1947 में अंग्रेजों के सैकड़ों वर्षों की अधीनता के बाद हमारे देश को आजादी मिली। हमने अपने संविधान को अंगीकार किया और इस तरह हमारा देश 1950 के 26 जनवरी से गणतन्त्र देश बन गया। आजादी के बाद जवान हो चुकी नई पीढ़ी नए सपनों के लिये समर्थ हो रही थी। दुनिया भर में गूँजते समता, स्वतंत्रता के स्वरों की पहुँच दूरदराज के क्षेत्रों मंे भी हो रही थी। आजादी के आंदोलन का नेतृत्व भी ‘स्त्री के सम्मान’ को लेकर प्रतिबद्ध था। संविधान में सभी के लिये बराबरी, नागरिक स्वतंत्रता और मताधिकार का अधिकार है, यह बात मानी जा चुकी थी। शिक्षा के फैलाव ने स्त्री जागरण के लिये बहुत बड़ी भूमिका निभाई। परिणाम यह हुआ कि स्त्री के मानवाधिकार की बात मान्य होने लगी। जीवन, समाज, साहित्य और राजनीति के पटल पर स्त्री विचार जगह बनाने लगे। स्त्री के लिये निर्धारित पारंपरिक मापदंडों को चुनौतियाँ मिलने लगीं। बदलते परिवेश में स्त्री भी बदलने लगी। उसकी दुनिया बदलने लगी। उसके जीवन का दायरा भी बदलने लगा। लेकिन यह सच आंशिक था। सच से ज्यादा आभास था। जब सच सामने आता है तो पता चलता है कि आज भी स्त्री के प्रति भारतीय समाज की दृष्टि बहुत कम बदली है।
आज भी समाज में महिलाओं की स्थिति शक्तिहीन बनी हुई है। स्त्री को बताया गया है कि आपको आश्रित, बेजुबान, निर्भर बन कर रहना चाहिए, तब तो जीवन है। अगर सम्मान या स्वयं के अहसास के साथ जीना है तो चुनौतियाँ, परेशानियाँ और असमय मृत्यु भी हाथ आ सकती है।
अगर देश में महिलाओं के सम्मान और बराबरी के लिए किए गए संघर्ष को देखें तो दिखाता है कि 19वीं सदी के सुधारात्मक आन्दोलनों के फलस्वरूप स्त्रियों की स्थिति में काफी परिवर्तन हुए थे। इसी दौर में पंडिता रामाबाई, ताराबाई शिंदे, सावित्रीबाई फुले, फातिमा शेख जैसी महिलाओं का संघर्ष चला। सावित्री बाई फुले ने स्त्री शिक्षा, विधवा विवाह आदि कई महिला मुद्दों को लेकर समाज में फैली पितृ सत्ता के खिलाफ काम करना शुरू किया।
आधुनिक काल में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन सबसे पहला आंदोलन था, जिसने व्यापक स्तर पर स्त्री सहभाग एवं स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन लाने के कार्यक्रम का सूत्रपात किया। महात्मा गाँधी के आह्वान पर हजारों महिलाएँ मजदूर, श्रमिक और विद्यार्थी के रूप में आंदोलन से जुड़ीं। 1942 के अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में भी महिलाओं ने अपने – अपने क्षेत्र में पूरी योग्यता से आंदोलन का संचालन किया। आजादी की लड़ाई के हर मोर्चे पर अपनी सक्रिय भागीदारी से औरतों ने साबित किया कि राजनीति से उनका रिश्ता विलोम का नहीं है।
1947 में अंग्रेजों के सैकड़ों वर्षों की अधीनता के बाद हमारे देश को आजादी मिली। हमने अपने संविधान को अंगीकार किया और इस तरह हमारा देश 1950 के 26 जनवरी से गणतन्त्र देश बन गया। आजादी के बाद जवान हो चुकी नई पीढ़ी नए सपनों के लिये समर्थ हो रही थी। दुनिया भर में गूँजते…
