इम्तियाज अली की यह चर्चित फिल्म मैंने देखी नहीं है, इसलिए यह फिल्म की समीक्षा नहीं है! पर फिल्म देख चुके शशिकांत जी द्वारा एक समूह पर पेश उनके अनुभव से मुझे विभाजन की त्रासदी पर आधारित कृष्ण चंदर का उपन्यास ‘गद्दार’ याद आ गया! खास कर इस अंश को पढ़ कर- ”…इस मूवी में दंगों के वीभत्सता को जस का तस दिखा दिया गया है. वीभत्सता का इस स्तर का दृश्यांकन इससे पहले ‘कश्मीर फाइल्स’ में दिखा था. लेकिन जहां ‘कश्मीर फाइल्स’ में वीभत्स दृश्यों का इस्तेमाल नफरत भड़काने के लिए किया गया था, वहीं इस मूवी में वीभत्स दृश्यों का इस्तेमाल दंगों की क्रूरता और हैवानियत को लोगों के दिलो- दिमाग तक पहुंचाने के लिए किया गया है. ये दृश्य दिमाग में ऐसे बैठते हैं कि आदमी सोचने पर मजबूर हो जाये कि दंगे को समाधान मानना कहीं बहुत बड़ी भूल तो नहीं!!“
इसी वर्ष मार्च में कृष्ण चंदर के स्मृति दिवस के मौके पर ‘गद्दार’ का एक अंश कोट करते हुए ”शायद हम भी ‘गद्दार’ हैं!“ शीर्षक से एक पीस लिखा था. कुछ मित्रों से शेयर भी किया था, आज उसका एक हिस्सा-
यह उपन्यास स्कूली दिनों में पढ़ा था, उसी स्मृति से कुछ लिखता हूं- उपन्यास का प्रारंभ विभाजन के समय सीमा के उस तरफ सिखों और हिंदुओं के साथ हो रही हिंसा और ज्यादती के भयावह विवरण से होता है. उपन्यास के नायक (एक हिंदू युवक) के परिवार के सारे लोग मारे गये हैं. जवान लड़कियों का अपहरण हो गया है. वह किसी तरह से जान बचा कर भागता है.
सीमा पर एक संकरा पुल है. दोनों तरफ लुटे- पिटे बदहाल शरणार्थियों की भरमार है. एक तरफ से मुसलमान जा रहे हैं. दूसरी तरफ से सिख और हिंदू आ रहे हैं. इतनी भीड़ कि पुल को दोनों तरफ के लिए एक-एक घंटे के लिए खोला जाता है. इस तरफ हिंदू और सिख गुंडों की हथियारबंद टोली हजारों मुसलमान शरणार्थियों के बीच ‘शिकार’ खोजती घूम रही है. वे जवान लड़की को उठा लेते हैं. सामान लूटते हैं, हत्या भी करते हैं. मुसलमानों के प्रति घृणा से भरा हुआ ‘कथा नायक’ भी उस टोली में शामिल हो जाता है. वह भी वही सब करने लगता है. लेकिन अचानक जब वह एक बुजुर्ग (मुसलमान) को भाला मारने के लिए हाथ उठाता है, तो बुजुर्ग के चेहरे में अपने चाचा का चेहरा दिखता है. वह ठिठक जाता है, भाला नहीं चला पाता. तब तक पीछे से झुंड का सरदार उसे धक्का मारता है, गाली देता है- गद्दार कहीं का. और वह उस बूढ़े मुसलमान को मार देता है. तभी उस लड़के को महसूस होता है कि ‘इधर’ और ‘उधर’ में कोई फर्क नहीं है. जो उधर के मुसलमान कर रहे थे, वही इधर के हिंदू और सिख कर रहे हैं..
तब तक पुल इस तरफ से जाने वालों के लिए खुल गया होता है और वह मुसलिम शरणार्थियों के साथ उस तरफ जाने वाली भीड़ में शामिल हो जाता है…
आज भी जो इस नृशंस उन्माद में शामिल नहीं है, वह अपने समुदाय के उन्मादियों की नजर में ‘गद्दार’ ही है! यदि मुझ जैसों को भी ‘गद्दार’ मान जाता हो, तो कोई अचरज नहीं; पर इसकी चिंता भी नहीं!

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