रांची। झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए होने वाले चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है। इस बार चुनावी चर्चा का केंद्र भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नथवाणी का नामांकन पत्र बन गया है। कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा ने उनके नामांकन पर गंभीर सवाल उठाए हैं, जबकि चुनाव अधिकारियों ने जांच के बाद उनके नामांकन को वैध घोषित कर दिया है।
दरअसल, राज्यसभा की दो सीटों पर चुनाव होना है। इनमें से एक सीट झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन के निधन के बाद रिक्त हुई है, जबकि दूसरी सीट का कार्यकाल पूरा होने जा रहा है। सत्तारूढ़ गठबंधन झामुमो और कांग्रेस ने आपसी सहमति से एक-एक सीट पर उम्मीदवार उतारने का फैसला किया है।
चुनावी समीकरण उस समय रोचक हो गए जब उद्योगपति और पूर्व राज्यसभा सांसद परिमल नथवाणी ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नामांकन दाखिल किया। उनके नामांकन के बाद कांग्रेस ने कई आपत्तियां दर्ज कराईं। पार्टी का आरोप था कि नामांकन पत्र में कुछ महत्वपूर्ण जानकारियों को लेकर विसंगतियां हैं और नियमों का पालन नहीं किया गया है।
कांग्रेस नेताओं ने रिटर्निंग ऑफिसर के समक्ष औपचारिक शिकायत दर्ज कराते हुए नामांकन रद्द करने की मांग की। हालांकि जांच और सुनवाई के बाद रिटर्निंग ऑफिसर ने नथवाणी के नामांकन को वैध मानते हुए उन्हें चुनाव लड़ने की अनुमति दे दी। इस फैसले के बाद कांग्रेस ने नाराजगी जताई और संकेत दिया कि वह मामले को चुनाव आयोग तक ले जा सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नथवाणी के मैदान में बने रहने से चुनाव का गणित पहले की तुलना में अधिक जटिल हो गया है। विधानसभा में संख्याबल के आधार पर सत्तारूढ़ गठबंधन की स्थिति मजबूत मानी जा रही है, लेकिन राज्यसभा चुनावों में क्रॉस-वोटिंग और रणनीतिक मतदान की संभावनाएं हमेशा चर्चा का विषय रहती हैं।
इसी कारण राजनीतिक दल अपने-अपने विधायकों को एकजुट रखने में जुट गए हैं। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि मतदान से पहले दल अपने विधायकों को सुरक्षित स्थानों पर रख सकते हैं ताकि किसी प्रकार की टूट-फूट या क्रॉस-वोटिंग की संभावना को रोका जा सके।
अब पूरे राज्य की निगाहें मतदान की प्रक्रिया और अंतिम परिणाम पर टिकी हैं। यह चुनाव केवल दो राज्यसभा सीटों का नहीं, बल्कि झारखंड की बदलती राजनीतिक दिशा, विपक्ष और सत्तारूढ़ गठबंधन की ताकत तथा दलों की आंतरिक एकजुटता की भी परीक्षा माना जा रहा है।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि नामांकन विवाद का राजनीतिक असर कितना पड़ता है और क्या चुनाव परिणाम विधानसभा के मौजूदा संख्याबल के अनुरूप रहते हैं या फिर कोई नया राजनीतिक समीकरण उभरकर सामने आता है।

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