महिलाओं को भी किसान मानने का ऐतिहासिक बिल

भारत में महिलाएं खेतों में कई तरह के काम करती दिखती है. जैसे बीज बोना, रोपाई करना, फसल काटना और उसकी निराई करना आदि. लेकिन उस खेत पर उनका स्वामित्व होता है, न उसके संबंध में वे कोई निर्णय ले सकती हैं. अपने खेतों में काम करना हो या दूसरों के खेतों में, वे निरंतर पुरुष के सहायक के रूप में काम करती रहती हैं. उसके साथ अभद्र व्यवहार होता है और शोषण भी होता है.
महाराष्ट्रके यवतमाल जिले की एक महिला की कहानी खबरों में आती है, जिसका पति 2016 में भारी कर्ज के बोझ से घबराकर आत्महत्या कर लेता है. उसकी पत्नी उषा कुटे को पति के आधे एकड जमीन के लिए अपने ससुर से लड कर जमीन पर अधिकार प्राप्त करना पडा, क्योंकि पति की मृत्यु के बाद खेत पर उसके ससुर का अधिकार हो गया था. खेत में न पानी था न बिजली. कई सालों बाद बहुत प्रयास के बाद वह एक कुआं खुदवाने में सफल होती है. उसके बाद उसके खेत में बंपर पैदावार होती है, लिकिन अपने बेटे की फीस देने के लिए उसे उस रुई की पैदावार को कम दाम में बेचना पडता है. बाद के वर्षों में लगातार पैदावार में वृद्धि होती गयी और उसकी स्थिति सुधरती गयी.
अनगिनत महिलाएं जो बिना किसी स्वामित्व या अधिकारों के खेतों में काम कर रही है सबके साथ इस तरह का चमात्कार नहीं होता है. उषा की कहानी तो एक अपवाद हैं. ज्यादातर महिलाएं अपने को खतरों में डाल कर, निरादर और कर्ज में डूबे जीवन को खेतों में खपा देती हैं.
गांवों में काम के कम अवसर होने के कारण और खेतों में फसल कम होने व बढ़ते कर्ज के बोझ को कम करने के लिए पुरुष अकसर काम की खोज में शहर चले जाते हैं. गांवों में रह गई महिलाएं घर की तथा बच्चा की देखभाल के साथ खेतों में काम भी करती हैं और घर की जरूरतों को पूरा करती हैं. 2024 में कृषि श्रम के सर्वे के दौरान ये आंकडे सामने आये हैं कि 77 फीसदी ग्रामीण महिलाएं कृषि कार्य में लगी है. उनमें से 75. 5 फीसदी स्वैच्छिक रूप से इस कार्य में लगी हैं. यानी ऐसी महिलाएं खेतों मे बिना किसी मजदूरी के काम करती हैं जो उनकी अपनी जमीन होती है और ऐसी जमीन  केवल 13 फीसदी है. महाराष्ट्रा में 88.45 फीसदी महिलाएं कृषि कार्य में लगी है. इनमें से 90 फीसदी के पास अपनी जमीन नहीं है. महिलाएं फसल उगाती हैं और स्वामित्व पुरुष का होता है.
कृषिकार्य में लगी महिलाओं की अनेक समस्यायें हैं, लेकिन मुख्य समस्या तो यह है कि सरकार उनको किसान का दर्जा नहीं देती है. इसके कारण महिलाओं को कृषि कर्ज नहीं मिलता है. फसल की बरबादी पर सरकारी  मुआवजे की रकम भी उन्हें नहीं मिलती बल्कि जमीन के मालिक को मिलती है. कृषि बीमा भी किसी गारंटी पर ही मिलती है.
महिला किसान अधिकार मंच के अनुसार जो सचमुच कृषि कार्य में अपना श्रम लगा रही हैं, वे ही महिलाएं कृषि से संबंधित सरकारी योजनाओं को पाने की हकदार नहीं होती हैं, क्यों कि जमीन का स्वामित्व उनके पास नहीं है.
कृषि श्रम में लगी महिलाओं को किसान के रूप में पहचान मिले, इसके लिए सबसे पहले भारत के हरित क्रांति के जनक एमएस विश्वनाथन ने आवाज उठाई थी. उन्होंने इस बिल को संसद के पटल पर एक स्वतंत्र सदस्य के रूप में रखा भी था. लेकिन इस पर वोट होने से पहले ही यह समाप्त हो गया.
अब 14 वर्ष के बाद महराष्ट्र की सरकार ने महिलाओं को किसान का दर्जा देते हुए एक बिल को पास कर इतिहास की उस भूल को सुधारा है. महराष्ट्र भारत का पहला राज्य बन गया जो महिलाओं को किसान माना. इसमें उन महिलाओं को भी शामिल करने की सिफारिश की गयी, जो मधुमक्खी पालन, मछली पालन, पशुपालन, और वन उत्पाद को इकठ्ठा करने में लगी हुई है, इनको भी सरकारी कर्ज, बीमा और सामाजिक सुरक्षा जैसे लाभ मिलेंगे..
इत्तेफ़ाक से इस बिल को पास करने के पूर्व स्वामीनाथन की बेटी सौम्या स्वामीनाथन से सलाह ली गयी जो स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन की प्रमुख हैं. उन्होंने इस बिल को महिला की गरिमा और शक्ति को बढ़ाने वाला बताया और यह बिल महिलाओं को सरकारी योजनाओं को प्राप्त करने में सक्षम करेगा. इस बिल में महिला किसान अधिकार मंच से भी सलाह की गई.
यद्यपि महाराष्ट्र का यह बिल महिलाओं को कुछ मामलों में सक्षम तो बना रहा है, लेकिन पितृसत्तात्मक समाज में जमीन का मालिक महिलाओं को नहीं बना पाया. फिर भी महाराष्ट्र सरकार का यह बिल ऐतिहासिक है. स्त्री पुरुष समानता की ओर एक कदम आगे बाढ़ाता है.


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