हिंदुओं की आस्था के अनुसार रामकथा त्रेता युग की है। प्रचलित कथाओं (बाल्मीकि की रामायण और तुलसीदास रचित ‘रामचरित मानस’) में ‘अयोध्या कांड’ में राम के जन्म से लेकर युवा होने तक की कथा है. वह कथा सर्वविदित है. यहाँ बात बीसवीं और 21 वीं सदी में हुए ‘अयोध्या कांड’ की हो रही है! उसके भी विस्तार में न 2019 और उसके बाद की बात करते हैं, जब सुप्रीम कोर्ट के फैसले की बाद ‘वहीं’ (क्योंकि हिंदुओं के स्वयंभू प्रतिनिधियों का मानना था कि राम का जन्म ‘वहीं’ पर हुआ था- जाहिर है, इसके लिए किसी तर्क या प्रमाण की जरूरत नहीं है- ‘हम मानते हैं और यह आस्था का मामला है, तो सबों को मानना ही होगा!’) राम मंदिर के निर्माण मार्ग प्रशस्त हुआ, हालांकि पप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिना हिचक इसका श्रेय ले लिया! मंदिर बना, मोदी जी ‘राम को लेकर आये’, भव्य उद्घाटन हुआ! मगर अदालती प्रक्रिया और उसके बाद की जो बातें याद रखने लायक हैं, संक्षेप में-
*सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2019 के अपने विचित्र किंतु सत्य टाइप ‘ऐतिहासिक’ फैसले में माना कि-
*21-22 दिसंबर, 1949 की आधी रात में बाबरी मसजिद के अंदर चोरी चुपके ‘रामलला’ की मूर्ति रखना आपराधिक कृत्य था!
*बाबरी मसजिद किसी मंदिर को तोड़ कर बनायी गयी थी, इसका कोई प्रमाण नहीं मिला!
छह दिसंबर 1992 को बाबारी मसजिद को तोड़ना आपराधिक कृत्य था!
*{हालांकि उन आपराधिक कृत्य में शामिल लोगों की पहचान नहीं हो सकी (अदालत ने पुलिस को ऐसा करने का निर्देश भी नहीं दिया); इसलिए किसी ‘अपराधी’ को सजा नहीं दी सकी!}
*साथ ही हिंदू पक्ष को ‘वहीं’ पर मंदिर निर्माण की अनुमति दे दी.
*साथ ही एक धर्मनिरपेक्ष देश की सरकार को मंदिर निर्माण के लिए समिति गठित करने का अधिकार भी दे दिया!
*साथ ही ‘उस’ स्थान से कुछ दूरी पर मसजिद बनाने के लिए मुसलिम पक्ष को भी जमीन आवंटित करने का आदेश दिया!
अब यदि मसजिद का निर्माण ही अवैध था, जै/सा कि सस्वघोषित हिंदू हितैषी दावा करते रहे हैं, और उससे पांच सौ वर्षों तक हिंदुओं की आस्था आहत होती रही, तो मसजिद के लिए जमीन देने का मतलब?
सवाल है कि वह न्यायिक फैसला था या पंचायती- दे दिला कर मामला निबटा दिया! फैसला सबूतों की बिना पर और संविधान के। आधार पर लिया गया या बहुसंखयकों की आस्था के आधार पर?
प्रसंगवश, श्री चंद्रचूड़ (जो वह फैसला सुनाने वाली पांच सदस्यीय पीठ में शामिल थे, और जो बाद में मुख्य न्यायाधीश भी बने) से एक इंटरव्यू (scroll या newslaundry, पत्रकार श्रीनिवासन जैन) के दौरान जब उनसे मस्जिद के भीतर मूर्तियां रखने (अपवित्रीकरण) को लेकर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने कहा था, ‘मस्जिद का निर्माण (आशय बाबरी मसजिद) ही बुनियादी रूप से एक अपवित्र कार्य (Desecration) था.‘ एक जगह यह भी कहा था कि अयोध्या विवाद पर अंतिम फैसला लेने के पहले उन्होंने ‘ईश्वर’ से आशीर्वाद और दिशा निर्देश मांगा था.
उनसे भला और कैसे निर्णय की अपेक्षा की जा सकती है!
जो भी हो, इस ‘अयोध्या कांड’ का अब तक का हासिल यह है कि 1984 में लोकसभा की महज दो सीट जीतने वाली भाजपा धीरे धीरे आज ‘विपक्ष मुक्त’ भारत और ‘वन पार्टी रूल’ का सपना देखने की हैसियत में पहुँच चुकी है! बिना विधिवत निर्णय और घोषणा के ही व्यवहार में भारत को ‘हिंदू राष्ट्र’ बना दिया गया है, जहां धार्मिक अल्पसंख्यक दोयम दर्जे के नागरिक बनाये जा रहे हैं!
दूसरा हासिल यह कि अयोध्या में निर्मित भव्य मंदिर में डाका पड़ गया है; देश भर के आस्थावान हिंदुओं द्वारा दिये गये दान और चढ़ावे के करोड़ों रुपये की चोरी हो गयी है; सोने-चांदी के सामान गायब हैं! और आशंका यह जतायी जा रही है- अकारण नहीं- कि चोरों/डाकुओं का कुछ नहीं बिगड़ेगा! उलटे अब चोरी पर सवाल करने वालों की नीयत पर ही शंका की जाने लगी है, इस मुद्दे को उठाने को हिंदू धर्म और समाज को बदनाम करने की साजिश बताया जाने लगा है!
निश्चय ही भाजपा को इतनी ताकत ‘अयोध्या’ से निकली ऊर्जा से ही मिली है कि आज उसने अयोध्या और मंदिर को देश के कानून से परे और ऊपर पहुंचा दिया है!
इस जमात पर ‘श्रीराम’ की कृपा बरसी, इसे मानना तो (राम वास्तव में हुए थे या नहीं, इस बात से अलग) एक तरह यह मान लेना होगा कि अपने नाम और हिंदू/सनातन धर्म के बेजा इस्तेमाल से उनको कोई फर्क नहीं पड़ता; और यदि यह सच हो तो उनके ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ और सर्वशक्तिमान होने पर भी संदेह हो जाएगा! मगर इसमें कोई संदेह नहीं कि भाजपा/संघ ने ‘अयोध्या’ और ‘राम’ का बेहद कुशलता (या धूर्तता!) से इस्तेमाल और दोहन किया. विपक्षी दल अब तक इसकी कोई काट नहीं खोज सके हैं!
इति!

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