चोर-डाकू हो सकती है. तानाशाह हो सकती है. वह हर तरह के अपराध कर सकती है, आतंकवादी हो सकती है. जातिवादी हो सकती है. सांप्रदायिक नफरत से भरी हो सकती है. ऐसी महिलाएं हर समाज में होती हैं! प्राचीन ग्रंथों में ‘राक्षसी’ और ‘दानवी’ का वर्णन मिलता ही है.

‘मां’ और मातृत्व के इस महिममंडन का एक अर्थ यह भी है कि हम वैसी स्त्रियों को, जो ‘स्वेच्छा’ से या शारीरिक अक्षमता के कारण मां नहीं बनी, को कमतर मान लेते हैं! ‘बांझ’ शब्द को गाली बना दिया गया है!
मातृत्व का सम्मान करते हुए हर मां/स्त्री पर एक अतिरिक्त बोझ लाद दिया गया है. उसे देवी का दर्जा दे दिया जाता है. मां होने के कर्तव्य की याद दिला कर, उसे त्याग की मूर्ति, निस्वार्थ, संतान के लिए सब कुछ लुटा देने वाली बात कर उससे सहज मानव होने के अधिकार से वंचित कर दिया जाता है.
मातृत्व, यानी प्रजनन एक सहज जैविक क्रिया. सृष्टि की निरंतरता के लिए प्रकृति का नियोजन और अपरिहार्य क्रिया. बेशक इस क्रिया में स्त्री को दुरूह शारीरिक कष्ट झेलना पड़ता है, मगर पुरुषों ने गर्भावस्था, प्रजनन के दौरान और उसके बाद उसकी शारीरिक कमजोरी और पर-निर्भरता का लाभ उठा कर उसे एक तरह से अपने अधीन कर लिए, उसे ‘दासी’ बना दिया.
अपनी मां के साथ एक सीमा तक तो लगाव सभी प्राणियों में होता ही है- जब तक बच्चा उस पर निर्भर है, उसका दूध पीता है जब उसे संरक्षण की जरूरत होती है. उसके बाद जैसे पशुओं में होता है, स्वाभाविक रूप से वह स्वतंत्र हो जाता है. मानव समाज की स्थिति तजोड़ी भिन्न है. वैसे यहां भी अमूमन मां से रिश्ता स्वार्थ का ही है. वह केयर करना बंद कर दे, अपनी चिंता करने लगे, फिर कोई लगाव नहीं.
सच यही है कि समाज की नजर में वही स्त्री और मां महान है, जो पुत्र को जन्म देती है! स्त्री को ‘पुत्रवती भव’ का आशीर्वाद दिया जाता है. लड़की को जन्म देने वाली मां उपेक्षित होती है. लगभग पूरी दुनिया में और भारत (हिंदू समाज) में विशेष पत्नी/स्त्री का कर्तव्य ‘वंश’ वृद्धि के लिए पुत्र को जन्म देना है. यूरोप के जिन (ईसाई) देशों में बहुविवाह (जाहीर है, पुरुषों के) पर रोक है, उनमें से भी कुछ देशों में यह कानून भी है (संभवतः गोवा में भी) कि यदि कोई स्त्री पुरुष संतान को जन्म नहीं देती है, तो उसका पति दूसरी शादी कर सकता है. यह है स्त्री के सम्मान की हकीकत!

अपनी मां का सम्मान तो फिर भी करते हैं, मगर सच यह है कि दूसरों की माओं के प्रति रत्ती भर सम्मान नहीं है. दूसरे की मां-बहन से तो हम (खयालों में) ‘रिश्ता’ बनाने का कुत्सित आनंद लेते हैं, अधिकतर्व गालियों मेन निशाने पर स्त्री ही होती है! मगर ‘महिला मात्र’ का सम्मान का दिखावा करने में कोताही कोई कोताही नहीं! इसीलिए प्रतीकात्मक रूप से बर्ष के एक दिन मां और मातृवत का यह महिमा मंडन अतिशयोक्तिपूर्ण लगता है.

पुनश्च : एक ओर मातृत्व का सम्मान; दूसरी ओर ब्रह्मचर्य (पुरुष के) का महिममंडन- इसमें भी मुझे विरोधाभास है और पाखंड दिखता है. यदि मां बनना इतना महत्वपूर्ण है, तो पिता बनना क्यों नहीं? इसलिए भी कि मेरी जानकारी में, स्त्री के लिए ब्रह्मचर्य का प्रावधान नहीं है.

प्रसंगवश, मैं भी अपनी मां को शिद्दत से याद करता हूं, बस. बहुत स्नेहिल थी, लेकिन उसमें भी कुछ संस्कारगत कमियाँ थीं. वह भी अपने पति (मेरे पिता) को परमेश्वर मानती थी. जन्मना जातीय श्रेष्ठता का भाव तो था ही. एक समय के बाद मुझे यह सब अच्छा नहीं लगने लगा.