जन्म 1905, अलीगढ़. पिता शेख अब्दुल्ला – अलीगढ़ गर्ल्स स्कूल के संस्थापक. पेशे से डॉक्टर गायनोकोलॉजिस्ट. बाद में लखनऊ, दिल्ली में गरीब महिलाओं के लिए काम किया. कम्युनिस्ट पार्टी की सक्रिय सदस्य, इप्टा और प्रगतिशील लेखक संघ की संस्थापक सदस्य. ‘अंगारे’ (1932) पर हुआ विवाद- 1932 में चार लेखकों- सज्जाद ज़हीर, रशीद जहाँ, अहमद अली, महमूदुज्ज़फ़र ने मिल कर उर्दू कहानी संग्रह निकाला. ‘अंगारे’ समेत रशीद जहाँ की 2 कहानियाँ थीं.
‘दिल्ली की सैर’: पर्दे में रहने वाली औरतों की घुटन, शौहर द्वारा वेश्यावृत्ति के लिए ले जाना.
‘परदे के पीछे’- शरीफ घरों की औरतों की यौन-कुंठा और हकीमों के शोषण पर.
-भाषा सीधी, स्त्री की यौन इच्छा और शरीर पर खुल कर लिखा; इसलिए मुस्लिम कट्टरपंथियों और अलीगढ़ के उलेमा ने इसे ‘अश्लील’ कहा.
-लखनऊ और अलीगढ़ में फतवा जारी हुआ, किताब को जलाया गया, ब्रिटिश सरकार ने मार्च 1933 में किताब को बैन कर दिया. प्रकाशक को माफीनामा छापना पड़ा.
माना जाता है कि इसी प्रतिबंध की वजह से 1936 में लखनऊ में ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ बना, जिसकी पहले अध्यक्ष प्रेमचंद थे.
जन्म 1905, अलीगढ़. पिता शेख अब्दुल्ला – अलीगढ़ गर्ल्स स्कूल के संस्थापक.पेशे से डॉक्टर गायनोकोलॉजिस्ट. बाद में लखनऊ, दिल्ली में गरीब महिलाओं के लिए काम किया.कम्युनिस्ट पार्टी की सक्रिय सदस्य, इप्टा और प्रगतिशील लेखक संघ की संस्थापक सदस्य.‘अंगारे’ (1932) पर हुआ विवाद- 1932 में चार लेखकों- सज्जाद ज़हीर, रशीद जहाँ, अहमद अली, महमूदुज्ज़फ़र ने मिल…
उसके बाद इनके अपने संग्रह प्रकाशित हुए- ‘औरत और दूसरे अफसाने’, ‘मर्द-औरत’; कहानी ‘रुकैया’, नाटक ‘परदे के पीछे’- सबमें मुस्लिम मध्यवर्ग की औरत का पर्दा, बाँझपन का ताना, हकीम-पीर का शोषण.
-1952 में कैंसर से 46 साल की उम्र में मास्को में निधन.
रशीद जहां को आज इसीलिए भी याद किया जाता है कि उन्होंने आज़ादी से 15 साल पहले ही वो लिखा, जो इस्मत चुग़ताई (लिहाफ़ ट्रायल 1944) और मंटो बाद में लिखने वाले थे!
दो कहानियों- ‘दिल्ली की सैर’ और ‘परदे के पीछे’ का जीस्ट- दोनों में मर्द नहीं, शरीफ घर की औरत की नज़र से लिखा गया है, इसीलिए तब हंगामा हुआ था.
‘दिल्ली की सैर’: एक बुरका-पोश बीवी को उसका शौहर दिल्ली घुमाने ले जाता है। वह खुश होती है कि आज बाहर निकलेगी, पर स्टेशन पर पहुँच कर पता चलता है कि मर्द उसे घुमाने नहीं, अपने दोस्तों के सामने ‘पेश’ करने और वेश्या-गली दिखाने लाया है।
पूरी कहानी उस एक दिन की है, जहाँ औरत चलती ट्रेन, तांगा, बाजार सब देखती है पर पर्दे के अंदर से। घूमना उसके लिए आज़ादी नहीं, और ज़िल्लत बन जाता है.
– रशीद जहां का तंज़: शरीफ मर्द अपनी बीवी को तो पर्दे में बंद रखता है, पर उसी औरत को दूसरे मर्दों के मनोरंजन के लिए ले जाता है.
‘परदे के पीछे’ (ज्यादा विवाद इसी पर हुआ):
-लखनऊ के एक बड़े मुस्लिम घर की औरतों की बैठक का दृश्य।
-सब औरतें सालों से बच्चों, नुस्खों, हकीमों, पीरों की बातें कर रही हैं। एक औरत को ‘बाँझ’ होने का ताना मिलता है, दूसरी को शौहर ने छुआ तक नहीं.
– रात में वो अपने-अपने जिस्म की खुजली, दर्द, यौन अतृप्ति पर बात करती हैं। एक कहती है- हकीम ने दवा के बहाने उसका जिस्म कैसे छुआ.
-कहानी में कहीं भी खुला सेक्स-वर्णन नहीं, पर औरतें पहली बार अपनी देह और इच्छा के बारे में ज़ुबान खोलती हैं।
-अंत में कोई हल नहीं; पर्दा वैसे ही गिरा रहता है, औरतें वैसे ही अंदर हैं.
इसीलिए उलेमा ने कहा था- ‘शरीफ बीवियाँ ऐसी बातें करती ही नहीं’ और इसे अश्लील घोषित किया. जबकि रशीद जहाँ डॉक्टर थीं- वो वही लिख रही थीं जो वो रोज़ाना ज़नाना वार्ड में देखती थीं।
‘परदे के पीछे’ की पूरी कहानी एक बैठक में ही खत्म हो जाती है.
कोई हीरो-हीरोइन नहीं, सिर्फ 4-5 घरेलू औरतें हैं जो दोपहर में एक कमरे में बैठी हैं.
शुरुआत में दादी-नानी टाइप औरतें बात शुरू करती हैं कि फलानी को औलाद नहीं हुई, फलानी के शौहर ने दूसरी शादी कर ली. फिर बात हकीमों पर आती है.
एक औरत बताती है- पेट दर्द के लिए हकीम के पास गई, हकीम ने ‘पर्दे के पीछे से’ नब्ज़ देखने के बहाने जिस्म छूना शुरू कर दिया. दूसरी कहती है- पीर साहब ने तावीज़ के लिए रात में बुलाया.
धीरे-धीरे बात शर्म से निकल कर गुस्से में बदल जाती है. एक जवान बहू कहती है- शादी को 2 साल हो गये, शौहर कभी पास ही नहीं आता, पर सब उसी को बाँझ कहते हैं.
रशीद जहां डॉक्टर की तरह लिखती हैं कि खुजली, लिकोरिया, थकान, चिड़चिड़ापन- ये सब ‘औरताना रोग’ नहीं, पर्दे और यौन-घुटन की बीमारियाँ हैं।
कहानी खत्म होते-होते बाहर से मर्द की आवाज़ आती है- ‘पर्दा करो’ और सब औरतें फिर चुप हो कर दुपट्टा ठीक कर लेती हैं.
क्यों खास है: 1932 में किसी मुस्लिम महिला लेखिका ने पहली बार लिखा था कि पर्दा सिर्फ कपड़े का नहीं, औरत की ज़ुबान और इच्छा पर भी है.
रशीद जहाँ जैसी लेखिकाओं को याद करना भी एक तरह का पर्दा हटाना ही है. साभार: संभवा इंजोर

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