हिंदू बनाम हिंदू : उम्मीद करें कि बंगाल में यही हुआ हो

यह डॉ लोहिया के एक लेख का शीर्षक है, जिसमें उन्होंने कहा है कि भारत में हजारों वर्षों से ‘हिंदू बनाम हिंदू’ का संघर्ष चलता रहा है- उदार हिंदू और अनुदार हिंदू के बीच. उनके अनुसार जब-जब अनुदान हिंदू की जीत होती है, भारत कमजोर होता है; उदार हिंदू जीतता है तो भारत समृद्ध और मजबूत होता है. हिंदू बनाम हिंदू का संघर्ष आज भी जारी है.

यह कोई रहस्य नहीं है कि भाजपा के पास जीत का एकमात्र या सबसे कारगर फार्मूला ‘हिंदू बनाम मुस्लिम’ ही है. हिंदुओं को हिंदू होने के गर्व का एहसास दिलाना. जन्मगत ऊंच-नीच की जाति व्यवस्था और इस कारण हिंदू द्वारा हिंदू के उत्पीड़न के सच को भूल कर एक साझा शत्रु के रूप में मुसलिम समुदाय को पहचाने के लिए तैयार करना, इतिहास के चुनिंदा प्रसंगों को नमक-मिर्च लगा कर प्रचारित करना, अल्पसंख्यकों, खास कर मुसलमानों के खिलाफ नफरत को बढ़ाना- सीधे कहें तो हिंदुओं का खून खौलाना. यह फार्मूला मोटा-मोटी सफल होता रहा है. मगर भारत का एक बड़ा हिस्सा- दक्षिण और पूर्वोत्तर (असम को छोड़ कर)- ऐसा है, जहां यह फार्मूला चल नहीं पा रहा है. तो दूसरे तरीके भी अपनाये जा रहे हैं. हालांकि वहाँ भी ‘हिंदू हिंदू’ करने का कोई मौका छोड़ते नहीं है. केरल के हिंदुओं को ‘जगाने’ के साथ पूरे देश में मुस्लिम समाज और इसलाम की विकृत छवि बनाने के लिए ‘केरला स्टोरी’ बनी, तमिलनाडु में भी ‘सनातन सनातन’ का गीत गया जा रहा है. दरगाह का विवाद खड़ा कर और टीपू सुल्तान को हिंदू विरोधी बता कर कर्नाटक में भी कुछ जमीन तैयार हुई है. मणिपुर में हिंदू बनाम ईसाई का फार्मूला अपनाया गया.

पूर्वोत्तर को साधने के लिए बंगाल में एड़ी चोटी का जोर लगा दिया. मगर ऐसा लगता है कि तमाम प्रयासों के बावजूद, वहाँ ‘हिंदू बनाम मुसलमान’ नहीं हो सका!
सच यही है कि भाजपा जैसी ताकतों को चुनौती हिंदू समुदाय का अनुदार तबका ही देता रहा है. दे रहा है. एक चुनौती हिंदू समाज की ऊंच नीच वाली समाज व्यवस्था भी है. लेकिन उसमें सुधार करने के बजाय ‘साझा शत्रु’ खड़ा करना इनको अधिक आसान लगता है. वैसे भी जन्मजात श्रेष्ठता के अहंकार में डूबे हिंदू समाज का प्रभु वर्ग, यानी ‘सवर्ण’ अपना वर्चस्व छोड़ने के लिए तैयार नहीं है, नहीं होगा. उसके लिए ‘हिंदू राष्ट्र’ का अर्थ भी ‘ब्राह्मणवादी’ व्यवस्था को नये सिरे से स्थापित और मजबूत करना है, जिसमें ‘शूद्र’ दोयम दर्जे का नागरिक ही रहेगा.
बेशक मुसलमान के पास आज कोई विकल्प नहीं है. जो भाजपा के खिलाफ है, वह उसकी पसंद है. लेकिन सिर्फ मुसलमान वोट से कुछ होता नहीं है. किसी भी राज्य में गैर भाजपा दल की सरकार सिर्फ मुस्लिम वोट से नहीं बनती, बन ही नहीं सकती.
अगर बंगाल के हिंदू भाजपा के साथ होते तो इनको इतनी ताकत झोंकने की जरूत ही नहीं पड़ती. यदि देश के साठ फीसदी हिंदू भाजपा के साथ होते तो कहीं किसी राज्य में विपक्ष की सरकार नहीं होती, नहीं होगी. लेकिन ‘अच्छे दिन’ का वायदा पूरा कर या अन्य तरह से भारत के आम आदमी (हिंदू) के जीवन को खुशहाल बना कार वोट मंगने के बजाय ये किसी तरह हिंदू गोलबंदी की कोशिश में लगे रहते हैं, क्योंकि ‘विकसित’ भारत का सपना तो महज झुनझुना है! न वह लक्ष्य है, न ऐसा इरादा.
अब तो ये लोग इस बात से भी बेपरवाह हो गए हैं इनको कोई कम्युनल, मुस्लिम विरोधी या जहर फैलाने वाला कहे, क्योंकि यही तो इनकी यूएसपी है. इस तरह के आरोपों से हिंदू समाज के एक हिस्से में उनकी जय जयकार होती है, क्योंकि उनको यही पसंद है. फिर भी बंगाल में इनको अपना मछली प्रेम प्रदर्शित करना पड़ा, इसका मतलब साफ है कि मछली खोर बंगाली हिंदुओं ने इनका पूरा साथ नहीं दिया.

आज यदि ममता बनर्जी की जीत की थोड़ी भी संभावना है या वह बराबरी के मुकाबले में भी हैं, तो इसलिए कि बंगाल के हिंदू मोदी-योगी वाले हिंदू नहीं हैं. इसी कारण, अनेक जानकारों का मानना है कि यह चुनाव देश के कथित ‘ह्रदय प्रदेश’ के जो सनातनी संस्कारी हिंदू हैं, उनके खिलाफ बंगाली हिंदुओं की अस्मिता का सवाल भी बन गया. उनके खान-पान पहनावे, बोली- सबके प्रति हिकारत भाव और अपनी विशेषता का दंभ इनके आचरण में दिखता है. बंगाल पर इसका बहुत असर नहीं है, यह एहसास होने पर हिंदीपट्टी के स्टार हिंदू नेता- जो शाकाहार का गुण गाते नहीं थकते, बंगाल जाकर मछली खा खा कर दिखाने लगे कि हम भी मछली खाते हैं.
देश के ‘सौभाग्य’ से अब तक पूरा देश इस उन्माद में बहा नहीं है.

यह हिंदू बनाम हिंदू की लड़ाई है, जारी है, जारी रहेगी. हालांकि हिंदुओं ने ही तय कर लिया कि हम अपने देश को ‘पाकिस्तान’ बनाएंगे, तो कोई क्या कर सकता है!