07 अगस्त 2026: नई दिल्ली/मुंबई: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत द्वारा नई पीढ़ी यानी ‘जेन जी’ को राष्ट्रप्रेमी और अपना हिस्सा बताए जाने के बाद राजनीतिक गलियारों में वाकयुद्ध छिड़ गया है। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दीपके समेत समूचे विपक्ष ने इस वक्तव्य पर चुटकी लेते हुए कहा कि संघ प्रमुख को यह ज्ञान अपने राजनीतिक अनुषांगिक संगठन, भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देना चाहिए।
मुंबई में लगभग दो हजार से अधिक विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए संघ प्रमुख ने कहा था कि आंदोलनरत युवा देशविरोधी नहीं बल्कि हमारी भावी पीढ़ी हैं। इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए सीजेपी प्रमुख अभिजीत दीपके ने समाचार एजेंसी एएनआई से संवाद करते हुए कहा:
“कल मोहन भागवत के वक्तव्य का सबसे सारगर्भित पहलू यही था कि नवयुवकों पर ‘देशद्रोही’ का थप्पा न लगाया जाए। चूंकि संघ भाजपा के वैचारिक पितृपुरुष की भूमिका में है, इसलिए मैं उनसे आग्रह करूंगा कि वे इस संदेश को सीधे नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी तक प्रेषित करें। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सत्ताधारी दल अपने मार्गदर्शक की हिदायतों को आत्मसात करता है या सिरे से खारिज कर देता है।”
विपक्ष का आरोप: मोहन भागवत भाजपा के मार्गदर्शक हैं, अतः उन्हें गृह मंत्री अमित शाह की चुप्पी और युवाओं पर हुए दमन के खिलाफ भी मुखर होना चाहिए।
विपक्षी दलों के प्रतिनिधियों ने इस पहल को महज छलावा करार देते हुए आरोप लगाया कि संघ दोहरा रवैया अपनाने में सरकार को संरक्षण दे रहा है।
प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं: प्रियंका गांधी
संघ प्रमुख के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस की वायनाड सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने दोटूक कहा कि देश की युवा पीढ़ी को अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए मोहन भागवत से किसी प्रमाण-पत्र की तनिक भी आवश्यकता नहीं है।
वहीं कांग्रेस नेताओं ने 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारी छात्रों पर हुए पुलिसिया बल प्रयोग का मुद्दा उठाते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की चुप्पी पर गंभीर प्रश्न खड़े किए। कांग्रेस महासचिव (संगठन) के.सी. वेणुगोपाल ने संवाददाताओं से चर्चा करते हुए कहा:
सहानुभूति की प्रामाणिकता: “यदि संघ प्रमुख को वास्तव में युवाओं की पीड़ा का अहसास है, तो उन्हें तुरंत गृह मंत्री का त्यागपत्र मांगना चाहिए या कम से कम उन्हें संसद में आकर पीड़ित छात्रों से क्षमा याचना करने का निर्देश देना चाहिए।”
दमनकारी नीति का विरोध: “सत्ता की बागडोर परोक्ष रूप से संघ के हाथों में है। यदि वे सचमुच चिंतित हैं, तो छात्रों पर चलाए गए पैलेट गन और लाठीचार्ज जैसे बर्बर कृत्यों की सार्वजनिक निंदा क्यों नहीं करते? केवल खोखली सहानुभूति से काम नहीं चलेगा।”
भागवत का मूल वक्तव्य और संवाद की वकालत
मुंबई के सम्मेलन में जब एक छात्र ने यह अंदेशा जताया कि विरोध प्रदर्शन करने वाले युवाओं को अक्सर ‘देशद्रोही’ करार दे दिया जाता है, तब संघ प्रमुख ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा था कि किसी आंदोलन में भागीदारी करने मात्र से नई पीढ़ी राष्ट्रविरोधी नहीं हो जाती। वे हमारे अपने हैं और हमारी आने वाली नस्ल हैं। सार्थक विमर्श के लिए आत्मीयता और परस्पर सम्मान अपरिहार्य है। एक-दूसरे के दृष्टिकोण को समझकर ही समाधान का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है।
बेरोजगारी ही असंतोष की मूल वजह: चंद्रशेखर आजाद
आजाद समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद ने इस मुद्दे पर भाजपा और संघ के परस्पर विरोधाभासी बयानों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि कुछ दिवस पूर्व तक संघ के ही पदाधिकारी प्रदर्शनकारियों को अराजक तत्व बता रहे थे और भाजपा नेता उन पर सवाल उठा रहे थे। मोहन भागवत ने जिस समूह से संवाद किया, वे संभवतः उनके अपने ही किसी सामाजिक-राजनीतिक घटक के प्रतिनिधि रहे होंगे। यथार्थ तो यह है कि देश का युवा प्रचंड बेरोजगारी के कारण आक्रोशित है और सरकार इस मूल समस्या से ध्यान भटकाने का प्रयास कर रही है।

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