पत्नी द्वारा पति की या किसी युवती द्वारा अपने प्रेमी के साथ मिल कर मंगेतर की हत्या या हत्या के प्रयास की हाल की कुछ घटनाएं बेशक चिंताजनक हैं! मगर इन चंद घटनाओं के आधार पर कुछ लोग इसे महिलाओं में बढ़ती हिंसक प्रवृत्ति, नारी सुलभ भावनाओं में कमी के रूप में देख रहे हैं. यह निष्कर्ष सही नहीं है और ऐसा इसलिए कि हमने महिला को ‘देवी’ का दर्जा दिया है और भूल गए हैं कि वह भी एक सामान्य इंसान है! स्त्री हो या पुरूष दोनों में एक समन भावनाएं, अच्छाई और बुराई हो सकती है। समाज के बदलते हालात के साथ उसमें भी अच्छा या नकारात्मक बदलाव हो सकता है!
पिछले 1-2 साल में भारत में ऐसे कुछ मामले सामने आये हैं, जहाँ पत्नियों या युवतियों ने पति/मंगेतर की हत्या की या प्रयास किया.
-मेरठ केस, 2024: पत्नी ने प्रेमी के साथ मिल कर पति की हत्या की, शव को सीमेंट में छिपाया.
-बेंगलुरु केस, 2023: कंप्यूटर इंजीनियर पत्नी ने पति की हत्या कर शव को सूटकेस में भर दिया!
-इंदौर केस, 2024: शादी से इंकार पर एक युवती ने मंगेतर पर चाकू से हमला किया!
इन घटनाओं के बाद सोशल मीडिया पर ‘महिलाओं में बढ़ती हिंसक प्रवृत्ति’ की बहस छिड़ी. यह चिंता वाजिब और स्वाभाविक है, पर निष्कर्ष और तर्क सही नहीं लगते! हिंसा कोई भी करे, निंदनीय है. हर जान की कीमत बराबर है, मगर कुछ घटनाओं से पूरी स्त्री-जाति की ‘प्रवृत्ति’ तय कर देना आँकड़ों और विवेक, दोनों के खिलाफ है.
इस मसले पर चर्चा और चिंता व्यक्त करते हुए हम स्त्री के खिलाफ होती रही हिंसा- घर के अंदर, अपनों द्वारा ही- को याद नहीं करते.
जिस देश में भ्रूण लिंग का पता लगा कर अजन्मी कन्याओं की हत्या कर दी जाती है; जहां ‘विजातीय’ और ‘विधर्मी’ युवक से दोस्ती और शादी करने पर लोग अपनी ही बहन और बेटी की हत्या कर देते हैं, वहाँ कुछ युवतियों की- बेशक निंदनीय- हरकतों के आधार पर पूरे महिला समाज के बारे में नतीजा निकालने की जल्दबाजी के पीछे पुरुषवादी सोच ही काम करता है!
भारत में ‘महिलाओं को उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है’ एक निर्विवाद सत्य है! इस उत्पीड़न के कई रूप हो सकते हैं- प्रत्यक्ष हिंसा से लेकर व्यवहार में उसे रोज रोज अपमानित करने तक! यह समझने की जरूरत है कि यह मौखिक, गैर-मौखिक और मनोवैज्ञानिक रणनीति के रूप में भी आ सकता है जो एक महिला की गरिमा, सुरक्षा और कल्याण को कम करता है.
एक नजर इन आकड़ों पर-
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार, 2017 से 2022 के बीच भारत में बलात्कार के कुल 1.89 लाख मामले दर्ज किए गये, जिनमें 1.91 लाख पीड़ित शामिल थे. इस दौरान भारत में रोजाना औसतन बलात्कार के 86 मामले दर्ज किये गये, यानी हर एक घंटे में बलात्कार की 4 घटनाएं!
बड़ी बात यह है कि इनमें से 82 मामलों में बलात्कार करने वाला पीड़िता का कोई परिचित शख्स ही निकला था.
महिलाओं के विरुद्ध कुल दर्ज अपराध (2022): 4,45,256 मामले, जो हर घंटे लगभग 51 एफआईआर के बराबर है!
पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता (घरेलू हिंसा): 31.4 फीसदी मामले।
शील भंग करने के इरादे से हमला: 18.7 फीसदी.
बलात्कार: 7.1 फीसदी.
कभी विवाहित महिलाएं अंतरंग साथी हिंसा (आईपीवी) का अनुभव करती हैं: कुल मिला कर 29.95 फीसदी.
शारीरिक हिंसाः 26.47 फीसदी.
वर्तमान/पूर्व पति द्वारा शारीरिक, यौन या भावनात्मक हिंसा: विवाहित महिलाओं में से 32 फीसदी.
यानी हिंसा का बड़ा पैटर्न अब भी पुरुषों से महिलाओं की तरफ है. नई घटनाएँ अपवाद हैं, नियम नहीं।
असली समस्या: ‘देवी’ का मिथक
समाज ने स्त्री को दो अतियों में बाँट रखा है – या तो देवी या डायन! जब हम स्त्री से त्याग, ममता, सहनशीलता की ही उम्मीद करते हैं, तो उसकी गलती, गुस्सा, अपराध हमें असामान्य लगता है. इसलिए एक हत्या भी स्त्री-प्रकृति के खिलाफ विद्रोह बन जाती है, जबकि पुरुष की हत्या सामान्य अपराध.
स्त्री-पुरुष दोनों इंसान हैं. दोनों में प्रेम, ईर्ष्या, लालच, बदले की भावना हो सकती है. अच्छाई-बुराई की मोनोपोली किसी एक जेंडर के पास नहीं.
डॉ लोहिया भी कहते थे- ”स्त्री को देवी बनाकर हमने उसे इंसान होने के हक से वंचित कर दिया. देवी गलती नहीं करती, इंसान करता है.’
समाज को इस मिथक से मुक्त होना चाहिए, होना होगा!
अपराधी स्त्री हो या पुरुष, सजा एक जैसी. ‘महिला है तो बेचारी होगी’ या ‘पुरुष है तो दरिंदा होगा’- दोनों पूर्वाग्रह है, गलत है.
स्त्री से सीता-सावित्री वाली पूर्णता मांगना बंद करें. उसे द्रौपदी की तरह गुस्सा करने, गलती करने, और उसकी कीमत चुकाने का हक दें.
बराबरी का मतलब ये नहीं कि अब स्त्री अपराध नहीं करेगी; बराबरी का मतलब है कि उसके अपराध को भी ‘इंसानी अपराध’ माना जाये, ‘स्त्री-जाति का पतन’ नही. (साभार: संभवा इंजोर)

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