नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों (EC) की नियुक्ति प्रक्रिया को नियंत्रित करने वाले नए कानून की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर विभाजित (Split Verdict) फैसला सुनाया है। दो जजों की पीठ में एकराय न बनने के कारण अब इस मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के समक्ष भेजा गया है, ताकि उचित ‘संविधान पीठ’ (Constitution Bench) का गठन कर इस पर सुनवाई की जा सके।
बेंच के दो जजों में अलग-अलग राय
जस्टिस दीपांकर दत्ता: उन्होंने याचिका को सीधे 5-जजों की संविधान पीठ के पास भेजने की मांग का विरोध किया। उनका मानना था कि 3 जजों की पीठ के बजाय मामले को सीधे सीजेआई के पास भेजना प्रक्रिया में अनावश्यक देरी से बचाएगा।
जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा: उन्होंने इस मामले को विचार के लिए सीधे संविधान पीठ को सौंपने का समर्थन किया।
पीठ ने स्पष्ट किया कि संवैधानिक ढांचा इस सिद्धांत पर काम करता है कि देश व्यक्तियों से नहीं, बल्कि कानून से चलता है और सत्ता का इस्तेमाल करने वाले भी कानून के अधीन हैं।
क्या है यह विवादित कानून?
दिसंबर 2023 में संसद ने नया कानून पारित किया था। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला दिया था, जिसके तहत चुनाव आयुक्तों के चयन के लिए बनी समिति में तीन सदस्य शामिल थे: प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता (LoP) और देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI)।
हालांकि, संसद द्वारा लाए गए नए कानून के जरिए इस चयन समिति से CJI को बाहर कर दिया गया और उनकी जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया।
जनहित याचिका की मुख्य मांग
कांग्रेस नेता जया ठाकुर और ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (ADR) सहित अन्य याचिकाकर्ताओं ने इस कानून को शीर्ष अदालत में चुनौती दी है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि चयन समिति से सीजेआई को बाहर करने और कैबिनेट मंत्री को शामिल करने से सरकार का बहुमत हो जाता है, जिससे चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की स्वतंत्रता और निष्पक्षता प्रभावित होती है।

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