झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को बड़ा झटका देते हुए 11वीं से 13वीं झारखंड पब्लिक सर्विस कमीशन (JPSC) संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा और फूड सेफ्टी अफसरों की नियुक्ति रद्द करने वाले सरकारी नोटिफिकेशन के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है।
याचिकाकर्ताओं के वकील अमृतांश वत्स के अनुसार, अदालत ने माना कि बिना किसी जांच के एकतरफा तरीके से चयनित अभ्यर्थियों की नियुक्ति रद्द करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत (Principle of Natural Justice) का सीधा उल्लंघन है। इस स्थगनादेश से लगभग 450 सफल अभ्यर्थियों को तत्काल राहत मिली है। अदालत ने राज्य सरकार से इस मामले में अगली सुनवाई की तारीख 15 सितंबर तक अपना जवाब दाखिल करने को कहा है।
मामले की पृष्ठभूमि और इतिहास
राज्य में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित धांधली और पेपर लीक के आरोपों को लेकर छात्रों का विरोध प्रदर्शन लगभग 25 दिनों से चल रहा था। इस जनआक्रोश के दबाव में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली JMM सरकार ने 2014 के बाद से PSC और आउटसोर्सिंग एजेंसियों द्वारा आयोजित 45 भर्ती परीक्षाओं व प्रक्रियाओं को रद्द कर दिया था या जांच के दायरे में डाल दिया था।
• गड़बड़ियों का मुख्य कारण: सीआईडी (CID) और एसआईटी (SIT) की जांच में सामने आया कि परीक्षाओं के संचालन के लिए नियुक्त आउटसोर्स एजेंसी TSR Data Processing and Technical Limited (TDPL) की भूमिका संदिग्ध थी, जिसे अन्य राज्यों में भी ब्लैकलिस्ट किया जा चुका था।
• व्यापक असर: सरकार द्वारा 45 परीक्षाओं को एकमुश्त रद्द करने के फैसले से उन अभ्यर्थियों के सामने संकट खड़ा हो गया था, जो कठिन प्रक्रिया से गुजरकर अंतिम रूप से चयनित हो चुके थे।
• कानूनी लड़ाई: सरकार के इस फैसले के खिलाफ सफल अभ्यर्थियों ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि जांच केवल दोषियों पर होनी चाहिए, न कि पारदर्शी तरीके से परीक्षा पास करने वाले सभी छात्रों की मेहनत पर पानी फेरा जाए। कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए फिलहाल रद्द करने के फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी है।

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