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कहानियों का वंश फलता-फूलता रहे! – पुस्तक समीक्षा

लेखिका (किरण जी) की रचना प्रक्रिया से एक हद तक जुड़ा रहा हूं- इस तरह कि आम तौर पर उनकी अमूमन कहानी छपने से पहले पढ़ने को मिल जाती है. पत्रकारिता से जुड़े रहने के कारण हिज्जे व व्याकरण दुरुस्त … Read the rest

Opinion, Top News

‘वंदे मातरम’ एक ‘हथियार’ भी है!

इनके पास धार्मिक/सांप्रदायिक गोलबंदी, या कहें, ‘हिंदुओं का खून खौलने’ के लिए मुद्दों और तरीकों की कमी नहीं है. ये इनका प्रयोग लागातर करते रहते हैं. अब एक ऐसा ही पुराना मुद्दा नये रूप में लाया गया है. ‘वंदे मातरम’ … Read the rest

Opinion

पूर्वोत्तर भारत : पत्रकारिता, आचारनीति, कवरेज का दायरा आदि

क्या यह नैतिक (या तार्किक) रूप से सही है कि किसी दैनिक अख़बार का संपादक नियमित रूप से किसी दूसरे दैनिक अख़बार में कॉलम लिखे—ख़ासकर तब, जब दोनों अख़बार एक ही भाषा में और एक ही क्षेत्र से प्रकाशित हो … Read the rest

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