मध्य प्रदेश में निरक्षरता के खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों के सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं। राज्य में निरक्षरों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार प्रदेश में निरक्षरों की संख्या 1.89 करोड़ से अधिक थी, जो अब घटकर लगभग 50.75 लाख रह गई है। यानी विभिन्न सरकारी प्रयासों के बल पर 1.38 करोड़ से अधिक लोग अक्षर ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं।
शेष बचे 50.75 लाख निरक्षरों को शिक्षित करने के लिए राज्य सरकार ने ‘उल्लास-नवभारत साक्षरता कार्यक्रम’ को और तेज कर दिया है। स्कूल शिक्षा विभाग के राज्य साक्षरता मिशन प्राधिकरण के अनुसार, इस वर्ष 15 वर्ष से अधिक आयु के 25 लाख से अधिक लोगों को साक्षर बनाने का विशेष लक्ष्य रखा गया है। सरकार की योजना अगले वर्ष तक प्रदेश से निरक्षरता को पूरी तरह समाप्त करने की है।
अभियान से जुड़े प्रमुख बिंदु और जमीनी स्थिति:
क्षेत्रीय असमानता: प्रदेश के आदिवासी बहुल जिलों जैसे आलीराजपुर, झाबुआ और बड़वानी में साक्षरता दर अब भी 50 प्रतिशत से कम है। वहीं जबलपुर, इंदौर और भोपाल जैसे जिलों में यह 80 प्रतिशत से अधिक है। राजधानी भोपाल में वर्तमान में लगभग 2.40 लाख लोग निरक्षर हैं।
तकनीक और युवाओं की भागीदारी: अभियान को गति देने के लिए ‘प्रौढ़ शिक्षा ऐप’ तैयार किया गया है। इसके अलावा, कक्षा 9वीं से 12वीं तक के विद्यार्थियों को प्रोजेक्ट के तहत अपने-अपने वार्डों में निरक्षरों को पढ़ाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
व्यवहारिक बदलाव: साक्षरता केंद्रों (‘अक्षर पोथी’) के माध्यम से पढ़ने वाले लोग अब आत्मनिर्भर बन रहे हैं। कई स्थानीय दुकानदार और विक्रेता, जो पहले अंगूठा लगाते थे, अब हस्ताक्षर करने के साथ-साथ ऑनलाइन भुगतान और बैंकिंग का काम भी खुद संभालने लगे हैं।

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