सआदत हसन मंटो आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन अपनी लेखनी के माध्यम से आज भी वे हमारे बीच उपस्थित हैं। हमें प्रेरणा दे रहे हैं, जिंदगी की सच्चाइयों से रूबरू करा रहें हैं। सआदत हसन मंटो अपनी भावपूर्ण लेखनी के कारण नई पीढ़ी तक अपनी पहुँच सहज ही बना चुके हैं। वे अपने अफसानों के रूप में, अपनी लेखनी के साथ आज भी हमारे समाज की विसंगतियों को उकेरने में सक्षम हैं। आज भी अपने तीखे, मगर चुटीले अंदाज में समाज को आईना दिखा रहे हैं।
मंटो एक ऐसे साहित्यकार थे, जिन्होंने अपनी कब्र का कतबा अपने जीवन काल में खुद ही लिखा था, जो कुछ इस तरह था- “यहां सआदत हसन मंटो दफ़न है। उसके सीने में अफ़साना निगारी के सारे इसरार-ओ-रमूज़ दफ़न हैं। वो अब भी मनो मिट्टी के नीचे सोच रहा है कि वो बड़ा अफ़साना निगार है या ख़ुदा”।
कहने को सआदत हसन मंटो उर्दू भाषा के लेखक थे, लेकिन हिंदी में भी उनकी पकड़ थी। अपनी लघु कथाओं, के साथ-साथ वे फिल्म और रेडियो के पटकथा लेखक भी थे। अपने लगभग 20 वर्षीय साहित्यिक जीवन में मंटो ने 270 अफ़साने, 100 से ज़्यादा नाटक, कितनी ही फिल्मों की कहानियां और संवाद और ढेरों नामवर और गुमनाम शखि़्सयात के रेखा चित्र लिख डाले। कहते हैं, अपने 20 अफ़साने तो उन्होंने सिर्फ 20 दिनों में अख़बारों के दफ़्तर में बैठ कर लिखे। यह साहित्य के क्षेत्र में उनके गंभीर हस्तक्षेप के उदाहरण हैं।
सआदत हसन मंटो आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन अपनी लेखनी के माध्यम से आज भी वे हमारे बीच उपस्थित हैं। हमें प्रेरणा दे रहे हैं, जिंदगी की सच्चाइयों से रूबरू करा रहें हैं। सआदत हसन मंटो अपनी भावपूर्ण लेखनी के कारण नई पीढ़ी तक अपनी पहुँच सहज ही बना चुके हैं। वे अपने अफसानों…
मंटो की कुछ महत्वपूर्ण चर्चित कहानियाँ हैं- बू, खोल दो, ठंडा गोश्त, टोबा टेकसिंह, धुआँ, स्याह हाशिए, बादशाहत का खात्मा, खाली बोतलें, नमरूद की खुदाई, याज़िद, पर्दे के पीछे, सड़क के किनारे, सरकंडों के पीछे, शैतान, शिकारी औरतें, और काली सलवार आदि। इनमें बू, खोल दो, ठंडा गोश्त, काली सलवार और टोबा टेकसिंह समसामयिक व मर्मस्पर्शी होने के कारण बहुत चर्चा में रहीं।
सआदत हसन मंटो अपने अफसानों में सामाजिक कुरीतियों को उजागर करते थे जिसके कारण, उन्हें कई तरह की सामाजिक उपेक्षा, तिरस्कार को झेलना पड़ा था। क्या पाकिस्तान, क्या हिंदुस्तान अपनी रचनाओं के कारण मंटो हमेशा विवादों में घिरे रहते थे। उनकी कहानियों पर अश्लीलता के आरोप लगे, जबकि सच्चाई यह है कि जिन अफ़सानों को अश्लील घोषित कर उन पर मुक़द्दमे चले, उनमें से बस कोई एक भी मंटो को अमर बनाने के लिए काफ़ी था। साथ ही इनका साहित्य समाज में पसंद किया जाता था, लोकप्रिय था, जिसका प्रमाण यह है कि इनके साहित्यिक कार्यों का दूसरी भाषाओं में भी अनुवाद किया गया है।
मौजूदा राजनीति और नेताओं के लिए भी सआदत हसन मंटो ने सटीक बात कही है, “लीडर जब आँसू बहा कर लोगों से कहते हैं कि मज़हब ख़तरे में है तो इसमें कोई हक़ीक़त नहीं होती। मज़हब ऐसी चीज़ ही नहीं कि ख़तरे में पड़ सके, अगर किसी बात का ख़तरा है तो वो लीडरों का है जो अपना उल्लू सीधा करने के लिए मज़हब को ख़तरे में डालते हैं”।
कितना कुछ करने का जज्बा था मंटो के मन में, तभी तो वे कहते थे “मेरी ज़िंदगी इक दीवार है जिसके पलस्तर मैं नाख़ुनों से खुरचता रहता हूँ। कभी चाहता हूँ कि इसकी तमाम ईंटों पर गंदा कर दूं, कभी ये जी में आता है कि इस मलबे के ढेर पर इक नई इमारत खड़ी कर दूं।”
अपनी छोटी-सी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा मंटो ने अपनी शर्तों पर, निहायत ही लापरवाही से बिताया था। समाज में व्याप्त धर्मांंधता पर उनका व्यंग्य लोगों को चुभता था। वे बेबाकी से कहा करते थे, “पहले मज़हब सीनों में होता था, आजकल टोपियों में होता है। सियासत भी अब टोपियों में चली आई है। ज़िंदाबाद टोपियाँ।“
