असम, केरल और पुददुचेरी में मतदान हो गया. सबसे ‘सुरक्षित’ भविष्यवाणी- ऊंट किस करवट बैठेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता! फिलहाल असम की बात. वहाँ के चुनावी परिदृश्य से तो ऐसा ही लगा कि कथित भाजपा विरोधी दलौं को कांग्रेस से कुछ ज्यादा ही कष्ट है. वैसे भी आमतौर पर भाजपा के विरोध में बोलते रहने वाले नेताओं और दलों में से लगभग सभी कभी न कभी भाजपा के साथ गंठजोड़ कर चुके हैं.
एक सच यह भी है कि जब देश में काँग्रेस का एकछत्र राज हुआ करता था, ये सभी दल कांग्रेस के विरोध में ही होते थे. ये सब क्षेत्रीय दल हैं या इनका प्रभाव एक या दो राज्यों तक सीमित है. अपने राज्य में कांग्रेस कमजोर रहे, यह इनको अपने हित में लगता है. या कि भाजपा से उतना तीखा विरोध ही नहीं है, प्रकट में जितना दिखाते हैं.
सैद्धांतिक विरोध तो कभी नहीं रहा! जनसंघ से लेकर भाजपा तक- इस जमात के चरित्र और चिंतन में कोई बदलाव तो हुआ नहीं है. तो जो दल एनडीए के घटक थे, उसकी सरकार में शामिल थे- तृणमूल काँग्रेस, झामुमो, बसपा, एआईडीएमके आदि- उनको अचानक भाजपा सम्प्रदायिक लगने लगी- यह बात आसानी से पचने वाली नहीं है. एनसीपी का तो जन्म ही सोनिया गांधी के ‘विदेशी मूल’ के सवाल पर हुआ था! हालांकि शरद पवार कभी खुल कर भाजपा के साथ नहीं गए, कांग्रेसी अतीत का प्रभाव भी बचा हुआ है शायद. लेकिन उनकी राजनीति अपने परिवार के हितों पर केंद्रित रहती है.
विपक्ष में पेंच, भाजपा की मौज!
सूचना के मुताबिक असम में झारखंड मुक्ति मोर्चा 21, सपा 23 सीट, बसपा 80 सीट, तृणमूल कांग्रेस 23 सीट, आप 25 सीट, राजद 3 सीट, एएसपी 25 सीट, एनसीपी 12 सीटों पर चुनाव लड़ रहे थे! इनमें से सपा और राजद ने ‘जनता प्रयोग’ के बाद भाजपा से दूरी बनाये रखी है. लेकिन काँग्रेस को आँख दिखाने मौका भी नहीं छोड़ते!
फिर भी आज ये सब दिखाना यही चाह रहे थे कि वे भाजपा को असम की सत्ता से बाहर करना चाहते हैं, लेकिन व्यवहार में उसकी मदद कर गए! कहा जा सकता है, कहा जा रहा है कि कांग्रेस ने उनकी उपेक्षा की, उनकी हैसियत के अनुसार सीट नहीं दी. लेकिन असम में इनकी स्थिति क्या रही है? वर्तमान विधानसभा में कितने विधायक हैं?
बसपा का फंडा तो साफ है- उसकी कभी कोई स्पष्ट नीति नहीं रही है. ‘बहुजन’ के हित में ‘बहनजी’ कुछ भी कर सकती हैं. उसी तरह शायद झारखंड के व्यापक हित में झामुमो भी! संभव है, इनमें से अनेक के संदर्भ में ‘फ़ाइलों’ का भी कुछ चक्कर हो.
एक और कारण- जनता में राहुल गांधी की स्वीकार्यता जितनी भी बढ़ी हो, तुलना में युवा ‘रागा’ को स्वीकार करने में विपक्षी दलों में हिचक स्पष्ट दिखती है. केजरीवाल तो मोदी का विकल्प खुद को ही मानते हैं. यह महत्वाकांक्षा आधे- अधूरे राज्य दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने के समय से पल रही है.