स्त्रियाँ आजादी की लड़ाई में बड़े पैमाने पर शामिल हुई थीं, मगर बाद में भारतीय समाज में एक स्त्री की स्थिति इसकी संस्कृतियों, क्षेत्रों, वर्गों, जातियों और धर्मों के नाम पर तय किया जाने लगा। भारत की स्वतंत्रता के बाद स्त्रियों की शिक्षा एवं समानता पर जोर दिया गया। संविधान के द्वारा स्त्री-पुरुष के विभेद को समाप्त करने का प्रयास किया गया। विधि-व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन लाये गए। स्त्रियों के जीवन तथा व्यक्तित्व पर प्रभाव डालने वाले विवाह, विवाह-विच्छेद, उतराधिकार तथा बच्चों के संरक्षण जैसे मामलों में उनके साथ किए जा रहे भेदभाव को समाप्त करने की कोशिश की गई।
इस प्रकार स्त्रियों की स्थिति में सुधार के लिए कई मार्गों का सहारा लिया गया। संवैधानिक दायित्व के अधीन कार्यक्रम, विकास कार्यक्रम, कला के माध्यम से समाज में जागरूकता लाना, आंदोलनों द्वारा महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन जैसे कई रूपों में स्त्रियों की स्थिति में सुधार के प्रयास चलते रहे। परिणामस्वरूप स्त्रियों की स्थिति में कई परिवर्तन आये।
विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र होने के नाते तमाम विकास योजनाओं में स्त्रियों की भागीदारी की माँग समय का तकाजा है। कई दशकों से स्त्री अधिकारों के लिये किए गए सतत कोशिशों के परिणामस्वरूप महिला सशक्तिकरण आज एक मुद्दा बना है। साथ ही मानव अधिकार का सवाल महिलाओं के संदर्भ में ज्यादा गंभीर हुआ है। स्त्रियों का सशक्तिकरण हो, उन्हें मुख्य धारा में लाया जाये, सम्मानजनक जीने का अधिकार मुहैया कराया जाये, यह आज के समय की मांग है। बराबरी और सम्मान को केंद्र में रख कर स्त्री मुक्ति की लड़ाई के व्यापक किए जाने की जरूरत महसूस की गई है।
इसमें कोई शक नहीं कि आज भारतीय महिलाओं ने कानूनी, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सभी स्तरों पर पहले की तुलना में अधिक हिस्सा, अधिकार हासिल किया है। किन्तु आज भी स्त्रियों की असली जगह घर और परिवार है तथा असली पहचान पुरुष-आधारित ही है। इस सोच में आज भी बहुत कम फर्क पड़ा है। मूल तत्व वहीं का वहीं है कि पुरुष कर्ता है, स्त्री दोयम है। क्योंकि हमारा समाज स्त्री-पुरुष को कई तरह की विपरीत सीख देता है। स्त्रियों को पति परायणता सिखाई जाती हैं, तो पुरुषों को उनपर राज करना। स्त्री के लिए उसके पति के आज्ञा का पालन करना ही सबसे श्रेष्ठ धर्म है।
इन विरोधाभासी स्थितियों के बावजूद आज स्त्रियाँ जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। न केवल शिक्षा तथा स्वास्थय के क्षेत्र में बल्कि वे बहुविध भूमिका निभाने में सक्षम हो रही हैं। लड़कियों के लिए शिक्षा ने कई प्रकार के नए कार्यक्षेत्र के द्वार खोले हैं। आज एक स्त्री प्रशासक, वैज्ञानिक, इंजीनियर, तकनीशियन, केटरर, इंटीरियर डेकोरेटर, आर्किटेक्ट, बिजनेस मैनेजर आदि बन रही है। नए तकनीकी विकास के साथ महिलायेँ कई नए कार्यक्षेत्रों में आगे बढ़ रही हैं। वे अपने व्यक्तित्व में, स्वयं की चेतना को भी विकसित करने की कोशिश कर रहीं हैं। आज स्त्री समाज बदल रहा है, और बदल रही है, समाज की उनके प्रति दृष्टि। कल जो स्त्रियाँ हर क्षेत्र में दबी हुई थीं और मन से पराधीन थी, आज वे जागरूक हो रही हैं। आज यह एक सच है कि तमाम तरह के डर, गैर बराबरी, अत्याचार, शोषण के बावजूद स्त्रियाँ आगे आ रही है। अपने कदम ठोस तरीके से, मजबूती से रखना सीख रही है। उनकी भागीदारी, उनकी उपस्थिति से अब इनकार नहीं किया जा सकता।
- किरण / साभार: संभवा इंजोर

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