हमारा समाज अभी भी जातियों एवं धर्मों में बंटा है। हम भले ही बड़ी-बड़ी बातें कर लें, लेकिन ‘बेटी और रोटी’ अपनी जाति में ही सीमित रखना चाहते हैं। प्रेम उससे परे है। वह अमीरी- गरीबी, जाति- पाति नहीं देखता, नहीं मानता।
हर धर्म प्रेम का संदेश देता है। लेकिन अगर विवाह की बात आती है तो जातियां आड़े आ जाती है। उससे भी बढ़कर समाज डंडा लेकर खड़ा हो जाता है. सामाजिक वहिष्कार, फब्तियों का डर एवं इज्जत का हौवा इतना खतरनाक होता है कि माता-पिता अपने ही जने बच्चों के दुश्मन बन जाते हैं।
हमारा समाज अभी भी जातियों एवं धर्मों में बंटा है। हम भले ही बड़ी-बड़ी बातें कर लें, लेकिन ‘बेटी और रोटी’ अपनी जाति में ही सीमित रखना चाहते हैं। प्रेम उससे परे है। वह अमीरी- गरीबी, जाति- पाति नहीं देखता, नहीं मानता।हर धर्म प्रेम का संदेश देता है। लेकिन अगर विवाह की बात आती है…
रांची के 27 वर्षीय शिक्षिका ने पुलिस से कह दिया कि वह मायके नहीं जाएगी, तो अलवर की युवा जोड़ी ने कहा कि वे साथ रहेंगे, अपने परिवार के बीच नहीं जाएंगे। आजकल इस तरह की कई घटनाएं सामने आ रही है जहां लड़कियां अपने माता-पिता के घर नहीं लौटना चाहती। यह स्थिति अचंभित करने वाला एवं दुखदाई है, साथ ही यह टूटते, बदलते पारिवारिक ताने-बाने की ओर संकेत करते हैं। लड़कियां ससुराल और वहां के रिश्तेदारों से पहले ही भयभीत रहा करती है, अब उसे अपने माता-पिता एवं रिश्तेदारों से भी डर लगने लगा है। यहां तक कि (ऑनर कीलिंग के रूप में) जान पर खतरे की आशंका भी होने लगी है।
घटना रांची शहरी क्षेत्र की है।
पब्लिक स्कूल की शिक्षिका के पिता ने उसके प्रेमी पर अपनी बेटी के अपहरण एवं ‘लव- जिहाद’ की आशंका बताते हुए लोअर बाजार थाने में आवेदन दिया। उसके आधार पर पुलिस साकची (जमशेदपुर) गई। लड़की ने साफ कह दिया कि उसने अपनी मर्जी से विवाह किया है और वह उसके साथ रहना चाहती है। उसे अपने माता-पिता से ही जान का खतरा है। उसने यह भी कहा कि उन्होंने (माता-पिता ने) तेजाब फेंकने की धमकी दी है। पुलिस को वापस आना पड़ा।
एक उम्र के बाद (वयस्क होने के बाद) माता-पिता को अपने बच्चों के विवाह की चिंता होने लगती है। आमतौर पर यह जिम्मा माता-पिता या परिवार वालों का माना जाता है। इसलिए जब कोई अपनी पसंद से विवाह करना चाहती है तो उनके अहम पर कुठाराघात होता है। यह इज्जत का सवाल बन जाता है, मान- सम्मान की बात हो जाती है। आज वे बेटियों को पढ़ा लिखा रहे हैं, बाहर भेज रहे हैं, पर विवाह जैसे मामलों में अभी भी खूंटे से बंधे हैं। दोस्ती कर लो, पढ़ लिख लो, नौकरी भी करो, पर विवाह तो हम ही तय करेंगे। एक ओर आधुनिक कहलाने के लिए आजादी देंगे दूसरी ओर नकेल भी कसेंगे।
हमारा संविधान और कानून हमें समानता, स्वतंत्रता के साथ ही न्याय पाने का अधिकार देता है। पर हम सभी जानते हैं कि पुरुषसत्तात्मक सोच के कारण हम अधिकारों का उपयोग नहीं कर पाते। बात चाहे जातिगत, धार्मिक भेदभाव का हो या फिर स्त्री -पुरुष के भेदभाव का, हम समाज और परिवारों से कानून के पालन की मानसिकता, समझ नहीं बना पाए हैं। आए दिन ऑनर कीलिंग या लव जिहाद जैसी घटनाएं हमें यह सोचने को विवश करता है कि कानून बनाना एक बात है और उसे सामाजिक स्वीकृति देना एवं लागू करना अलग बात है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि बालिग नागरिकों को अपनी पसंद के धर्म का पालन करने एवं जीवन साथी चुनने का पूरा अधिकार है।
- कुमुद / संभवा इंजाेेर

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