सवाल है कि इस चुनाव में इन दलों का लक्ष्य क्या था? अधिक से अधिक सीट हासिल करना? या किसी दल की या जीत या हार सुनिश्चित करना? किसकी जीत? किसकी पराजय? या कोई जीते, हमें क्या?
लगता तो यही है कि असम में मुकाबला भाजपा और काँग्रेस के बीच रहा. इनकी ‘मेहनत’ का इनमें से ही किसी को लाभ और किसी को नुकसान होगा, यह बात कोई भी समझ सकता है. सिर्फ इनको नहीं मालूम या मालूम तो है; बस कुबूल नहीं करेंगे!
केरल में भी लगभग सीधी लड़ाई है- माकपा (एलडीएफ) बनाम काँग्रेस (यूडीएफ). वैसे भाजपा भी जोर आजमाइश कर रही है, यह दिखाने का प्रयास कि हम भी हैं. मजेदार बात यह कि ये तीनों पक्ष चुनाव प्रचार के दौरान बाकी दो पर एक-दूसरे मिले होने का आरोप लगा रहे थे! काँग्रेस और भाजपा कुछ मुखर ढंग से. केरल में लंबे समय से एलडीएफ और यूडीएफ के बीच ही लड़ाई होती रही है. इसलिए राज्य के चुनाव में एक दूसरे पर आरोप लगाना एक हद स्वाभाविक है, हालांकि राष्ट्रीय राजनीति में दोनों भाजपा के खिलाफ तालमेल भी कर लेते हैं!
जो भी हो, बीते बारह वर्षों के दौरान केंद्र सरकार और मोदी-शाह पर लोकतंत्र की हत्या करने, संविधान को बदलने की मंशा रखने, आम जनता के हितों की अनदेखी करने, धार्मिक उन्माद की राजनीति और संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने जैसे गंभीर आरोप लगते रहे दल यदि जाने-अनजाने भाजपा की जीत में मददगार की भूमिका निभा रहे हैं. जहां राष्ट्र का व्यापक हित और भविष्य दांव पर लगा हो, राज्य या दल के तात्कालिक हित को ऊपर रखना राजनीतिक राजनीतिक परिपक्वता की कमी का द्योतक ही माना जाएगा.
बेशक बड़ा दल होने के नाते कांग्रेस को भी अपने सहयोगी दलों के साथ तालमेल बिठाने में बेहतर कौशल दिखना चगिए, लेकिन हमेशा तालमेल की कीमत वही चुकाये, यह जरूरी तो नहीं!
असम चुनाव के कारण कांग्रेस और झामुमो के बीच संभावित खटास का एक तात्कालिक नतीजा दो महीने बाद होने वाले राज्यसभा चुनाव पर पड़ने की पूरी आशंका या संभावना है. दो सीटों पर चुनाव होना है. एक पर झामुमो की जीत तय है; दूसरी सीट पर ‘खेल’ होगा और भाजपा इसमें माहिर है. ‘साधन’ की कमी नहीं ही है. जैसे बिहार में कांग्रेस और राजद के कुछ विधायक वोटिंग के समय ‘अनुपस्थित’ हो गये थे, कोई आश्चर्य नहीं की झारखंड में भी कुछ लोग ऐन मौके अनुपस्थित हो जाएं! इसमें ‘गांधी जी’ की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है!
गांधी जी को लोग लाख गाली दें, लेकिन आज भी परस्पर विरोधी विचार वालों को एकजुट करने में ‘गांधी’ की बड़ी भूमिका रहती है. ‘महात्मा’ गांधी नहीं, रिजर्व बैंक वाले ‘गांधी’ की. वैसे इस तरह के पाला बदल या क्रॉस वोटिंग; या सायास अनुपस्थिति का मूल कारण तो राजनीतिक दलों में वैचारिक निष्ठा की कमी ही होती है. जब राजनीति में निजी स्वार्थ ही मुख्य हो जाए, तो इससे भिन्न की उम्मीद भी कैसे की जा सकती है?

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