अचानक एक खास जमात ‘मनुस्मृति’ का बचाव करने मैदान में उतर गयी है- अभी इस अभियान का एक अतिरिक्त मकसद भी है, लगे हाथ राहुल गांधी और कांग्रेस को हिंदू विरोधी साबित करना. ‘गोदी मीडिया’ को सहयोगी भूमिका में रहना ही था. वैसे भी हिंदी पट्टी के पत्रकार जगत, टीवी सहित, में सवर्णों का वर्चस्व है, उनमें भी सर्वाधिक ‘ब्राह्मण’ होंगे. बेशक सवर्णों और ब्राह्मणों में भी ऐसे लोग/ पत्रकार हैं, जो सामाजिक भेदभाव के पोषक ‘ब्राह्मणवा’ का विरोध और सामाजिक न्याय का समर्थन करते हैं. मगर जातीय संस्कार का असर इतना गहरा होता है कि बहुतेरे ‘उदार’ छवि के ‘बुद्धिजीवी’ भी ऐसे मौकों पर डांवाडोल नजर आने लगते हैं! यह नजारा ‘मंडल’ और ‘कमंडल’ के दौर के समय से ही दिखता रहा है! अब तो उनमें से अनेक ‘कमंडल’ ही थाम चुके हैं!
इनका एक तरीका यह है कि आप किसी भी हिंदू धार्मिक ग्रंथ में कोई ‘आपत्तिजनक’ अंश होने की बात कीजिए, वे झट उसे ‘प्रक्षेपित’ बता देंगे! जैसे रामायण के ‘उत्तर कांड’ के बारे में कहा जा रहा है. इस बात का जवाब नहीं देंगे कि ऐसे सारे ग्रंथ आपकी धारा का प्रतिष्ठित ‘गीता प्रेस’ (जिसे दो साल पहले भारत सरकार ने सम्मानित भी किया) बीते कोई एक सौ वर्ष से छाप रहा है; और उनमें वे ‘प्रक्षेपित’ अंश भी हैं, तो आपने उन अंशों को हटाने का प्रयास क्यों नहीं किया? कथित हिंदू विरोधियों के बताने पर ही क्यों ध्यान गया? या कि कोई हिंदू उन्हें पढ़ता ही नहीं; या पढ़ता है तो कल तक किसी को वह आपत्तिजनक लगा ही नहीं! मुझे आखिरी बात ही सच लगती है!
याद करें रामकथा पर आधारित कोई फिल्म, सीरियल, नाटक, रामलीला, जिसमें सीता त्याग, लव-कुश के जन्म और सीता के धरती में समाने के प्रसंग नहीं रहा हो! ये सब प्रसंग तो लोकमानस में बसे हुए हैन! अब याद करें कि ‘हिंदू संस्कृति’ के किसी रक्षक ने कभी विरोध किया कि ये ‘प्रक्षेपित’ अंश क्यों दिखाये जा रहे हैं!
आखिर समाज में शूद्र/ दलित का निम्न स्थान, उनका ‘अछूत’ होना, दलितों का टोला एक किनारे होना- यह सब तो सामान्य है! पत्नी का त्याग भी कोई अचरज की बात नहीं है! हिंदू विधान में विवाह विच्छेद का प्रावधान ही नहीं है! पति जब चाहे पत्नी को छोड़ सकता है, पत्नी को यह अधिकार नहीं है! ऐसी स्त्री परित्यक्ता कहलाती है, जो जीवन भर अपने ‘पति के नाम का सिंदूर लगाती रहती है, क्योंकि कोई और पुरुष उसे पत्नी के रूप में अपनाता नहीं, अपवाद तो हैं ही. अब संविधान ने हिंदू स्त्रियों को यह अधिकार दिया है. मगर आज भी जो स्त्री तलाक की पहल करती है, उसे अच्छी नजर से नहीं देखा जाता! पूरा परिवार और समाज उसे ही समझने का प्रयास करता है कि वह इरादा बदल दे। उसके इस फैसले के पीछे पुरुष/पति का भी दोष हो सकता है, इस पर अव्वल तो कोई विचार नहीं करता है; और करता भी है, तो मानता है कि पत्नी को ‘एडजजस्ट’ करना चाहिए, यही उसके हित में है!
एक बालिका पिता के संरक्षण में, युवा/विवाहित स्त्री पति के संरक्षण में और वृद्ध होने पर- यदि पति न हो, तो पुत्रों के संरक्षण में रहती है- क्या यह सच नहीं है? श्लोक है- “पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने। रक्षन्ति स्थविरो पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति॥”
‘संरक्षण’ को ‘अधीन’ कहने से इनको बहुत कष्ट है, मगर दोनों में कितना अंतर है?
जिन परिवारों में बालिका के साथ भेदभाव होता है, जो कन्या भ्रूण की हत्या करते हैं, वे भी कुछ खास दिनों में ‘कुंवारी कन्या’ की पूजा कर लेते हैं! इससे क्या साबित होता है?
हिंदू युवती को अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने का अधिकार है? उसका पिता या कोई अन्य पुरुष रिश्तेदार उसे किसी को ‘दान’ में दे देता है! इसमें उसकी मर्जी जरूरी नहीं! विधवा और बूढ़ी होने पर कितनी स्त्रियाँ सचमुच स्वतंत्र रहती हैं?
‘मनुस्मृति’ के ऐसे ही प्रावधानों को स्त्री विरोधी कहा जाता है, तो ये कुतर्क करने लगते हैं, जबकि ये प्रावधान आज भी लगभग उसी तरह लागू है!
