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गृह मंत्रालय के निगरानी संबंधी आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती

नई दिल्ली: केंद्रीय एजेंसियों और दिल्ली पुलिस को सभी कंप्यूटरों की निगरानी संबंधी केंद्र सरकार के आदेश की वैधता व संवैधानिकता को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष सोमवार को 20 दिसंबर के आदेश को रद्द करने की मांग वाली जनहित याचिका दायर की गई है। वकील एम.एल. शर्मा द्वारा दाखिल जनहित याचिका में बताया गया है कि गृह मंत्रालय का आदेश गैरकानूनी, असंवैधानिक और कानून के लिए अधिकारातीत है और उन्होंने भय जताया कि सरकार के विरोध में विचार व्यक्त करने वाले नागरिकों को दंडित किया जा सकता है।

केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी आदेश में खुफिया विभाग, प्रवर्तन निदेशालय, केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) सहित 10 केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों व दिल्ली पुलिस को किसी भी कंप्यूटर से सृजित, संचारित, प्राप्त या संग्रहित सूचना की निगरानी करने, उसे विकोड करने के लिए अधिकृत किया गया है। 

अधिसूचना में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि किसी भी कंप्यूटर संसाधन के प्रभारी सेवा प्रदाता या सब्सक्राइबर इन एजेंसियों को सभी सुविधाएं और तकनीकी सहायता प्रदान करने के लिए बाध्य होंगे और ऐसा करने में विफल रहने पर उन्हें सात साल की कैद और उनपर जुर्माना भी लग सकता है।

याचिका में कहा गया, “एक अघोषित आपातकाल के अंतर्गत आगामी आम चुनाव को जीतने के लिए पूरे देश में तानाशाही के तहत राजनीतिक विरोधियों, विचारकों और बोलने वालों की तलाश के लिए यह आदेश जारी किया गया है, जिसकी इजाजत नहीं दी जा सकती।”

याचिका में कहा गया है, “निगरानी संबंधी आदेश को निजता के मौलिक अधिकार के खिलाफ परखा जाना चाहिए।”

अदालत से अधिसूचना के आधार पर सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के प्रावधानों के तहत किसी के भी खिलाफ जांच या किसी प्रकार की आपराधिक कार्रवाई शुरू करने से एजेंसियों को प्रतिबंधित करने को भी कहा गया है और नागरिकों के जीवन व स्वतंत्रता पर गंभीर खतरा और चोट का डर जताया गया है।

ऐसी विशाल शक्तियों के साथ जांच एजेंसियों को सशक्त बनाने के कारणों पर गृह मंत्रालय के आदेश की चुप्पी को चिन्हित करते हुए याचिका में तर्क दिया गया है कि बिना लिखित दर्ज कारणों के केंद्रीय एजेंसियों द्वारा लोगों को जांच का विषय बनाया जा सकता है। 

संयोगवश, शर्मा को ‘तुच्छ’ पीआईएल दाखिल करने के लिए हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा फटकार लगाई गई थी और उन पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया था।


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