वंदे मातरम पर सुप्रीम कोर्ट का रुख: ‘धार्मिक वजहों से राष्ट्रगीत न गाना अपराध नहीं’

नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय ने देश के राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ को लेकर एक बड़ा बयान दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि अगर कोई व्यक्ति अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण राष्ट्रगीत नहीं गाता है, तो उस पर आपराधिक मामला नहीं चलना चाहिए। इसके साथ ही कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस पूरे विषय पर जवाब मांगा है।

सुप्रीम कोर्ट प्रसिद्ध गायक टीएम कृष्णा द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील डॉ. एस. मुरलीधर ने पक्ष रखते हुए कहा कि ‘वंदे मातरम’ के अंतिम चार छंदों में हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख है, इसलिए इसे अनिवार्य बनाना संविधान के धर्मनिरपेक्ष ढांचे के खिलाफ है।

बिजो इमैनुअल केस का दिया हवाला
जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि इस मामले की व्याख्या 1986 के प्रसिद्ध ‘बिजो इमैनुअल’ केस में तय सिद्धांतों के आधार पर की जाएगी। 1986 में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि राष्ट्रगान के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए चुपचाप खड़े रहना ही पर्याप्त है और धार्मिक कारणों से इसे न गाने पर किसी को दंडित नहीं किया जा सकता।

अदालत में तीखी बहस
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और याचिकाकर्ता के वकील के बीच जोरदार बहस देखने को मिली। संविधान के अनुपालन की प्रक्रिया पर बात करते हुए सॉलिसिटर जनरल द्वारा इस्तेमाल किए गए एक शब्द पर आपत्ति जताई गई, जिसके बाद अदालत ने हस्तक्षेप करते हुए याद दिलाया कि संविधान हर नागरिक के अधिकारों की रक्षा करता है।

2026 में लागू हुआ था नया कानून
उल्लेखनीय है कि ‘राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम’ में संशोधन कर सरकार ने ‘वंदे मातरम’ के अपमान, इसके गायन में जानबूझकर बाधा डालने या रोकने को दंडनीय अपराध घोषित किया था, जिसमें अधिकतम 3 साल की सजा का प्रावधान है। इसी कानून की व्याख्या और संवैधानिकता को लेकर अब मामला देश की सबसे बड़ी अदालत के समक्ष है।

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