मई में मेडिकल की अंडरग्रेजुएट सीटों के लिए होने वाली नीट परीक्षा पेपर लीक की पुष्टि के बाद एनटीए द्वारा रद्द कर दी गई. हालांकि, यह पहली बार नहीं हुआ, पिछले कई सालों से लगातार परीक्षा में गड़बड़ियों की शिकायतें आ रही थीं. मगर इस बार परीक्षा रद्द होने से लेकर जून 21 को दोबारा परीक्षा होने तक अलग अलग खबरों के अनुसार करीब बीस के लगभग बच्चों ने आत्महत्या कर ली.
इस बीच, परीक्षा रद्द होने की घोषणा के बाद, भारत के मुख्य न्यायाधीश ने किसी अन्य संदर्भ में एक कोर्टरूम टिप्पणी में युवाओं को ‘तिलचट्टों’ की संज्ञा दे दी. शायद नीट रद्दीकरण और लंबे समय तक दबाए गए असंतोष के साथ मिलकर इस संवेदनहीन टिप्पणी ने युवाओं के सब्र का बांध तोड़ दिया और इंटरनेट पर सटायर के रूप में बने कॉकरोच जनता पार्टी नामक पेज, या संगठन ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करते हुए जंतर मंतर पर प्रदर्शन का आह्वान किया, जिसमें धीरे धीरे देश भर से लोग और छात्र संगठन जुड़ते गए. सोनम वांगचुक के आमरण अनशन की घोषणा से इस आंदोलन को व्यापक समर्थन मिलना शुरू हो गया, मगर बीस जुलाई के संसद मार्च तक दंभी सरकार टस से मस नहीं हुई. और इनकी अकड़ पच्चीस जुलाई को प्रधान का इस्तीफा आने तक बनी रही, सरकार का कोई प्रतिनिधि,मंत्री,नेता अंत तक अनशन कर रहे छात्रों और आंदोलनकारियों के बीच नहीं आया.
सीजेपी के मुख्य स्टेज के साथ ही वहां भारी संख्या में विभिन्न छात्र संघों जैसे आइसा, एआईएसएफ, एसएफआई, दिशा, के सदस्य – कार्यकर्ता पूरे महीने जुटे रहे और अपनी सजग उपस्थिति और राजनैतिक परिपक्वता से प्रतिरोध को धार देते रहे. आइसा के नेहा, मनीष, और अमीन, सोनम वांगचुक के साथ ही अनशन पर बैठे और वांगचुक को सरकार द्वारा धरना स्थल से हटा दिए जाने के बाद भी वहां रहे और बीस जुलाई को संसद मार्च की सुबह जाने माने लोगों के बीच अनशन तोड़ा.
मेरा मानना है कि नीट पेपर लीक और बच्चों की आत्महत्या ने इस मुद्दे को भावनात्मक बना दिया, लेकिन असल में मुद्दा कहीं बड़ा है और होना चाहिए. शिक्षा के निजीकरण, व्यावसायीकरण, और सांप्रदायीकरण, विश्वविद्यालयों पर अतिशय नियंत्रण, पाठ्यक्रमों में मनमाने बदलाव पर अगर बात नहीं होती है, आंकड़ों के अनुसार 2014 से 24 के बीच बंद हो गए (या सरकार के अनुसार मर्ज कर दिए गए) 90,000 के करीब सरकारी स्कूलों पर अगर बात नहीं होती है, तो इस आंदोलन का कोई मतलब नहीं है. पूरी शिक्षा व्यवस्था इस देश में ऐसी बना दी गई है कि कोई गांव का गरीब बच्चा इस तरह की परीक्षाओं में बिना महंगी कोचिंग लिए शामिल होने का सोच भी नहीं सकता है. आरक्षण के तमाम दावों के बावजूद वंचित तबकों और वर्गों के बच्चे लगातार हाशिए पर धकेले जा रहे हैं. किसी तरह प्रीमियर संस्थानों में पहुंच कर भी जिन्हें भेदभाव का शिकार होना पड़ता है, दलित छात्र छात्राओं की आत्महत्या के कितने मामले सामने आए हैं. तो जहां पूरा सिस्टम प्रिविलेज को मेरिट साबित करने में तुला है, वहां पेपर लीक उसी प्रिविलेज की अगली कड़ी है. और लड़ाई जब होनी है तो जड़ से बदलाव की ही होनी चाहिए. नहीं तो एक मंत्री, वैसे भी मो-शा के राज में किस मंत्री की क्या हैसियत है, या नाम भी किसे पता होते हैं, तो शिक्षा मंत्री का इस्तीफा अकाउंटेबिलिटी दिखाने के लिए जरूरी था मगर आज भी सवाल है कि जबतक जड़ पर बात नहीं होती है, धर्मेंद्र प्रधान को हटाकर प्रहलाद जोशी का शिक्षा मंत्री बन जाना इस तंत्र में क्या बदलाव लाएगा?
फिर भी यह मोदी और शाह की अजेय छवि पर पहली बड़ी चोट है. और पिछले बारह सालों में पहली बार ऐसा हुआ कि यह सरकार आंदोलनकारियों को कोशिश करके भी देशद्रोही साबित नहीं कर पाई. और ऐसा शायद इसीलिए हो पाया कि इसमें बिल्कुल आम घरों के और बड़ी संख्या में प्रिविलेज्ड घरों के बच्चे थे, इन्हें किसी तरह किसान आंदोलन, या उतने व्यापक नागरिकता कानून आंदोलन में जिस तरह आंदोलनकारियों को उनकी पहचान से जोड़ कर फ्रेम किया गया वैसा नहीं किया जा सका.
बहरहाल धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया है, और इसके साथ ही तात्कालिक तौर पर आंदोलन भी खत्म हो गया है. इस आंदोलन पर काफी समय तक काफी बातें होंगी. मगर इस पूरे आंदोलन में जो चीज सबसे ज्यादा याद रखी जाएगी वो छात्रों और युवाओं का संयम, साहस, और साथ ही उनकी रचनात्मकता है. एक बार फिर से यह साबित हो गया कि पिछले कुछ सालों से गांधी को लगभग गाली बना देने की गोडसेवादियों की तमाम कोशिशों के बाद भी यह देश आज भी गांधी का ही है, इतनी बड़ी संख्या में युवाओं के जुटान के बावजूद कहीं कोई हिंसा नहीं हुई, कोई तोड़फोड़, दुकानों-संपत्ति को नुकसान, आम लोगों से कोई झड़प नहीं हुई. कई पुराने नारे सुनाई दिए. आजादी, हमला चाहे जैसा होगा हाथ हमारा नहीं उठेगा से लेकर सबकी शिक्षा एक समान तक. बदलाव का रास्ता वैसे तो बहुत लंबा है, मगर फिलहाल जैसा कि वामपंथी छात्र संघ मांग कर रहे हैं एनटीए और एनईपी पर बात जरूर होनी चाहिए. नीट पेपर लीक कोई आइसोलेटेड मुद्दा है ही नहीं. सीजेपी, जो कि कोई राजनैतिक दल या संगठन नहीं है, का भविष्य भी इससे ही तय होगा कि वहां समग्र मुद्दों पर कितनी समझ बन पाती है.
- स्वाति शबनम / साभार: संभवा इंजोर

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