वर्ष 1947 तक मंटो भारत के मशहूर और लोकप्रिय कहानीकार के रूप में स्थापित हो चुके थे। तभी देश विभाजित हो गया और साम्प्रदायिक दंगे शुरू हो गए थे। मंटो इतने निराश हुए कि एक दिन किसी को कुछ बताए बिना पानी के जहाज़ से पाकिस्तान चले गए।
तब देश में और सीमा के चारों ओर भी साम्प्रदायिक हिंसा का वातावरण बन गया था। लोग पागलों के तरह एक दूसरे के साथ दुश्मन बन मार-काट पर उतारू हो गए थे। उस हिंसक और नफरती वातावरण ने मंटो को कुछ इस तरह झकझोरा कि उनकी कलम से निकली कहानी ‘टोबा टेक सिंह’, बू, खोल दो, ठंडा गोश्त काली सलवार आदि अमर रचना बन गई। उस सांप्रदायिक दंगों के दरम्यान महिलाओं के साथ जिस तरह के दुर्व्यवहार हुये, बलात्कार और हत्यायें हुईं, वह इंसानियत को शर्मसार करने वाला था। उस अमानवीय माहौल को मंटो ने नजदीक से देखा, उन्होंने देखा कि एक देश का व्यक्ति दूसरे देश की औरतों के शरीर को मानव शरीर न समझ कर अपमानित करने, बदला लेने का एक जरिया समझता है।
पाकिस्तान पहुंचने के कुछ ही दिनों बाद उनकी कहानी ‘ठंडा गोश्त’ पर अश्लीलता का आरोप लगा और मंटो को 3 माह की क़ैद और 300 रुपये जुर्माने की सज़ा हुई। सज़ा के खि़लाफ़ पाकिस्तान की साहित्य मंडली से कोई विरोध नहीं हुआ, उलटे कुछ लोग ख़ुश हुए कि अब मंटो का दिमाग़ ठीक हो जाएगा। जाहिर है कि उनके अफ़साने सभ्य कहे जाने वाले समाज को नागवार लगते थे। इससे पहले भी उन पर इसी इल्ज़ाम में कई मुक़द्दमे चल चुके थे, लेकिन मंटो हर बार बच जाते थे। इस सज़ा के बाद मंटो का दिमाग़ ठीक तो नहीं हुआ, सचमुच ख़राब हो गया। यार लोग उन्हें पागलखाने छोड़ आए। इस बेकसी और अपमान के बाद मंटो ने एक तरह से ज़िंदगी से हार मान ली। शराब की लत ने भी उन्हें बहुत तोड़ा। यह लत कुछ ऐसी थी कि हर परिचित और अपरिचित से शराब के लिए पैसे मांगते थे। आमदनी के लिए उन्हें अपनी कहानियां बेचनी पड़ी थीं। हद तो तब हो गई, जब अख़बार वाले उन्हें 20 रुपये देकर और सामने बिठा कर कहानियां लिखवाते थे।
लेकिन मंटो की कलम का जलवा यह था कि जिस पाकिस्तान ने कभी उनके साहित्य को अश्लील कह कर सजा सुनाई थी, उसी पाकिस्तान ने उनके निधन के बाद मंटो को मुल्क के सबसे बड़े नागरिक सम्मान “निशान-ए- इम्तियाज़” से नवाज़ा।
दरअसल मंटो की बेलाग और धारदार लेखनी, जिसमें केवल और केवल यथार्थ था, से कथित सभ्य समाज मुंह चुराता था। उनके अफसानों से लोगों की स्थापित आस्थाएं खंडित होती थीं। मंटो ने अपनी कहानियों के ज़रिये उन सच्चाइयों को सामने रखा, जिनसे समाज डरता था, आज भी हम उनकी कहानियों के माध्यम से समाज में गहरे पैठी हिंसा को जान पाते हैं। मंटो ने काल्पनिक पात्रों के बजाए समाज के हर समूह और हर तरह के इंसानों की ज़िंदगियों को, अपनी कहानियों में स्थान दिया है। समाज के कुरूप घिनौने चेहरे को बेनक़ाब करने की कोशिश की है। मंटो के पास समाज को बदलने का एक सशक्त तरीका अपनी लेखनी के रूप में मौजूद था। उनके अंदर इस समाज के दोहरेपन के प्रति विद्रोह था और वे अपनी जिंदगी अपनी शर्तों पर जीना चाहते थे। आजादी की परिभाषा गढ़ती उनकी लेखनी से उनकी बगावती तबीयत का बखूबी आभास मिलता है।
मंटो को महज़ अफ़साना निगार कहना भी उनकी तौहीन है, इसलिए कि वे अफ़साना निगार से ज़्यादा हक़ीक़त निगार हैं और उनकी रचनाएं किसी महान चित्रकार से कम स्तर की नहीं। ये किरदार इतने शक्तिशाली हैं कि लोग किरदारों में ही गुम होकर रह जाते हैं। वही हकीकत लगने लगते हैं। उनकी कहानियों के पात्र इतने सशक्त हुआ करते थे कि लोग उनको वास्तविक समझ लेते थे। उनकी लेखनी की कलात्मकता कहानी को हक़ीक़त और ज़िंदगी से बिल्कुल क़रीब ला देती थी। मंटो ने समाज के हाशिये पर पड़े सामान्य लोगों को अपनी कहानियों का किरदार बनाया।
- किरण – साभार: संभवा इंजोर.

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