लेकिन स्त्री विरोधी कहने पर आप बहुप्रचारित श्लोक- “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः (‘जहां स्त्रियों की पूजा होती है, वहाँ देवताओं का वास होता है’) सुना कर स्त्री मात्र के सम्मान का दावा कररने लगते हैं!
सवाल है कि ‘कैसी स्त्रियों’ की पूजा होती है? क्या ‘विधवा को ‘अशुभ’ नहीं माना जाता? क्या विवाह के पहले या विवाह के बाद किसी पुरुष से संबंध बनाने वाली स्त्री की पूजा होती है? क्या विवाह के पहले मां बन जाने वाली स्त्री की पूजा होती है?
स्पष्ट है कि जो स्त्री पुरुषों द्वारा (ग्रंथों की रचना भी पुरुषों ने ही की है) निर्धारित विधानों का पालन करती है, सिर्फ उसी को स्त्री सम्मान मिलेगा; और जहां ऐसी स्त्रियाँ होंगी, वहीं ‘देवता’ भी प्रसन्न होंगे! किथने स्त्रियों में साहस है कि इन प्रावधानों को बुरा बात कर ‘बुरी’ स्त्री कहलाने का रिस्क ले सकें!
इसके उलट किसी पुरुष को बहु विवाह का अधिकार है- लोई लिमिट नहीं! शिव और राम को छोड़ कर शयद ही कोई देवता और आवतार ऐसा है, जिनकी एक से अधिक पत्नी नहीं थी!
राजाओं के तो ‘रनिवास’ होते थे, पटरानियाँ होती थीं, फिर भी ‘सचारित्र’ होते थे! इसके अलावा पुरूषों ने अपने लिए ‘नगरबधू’ और ‘गणिकाओं’ का भी इंतजाम कर रखा रखा था!
और किन देवताओं के प्रसन्न होने की बात की गयी है? जिनमें से अधिकतर के व्यभिचार के किस्से हमारे ग्रंथों में ही दर्ज हैं? इंद्र के दरवार में तो अक्षत यौवना अप्सराएं होती थीं जिनका ‘उपयोग’ तपस्या करने वाले ऋषियों का तप भंग करने के लिए होता था! ऐसी ही एक अप्सरा मेनका की, ऋषि विश्वामित्र से उत्पन्न बेटी थी शकुंतला, जिसके पुत्र ‘भरत’ के नाम पर इस देश का नाम ‘भारत’ हुआ, ऐसा माना जाता है.
इत्तेफाक से सच यह भी है कि जिस इसलाम को स्त्री विरोधी बताने में इनको आनंद आता है, उसमें स्त्री के पक्ष में अनेक प्रावधान हैं! बेशक स्त्री विरोधी प्रावधान भी हैं, मगर बेटी को पैतृक संपत्ति में अधिकार है! हिंदू बेटियों को यह अधिकार संविधान ने दिया, मफ़र उसका भी सच यही है कि अब भाई अपनी बहनों से लिखवा लेता है- मुझे नहीं चाहिए! विवाह के समय स्त्री से उसकी मर्जी पूछना अनिवार्य है. तलाक/खुला लेने का अधिकार है. तलकशुदा या विधवा स्त्री आशुभ नहीं मानी जाती, उसका पुनर्विवाह हो सकता है!
एक तर्क दिया जाता है कि ‘मनुस्मृति’ में कुछ अंश आपत्तिजनक हैं (जो ‘उस काल’ के लिहाज बने होंगे), लेकिन उसमें अच्छी बातें भी तो हैं!
एक बाल्टी ‘पवित्र/शुद्ध’ जल में एक चुटकी जहर मिला हुआ है, तो उस शुद्धता का क्या लाभ? सवाल है कि आप ‘मनुस्मृति’ का बचाव ही क्यों कर रहे हैं? आप कुबूल नहीं करेंगे, लेकिन असल में आप उस समाज व्यवस्था को बनाए रखना चाहते हैं, जिससे हासिल विशेषधिकार आप छोड़ना नहीं चाहते! बेहतर है कि आप खुद बदल जाएँ- इसमें समाज के सातथ ही आपका भी लाभ है!
आपत्तिजनक मानते हैं तो ऐसा खुल कर कहें, धर्मचार्यों से कहें कि उनको हटा दें! लेकिन यदि ‘मनुस्मृति’ समाज और देश के संचालन का विधान है, तो अब उसकी जरूरत क्या है? ‘संविधान’ पसंद नहीं?
प्रसंगवश- जब मैं अखबार (प्रभात खबर) में था, तब मेरे ‘मिजाज’ से परिचित एक नियमित पत्र लेखक ने मुझे ‘कुरान’ की एक प्रति दी थी- इस निवेदन के साथ कि कुछ चिह्नित आयतों को जरूर पढ़ूँ! वैसे मुझे उनमें ऐसा कुछ नहीं मिला, जो उनको दिखा होगा; या मैं समझ नहीं सका! उन आयतों में क्या था/है, इस बात को रहने देते हैं, यह बताने का आशय सिर्फ इतना है कि ‘कुरान’ की चंद (आपत्तिजनक- असहिष्णुता की सीख देने वाली, जिनका मैं बचाव नहीं करूंगा) आयतों के आधार पर आप इसलाम और पूरे मुसलिम समाज को गलत ठहराने को उतावले हैं, लेकिन ‘मनुस्मृति’ के आपत्तिजनक प्रावधानों का जिक्र होने पर आप उसके ‘अच्छे अंश’ दिखाने लगते हैं!

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